बस्तर में संवाददाता की गिरफ्तारी से उपजे सवाल

विशेष संपादकीय
6 अक्टूबर 2015
सुनील कुमार
बस्तर के नक्सल हिंसाग्रस्त इलाके से अखबारों के लिए काम करने वाले एक स्थानीय संवाददाता को पुलिस ने नक्सलियों की मदद के आरोप में गिरफ्तार किया है। इसे लेकर वहां के मीडिया के लोग नाराजगी में हैं, और गिरफ्तारी का विरोध कर रहे हैं। दूसरी तरफ पुलिस का कहना है कि इस संवाददाता के खिलाफ उसके पास सुबूत हैं कि वह नक्सलियों की मदद कर रहा था। 
छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाकों में पुलिस हमेशा सच ही कहती हो यह जरूरी नहीं है, लेकिन इंसाफ का तकाजा यह कहता है कि पुलिस को अपनी बात साबित करने का एक मौका मिलना चाहिए, और यह गिरफ्तारी चूंकि अदालत में पहुंच चुकी है, इसलिए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि पुलिस वहां अपनी कार्रवाई को सही साबित करने के लिए कुछ मजबूत सुबूत रख पाएगी। फिलहाल इस राज्य का अनुभव नक्सल मोर्चों पर, और नक्सल इलाकों में पुलिस को लेकर मिला-जुला है। पुलिस ने बहुत शहादत भी दी है, और बहुत साजिशें भी रचीं हैं। अभी जो मामला खबरों में चले आ रहा है वह नक्सलग्रस्त सरगुजा में मीना खलको नाम की एक किशोरी के साथ पुलिसवालों के बलात्कार और उसके बाद उसके कत्ल का है, जो कि न्यायिक जांच में भी सही करार दिया गया है। प्रदेश की यही सरकार, और यही पुलिस मीना खलको को नक्सल और बालिग बताते हुए अड़ी हुई थीं, और उनके सारे दावे झूठे साबित हुए। बस्तर में पुलिस ज्यादती की अनगिनत घटनाएं दर्ज हैं, और राज्य के पुलिस महकमे में यह चर्चा आम है कि बस्तर में तैनात पुलिस के कुछ बड़े अफसर हर किस्म की साजिश करने के लिए जाने जाते हैं। हमारे पास इसे साबित करने का कोई जरिया नहीं है इसलिए हम इसे सिर्फ चर्चा कहकर रूक जा रहे हैं।
बस्तर में संतोष यादव नाम का यह स्थानीय संवाददाता कुछ अरसा पहले कुछ समय के लिए इस अखबार, 'छत्तीसगढ़Ó के लिए भी काम कर चुका है, और अभी वह कुछ और अखबारों के लिए काम कर रहा था। एक तो गांवों के इलाकों में काम करना वैसे भी कुछ मुश्किल होता है, और जहां नक्सल और पुलिस दोनों ताकतें हिंसा का इस्तेमाल कर सकती हैं, वहां पर अखबार के लिए खबरों का काम करना बहुत खतरनाक होता है। ऐसे हिंसक और हथियारबंद टकराव वाले इलाकों में इन दोनों पहलुओं से बात करके खबर बनाते हुए ऐसे खतरे में घिर जाना बहुत मुश्किल बात नहीं है कि किसी एक पहलू की मदद का आरोप लग जाए। बस्तर में इसके पहले भी पुलिस ने एक-दो संवाददाताओं को गिरफ्तार किया था, और नक्सलियों ने भी एक-दो संवाददाताओं को मारा था। 
हमारे पास ऐसी जांच की अभी कोई रिपोर्ट नहीं है कि ये लोग अखबार के काम के अलावा किसी और बात के लिए भी सक्रिय थे, या नहीं थे। और जहां पर पुलिस टेलीफोन टैप करती हो, बातचीत रिकॉर्ड करती हो, और नक्सली गांव में जनसुनवाई का नाटक करके लोगों का गला काट देते हों, वैसे मोर्चे पर अखबारी काम खासे खतरे का है। पुलिस नाखुश तो गिरफ्तारी, और नक्सल नाखुश तो मौत। ऐसे में जो लोग वहां काम करते हैं, वे अगर ईमानदारी से अपने पेशे तक सीमित हैं, तो वे बड़ी तारीफ के हकदार हैं। 
अभी की यह गिरफ्तारी छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम के तहत की गई है, जो कि मोटे तौर पर नक्सलियों की मदद करने वालों के खिलाफ, नक्सलियों के खिलाफ कड़े प्रावधानों के साथ राज्य में बनाया गया था। जब यह कानून बना था, उस वक्त भी हमने मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से इसके बारे में पूछा था, और उन्होंने जवाब दिया था कि इसका इस्तेमाल मीडिया के खिलाफ नहीं किया जाएगा। हम उम्मीद करते हैं कि अभी बस्तर पुलिस ने जिस संवाददाता को गिरफ्तार किया है, उसकी गिरफ्तारी मीडिया से जुड़े हुए काम को लेकर नहीं की गई होगी। और अगर उसने सच ही नक्सलियों की मदद का काम किया होगा, तो वह काम मीडिया के काम का हिस्सा मानना गलत होगा। 
राज्य सरकार से हम यह मांग करते हैं कि बस्तर में मीडिया को सरकारी-आतंक की किसी दहशत से बचाने के लिए सरकार तुरंत ही यह खुलासा करे कि इस गिरफ्तारी के पीछे उसके पास क्या सुबूत है। अगर बिना मजबूत सुबूतों के ऐसा किया गया है, तो इससे सरकार की देश-विदेश में एक बड़ी फजीहत होना तय है। खुद सरकार के हित में है कि वह अदालती कार्रवाई का इंतजार किए बिना सार्वजनिक रूप से इस गिरफ्तारी के पीछे के कारणों और सुबूतों को जनता के सामने रखे क्योंकि मीडिया की गिरफ्तारी आम जनता की गिरफ्तारी से कुछ अलग मायने रखती है। 
लोगों को यह बात याद होगी कि किस तरह अलग-अलग दायरों में काम करने वाले मीडिया के लोग कभी खबरों के लिए, तो कभी किसी और वजह से दो पक्षों के बीच हरकारे जैसा काम भी करने लगते हैं। ऐसी ही टेलीफोन कॉल्स की रिकॉर्डिंग उजागर होने पर वीर संघवी जैसे जाने-माने अखबारनवीस को एक बड़े अखबार के संपादक की कुर्सी छोडऩी पड़ी थी, और बरखा दत्त जैसी नाम-गिरामी टीवी-पत्रकार को भारी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी। मीडिया के कामकाज में एक बहुत बारीक संतुलन अगर बनाकर न चला जाए, तो पत्रकार कभी मध्यस्थ हो सकते हैं, कभी दलाल हो सकते हैं, कभी खबरची हो सकते हैं, और कभी-कभी पुलिस या नक्सलियों के मददगार भी हो सकते हैं। लेकिन राज्य सरकार को यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि जब बस्तर में एक कलेक्टर का नक्सल-अपहरण हुआ था, तो मीडिया के लोगों ने ही मध्यस्थता की थी, और रिहाई में मदद की थी। इसी तरह नक्सलियों को भी देश-दुनिया के सामने अपनी बात रखने के लिए मीडिया की जरूरत पड़ती है, और मीडिया उनके काम भी आता है।
ऐसे में सरकार को चाहिए कि मीडिया की सक्रियता को संदेह का हर जरूरी फायदा देते हुए एक उदार नजरिया अपनाना चाहिए, और मीडिया के किसी व्यक्ति पर कार्रवाई के पहले यह जरूर देख लेना चाहिए कि क्या स्थानीय अधिकारी अपनी किसी वजह से, मीडिया का हौसला पस्त करने के लिए, बाकी लोगों को अघोषित धमकी देने के लिए तो ऐसी गिरफ्तारी नहीं कर रहे हैं। आज छत्तीसगढ़ के बाहर की दुनिया बड़े गौर से इस गिरफ्तारी को देख रही है, और राज्य सरकार को इसे जिले का मामला मानकर नहीं चलना चाहिए, बल्कि इसकी एक बाहरी जांच भी करवानी चाहिए, वरना मीडिया का कम, सरकार का नुकसान अधिक होगा। चलते-चलते हम एक बात यह भी कहना चाहेंगे कि इस एक मामले से परे, हमेशा ही मीडिया के लोगों को अपने पेशे की सीमाओं और जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए, उन्हें किसी भी हाल में पुलिस या नक्सली, किसी भी तरफ का मददगार नहीं बनना चाहिए। हम यह भी जानते हैं कि धमाकों से दूर राजधानी में बैठकर यह बात लिखना संपादक के लिए आसान है, और धमाकों के बीच काम करने वाले संवाददाताओं के लिए बहुत मुश्किल, लेकिन फिर भी इस पेशे के लोगों की अपनी हिफाजत के लिए भी यह सलाह जरूरी है।

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