विरोध में सरकारी सम्मान लौटाने से जुड़ी कुछ बातें

संपादकीय
10 अक्टूबर 2015
देश में बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता और कट्टरता की हिंसा का विरोध करते हुए बहुत से साहित्यकार, कलाकार तरह-तरह के सम्मान और पुरस्कार लौटा रहे हैं। यह विरोध करने का एक बहुत ही शांतिप्रिय और लोकतांत्रिक तरीका है। ऐसे कई सम्मान केन्द्र सरकार की बनाई हुई साहित्य अकादमी के दिए हुए थे, और कई पुरस्कार किसी और सरकारी संस्था के बांटे हुए थे। पिछले कुछ दिनों से रोज ऐसे एक-दो नाम सामने आ रहे हैं, जो लोग जाहिर तौर पर लोकतांत्रिक सोच वाले हैं, और देश की आज की हालत को लेकर बड़े निराश हैं। देश की आज की हालत पर हम इसी जगह महीने भर में दस से अधिक बार लिख चुके हैं, इसलिए उस पहलू पर लिखने के बजाय आज हम इस पर लिख रहे हैं कि सम्मान और पुरस्कार देने में सरकार की क्या भूमिका होनी चाहिए, और सरकारी हाथों से लेने के वक्त लोगों को क्या सोचना चाहिए। 
सरकार की बनाई संस्थाओं में जितनी भी आजादी रहती होगी, उनमें कहीं न कहीं सरकारी दखल तो रहता ही है। और इसके अलावा जब सरकार सीधे-सीधे खुद ही राष्ट्रीय सम्मान देने लगती है, तो उसमें तो सीधे-सीधे सरकार की पसंद ही चलती है। पद्मश्री से लेकर भारतरत्न तक, और खेलों से लेकर फिल्मों के सम्मान तक, अनगिनत ऐसे सम्मान हैं जिनको लेकर विवाद चलते ही रहते हैं, और ये विवाद सिर्फ हिन्दुस्तान में, और सिर्फ सरकारी सम्मान को लेकर होते हों, ऐसा भी नहीं है। दुनिया में जो सबसे सम्मानित सम्मान हैं, उस नोबल पुरस्कार पर भी यह दाग लगा हुआ है कि उसने शांति पुरस्कार देने के मामले में गांधी को छोड़ दिया, और यह उसकी खुद की एक बड़ी नाकामयाबी रही है। 
खैर, हमारा हमेशा से यह मानना है कि सरकार को किसी भी तरह के सम्मान और पुरस्कार बांटने से परे रहना चाहिए। लोकतंत्र में जो सत्तारूढ़ पार्टियां धर्म और जाति को ध्यान में रखकर राजनीति करती हैं, जो क्षेत्रीयता के आधार पर समझौते करती हैं, जो चुनावों को देखते हुए किसी खास तबके को खुश करने की कोशिश में हमेशा ही लगी रहती हैं, वैसी पार्टियों के राज में चलने वाली सरकारों के हाथ किसी तरह के सम्मान और पुरस्कार बांटने के फैसले नहीं दिए जाने चाहिए। कई बार यह भी होता है कि सम्मान और पुरस्कार की लंबी लिस्ट में अपने कुछ चहेते लोगों के नाजायज सम्मान के लिए सरकारें या सरकारी संस्थाएं कुछ सचमुच ही सम्मानजनक लोगों का सम्मान कर देती हैं, ताकि उनके साथ कतार में अपने नालायकों को भी खड़ा किया जा सके। 
जिस तरह लोकतंत्र में सरकार से कुछ बातों से परे रहने की उम्मीद की जाती है, जिस तरह यह कहा जाता है कि सरकार को धर्म में दखल नहीं देना चाहिए, और धर्म के प्रति बराबरी का एक नजरिया भर रखना चाहिए, उसी तरह सरकार को सम्मान बांटने के अपने मोह से अपने को अलग भी रखना चाहिए। आज अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रूख और रवैये से खफा होकर देश भर से कई लोग अपने सम्मान लौटा रहे हैं, तो यह बात जाहिर है कि ये सम्मान किसी न किसी सरकारी संस्था, या सरकार से जुड़ी हुई संस्था के दिए हुए होंगे। अगर ऐसा नहीं होता तो केन्द्र सरकार के रूख से नाराज लोग भला क्यों अपने सम्मान लौटाते? आज मोदी से नाराज होकर कोई अपने नोबल पुरस्कार तो लौटाने से रहे, आज कैलाश सत्यार्थी अगर देश में भड़की हुई साम्प्रदायिकता से नाराज भी होंगे, तो भी वे मोदी को तो अपना नोबल पदक नहीं भेजेंगे। इसलिए इस मौके पर देश के उन तमाम लोगों को सरकारी सम्मानों और पुरस्कारों के बारे में एक बार फिर सोचना चाहिए कि क्या भारत जैसे लोकतंत्र में सरकारों को इतना बड़ा सम्मान देना ठीक है कि सरकार देश के प्रमुख लोगों का अपनी मर्जी से सम्मान कर सके? आज तो विरोध जाहिर करने के लिए लौटाने को लोगों के हाथ में सम्मान है, लेकिन हम एक ऐसी स्थिति को बेहतर समझेंगे जिसमें लोग सरकारी दखल वाले सम्मान लेना ही बंद कर दें। भारत मेें एक के बाद एक जिस तरह की खामियों वाली सरकारें राज करती हैं, और न सिर्फ देश पर बल्कि प्रदेशों में भी ऐसी ही बदहाली रहती है, उस तरह की सरकारों के तय किए हुए, या दखल वाले सम्मान न लेने की घोषणा लोगों को इस मौके पर करनी चाहिए। आज महज कोई एक सरकार या एक पार्टी ऐसी बुरी नहीं हैं, बल्कि बहुत सी सरकारें और बहुत सी पार्टियां ऐसी हैं कि जिनके हाथों, जिनके तय किए हुए कोई भी सम्मान लेना असल में सम्माननीय किसी भी व्यक्ति के लिए एक अपमान ही हो सकता है। आज इस मौके पर हौसलामंद लोगों को घोषणा आगे को लेकर करनी चाहिए, पाए हुए सम्मान को लौटाना या न लौटाना तो उनकी मर्जी की बात है।

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