आसाराम खुद चाहे जैसा हो, उसके सवाल पर सोचना चाहिए

संपादकीय
16 अक्टूबर 2015
एक नाबालिग से बलात्कार के आरोप में लंबे समय से जेल में बंद आसाराम ने अदालत से अपील की है कि उनके मामले की सुनवाई जल्दी की जाए क्योंकि वे 70 बरस के हो चुके हैं। यह मुद्दा सोचने लायक है कि बिना अदालती सुनवाई के, या सुनवाई चलते हुए किसी को कितने बरस जेल में रखा जा सकता है? और यह बात हम आसाराम के मामले में करना नहीं चाहते जिसके केस में कई गवाह मारे गए हैं, कई पर हमले हुए हैं, कई धमकियां पा रहे हैं। आज आसाराम के भक्तों को छोड़कर शायद ही किसी को उनके साथ कोई हमदर्दी हो, लेकिन देश भर में ऐसे लाखों लोग सुनवाई के इंतजार में, फैसले के इंतजार में जेलों में बंद हैं, और इतने-इतने लंबे अरसे से बंद हैं कि शायद उन्हें होने वाली सजा भी उतनी लंबी न हो।
देश की अदालतों का हाल बहुत खराब है। और कुछ लोगों का हिसाब-किताब यह है कि जिस रफ्तार से मामलों का निपटारा हो रहा है, अदालतों में कतार में लगे सारे मामले शायद अगले ढाई सौ साल में निपट पाएंगे। अब यह अंदाज अगर ढाई सौ साल से घटकर डेढ़ सौ साल हो जाए, या पचास साल भी हो जाए, तो भी क्या फर्क पड़ेगा? लोगों की जिंदगी तो अदालत से मामला निपटने तक खत्म ही हो चुकी होगी। और फिर एक बात यह भी है कि जो लोग सचमुच में ही बेकसूर रहते हैं, और यहां पर हम फिर साफ कर दें, कि यह बात हम आसाराम को लेकर नहीं लिख रहे हैं, वैसे बेकसूर लोग तो जब बेगुनाही के दस-दस बरस जेल में गुजारकर छूट रहे हैं तो उनके बयान भी आ रहे हैं कि अब इस लोकतंत्र पर या अदालती इंसाफ पर उनका भरोसा नहीं रह गया। यह बात सोचने की है कि बेगुनाह बरी होने वाले लोगों का भरोसा अगर भारतीय न्याय व्यवस्था पर से उठ रहा है तो जो बेगुनाह किसी वजह से फंसकर सजा पा जाते हैं, उनके भरोसे का क्या हाल होता होगा? 
लोकतंत्र का यह पहलू बहुत ही अमानवीय है। अदालतों के विस्तार और उनकी सहूलियतों को बढ़ाने की बातें दशकों से चली आ रही हैं, और आज हालत यह है कि जिनके पास अधिक पैसा है, और जिनके पास महंगे वकीलों की सहूलियत है, वैसे लोग अपने खिलाफ मामलों को जब तक चाहें तब तक खींचते चलते हैं। नतीजा यह होता है कि जिनके हक जायज हैं, जो इंसाफ के लिए अदालत में खड़े हैं, जो बेकसूर हैं, लेकिन कमजोर हैं, वे पूरी जिंदगी वहां गुजार देते हैं। यही वजह है कि लोगों के मन में देश के लिए, लोकतंत्र के लिए, भारत की मौजूदा व्यवस्था के लिए सम्मान नहीं रह गया है। और फिर एक दूसरी बात यह भी कि भारत के किसी भी दूसरे दायरे की तरह, अदालतों में भी इतना बुरा भ्रष्टाचार फैला हुआ है कि सबसे अधिक ताकतवर या पैसे वाले की जीत की सबसे अधिक संभावना रहती है। 
यह नौबत बदलने की जरूरत है क्योंकि जब समय रहते इंसाफ नहीं होता तो मुजरिमों के हौसले बढ़ते चलते हैं, और वे सजा के बजाय मजा अधिक करते हैं। हमारा एक और ख्याल है कि भारतीय अदालतों में लगने वाली फीस कुछ इस तरह की रहनी चाहिए कि पैसे वालों के मामलों में फीस अधिक ली जाए, और उसे अदालतों पर खर्च के लिए ही अलग रखा जाए। लगातार ऐसा करने पर कुछ बरस बाद हो सकता है कि गरीबों की बारी भी इंसाफ के लिए आ सके। 

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