जनता के पैसों से स्मारक पर रोक, का मोदी का फैसला सही, लेकिन खुद भी तो वही किया है

संपादकीय
29 अक्टूबर 2015

दिल्ली में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम के जीवनकाल का सरकारी बंगला उनके स्मारक में बदलने से मोदी सरकार ने मना कर दिया है। यह सरकार के उस फैसले के तहत है जो कुछ महीने पहले घोषित किया जा चुका था, कि किसी मंत्री-सांसद, या किसी और की स्मृति में किसी सरकारी बंगले को स्मारक में नहीं बदला जा सकता। इस बात को लेकर कुछ लोग सरकार की आलोचना कर रहे हैं, और इसे डॉ. अब्दुल कलाम का अपमान करार दे रहे हैं, लेकिन हम सरकार के इस फैसले के हिमायती हैं। 
इस देश में स्मारकों के नाम पर जनता की छाती पर खूब बोझ डाला हुआ है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अपने पिता बाबू जगजीवन राम की स्मृति में उनका रहा हुआ बंगला स्मारक बनवाने के लिए अपनी ही पार्टी की यूपीए सरकार से खासी खींचतान की थी। उनके अलावा भी कभी चौधरी चरणसिंह के रहे हुए बंगले को स्मारक बनाने की बात उठती है, तो कभी किसी और की याद को जनता के खर्च से जिंदा रखने की। दिल्ली में महात्मा गांधी, नेहरू, इंदिरा, राजीव की समाधियों के साथ-साथ उन्हीं के टक्कर की एक समाधि ऐसे संजय गांधी की याद में भी बनाई गई है जिनका इस देश में योगदान महज इमरजेंसी थी। न तो वे किसी ओहदे पर रहे, और न ही अपने परिवार के दो और लोगों की तरह उनकी जिंदगी किसी आतंकी हमले में गई थी। ऐसे में सरकारी खर्च पर दिल्ली में एक बड़ी सी समाधि पूरी तरह नाजायज थी, और वह जनता की छाती पर हमेशा के लिए एक बोझ रहेगी। यह सिलसिला आगे बढ़ाना बहुत गलत होगा। 
लेकिन मोदी सरकार के ही कुछ और फैसलों को देखने की जरूरत है। मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के पहले से सरदार पटेल की एक प्रतिमा को अमरीका की स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से दुगुनी ऊंचाई की बनाने की घोषणा की थी, और एक सामाजिक-राजनीतिक अभियान चलाकर देश भर से उस प्रतिमा के लिए गांव-गांव से लोहा मांगा गया था। लोगों को लग रहा था कि जनसहयोग से मिले लोहे से भारतीय इतिहास के इस लौह पुरूष की प्रतिमा बनेगी। लेकिन बाद में पता लगा कि केन्द्र या गुजरात सरकार कुछ हजार करोड़ रूपए खर्च करके यह स्मारक बनवा रहे हैं। खबर तो यह भी है कि भारत की एक बड़ी कंपनी चीन की किसी कंपनी के साथ मिलकर इस प्रतिमा को बना रही है, और जनसहयोग के लोहे का क्या हुआ इसकी कोई खबर नहीं है। स्मारकों की चर्चा करें तो एक दूसरी बात याद आती है। उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने दलित समुदाय के देश के सबसे महान नेता बाबा साहब आंबेडकर, अपनी खुद की बसपा के संस्थापक कांशीराम, अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी, और अपनी खुद की जैसी विशाल प्रतिमाएं राजधानी लखनऊ में बनवाई, और उन पर जिस तरह से लाखों करोड़ रूपए दाम की जमीन, और हजार करोड़ के करीब की लागत झोंकी गई, वह भारत में सबसे हिंसक स्मारक बना है। इसके बनाने में जो भ्रष्टाचार हुआ, और उस पर सुप्रीम कोर्ट में जो मामला चल रहा है, उस पर हम अभी नहीं जाते। लेकिन लोगों की नीयत स्मारकों को लेकर जो है, उसका सबसे अश्लील प्रदर्शन मायावती की तरफ से किया गया, जब उन्होंने अपनी खुद की प्रतिमाओं पर इस तरह से जनता की दौलत के हजारों या लाखों करोड़ एक पूरा पार्क बनवाने में खर्च किए। लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं होती है। जिस तरह गुजरात में सरदार पटेल की आसमान छूती प्रतिमा बनवाई जा रही है, ठीक उसी तरह महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा अपने आदरणीय ऐतिहासिक शिवाजी का एक स्मारक समंदर में बनवा रही है, और उस पर भी हजारों करोड़ खर्च होने जा रहे हैं। 
ऐसे देश में जो कि रियायती खाने की वजह से दो वक्त खा पाता है, जहां पर बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जहां पर इलाज और पढ़ाई का बजट केन्द्र सरकार लगातार काटती जा रही है, और मौजूदा सरकार ने शायद 15-20 फीसदी कटौती अभी साल भर में ही की है, उस देश में केन्द्र या राज्य के पैसों से हजारों करोड़ लागत के स्मारक बनाना, उसके लिए सरकारी जमीन देना, सरकारी बंगला देना, पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है। मोदी सरकार भी डॉ. अब्दुल कलाम के जन्म स्थान रामेश्वरम में उनका एक बड़ा स्मारक सैकड़ों करोड़ की लागत से बनाने जा रही है। लेकिन दिल्ली में उनके बंगले को स्मारक में न बदलने का फैसला हम सही मानते हैं, और सुप्रीम कोर्ट को दखल देकर ऐसे किसी भी खर्च की सीमा तय करनी चाहिए कि किस स्मारक पर कौन सी सरकार कितने बरस में अपने बजट का कितना हिस्सा खर्च करे, और कहां पर वे थम जाएं। ऐसा इसलिए जरूरी है कि लोकतंत्र में अपने पसंदीदा लोगों की महानता को आम जनता का पेट काटकर आसमान की तरफ खड़ा करने की नेताओं की नीयत खुद होकर थमने वाली नहीं है। देश भर में इसके लिए सुप्रीम कोर्ट को एक आदेश देना पड़ेगा कि सरकार यह सिलसिला जनता के खजाने से खत्म करे, वरना किसी दूसरे राज्य में किसी और को मायावती बनने से कैसे रोका जा सकेगा? कल के दिन एक और आत्ममुग्ध नेता जयललिता अगर सरदार पटेल की प्रतिमा से दुगुनी ऊंचाई की अपनी प्रतिमा, और अपने नेता एम.जी.आर. की प्रतिमा चेन्नई के समंदर में बनवाना शुरू कर देंगी, तो उनको कौन रोक सकेगा? देश भर में यह सिलसिला ही थमना चाहिए। 

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