यह खामोशी इतिहास में भी दर्ज हो रही है, और देश का भविष्य भी तबाह कर रही है

संपादकीय
07 अक्टूबर 2015

बिहार देश के ठीक बीच का राज्य है, और वहां से इतनी लोकसभा सीटें हैं, कि वे देश की सरकार तय करने में मदद भी करती हैं। ऐसे राज्य में राज्य की विधानसभा का चुनाव भी कम मायने नहीं रखता है, और इस बार के बिहार चुनाव में मुद्दे कई किस्म के हैं। पिछले चुनाव में जदयू के नीतीश कुमार एनडीए का हिस्सा थे, और बिहार की राज्य सरकार में भाजपा भागीदार थी। मोदी के मुद्दे पर वह रिश्ता टूटा, और अब नीतीश कुमार अपने पुराने दुश्मन लालू यादव के साथ मिलकर, एक दूसरे पुराने दुश्मन कांग्रेस के साथ मिलकर यह चुनाव लड़ रहे हैं। फिर आन्ध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में कुछ सीटों पर मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाले ओवैसी भी बिहार में हाथ आजमा रहे हैं, और लोगों का यह मानना है कि वे मुस्लिम वोटों को भाजपा के खिलाफ जाने से मोड़कर, कुल मिलाकर भाजपा के हाथ मजबूत करने जा रहे हैं। ये चुनाव इस माहौल में भी हो रहे हैं कि एनडीए के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरी दुनिया में घूम-घूमकर भारत की एक अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं, और देश के भीतर लोगों को भारत के भविष्य का एक अलग सपना दिखा रहे हैं। 
ऐसे में इस चुनाव में और देश के राजनीतिक माहौल में देश-विदेश के मुद्दे, भारत के आर्थिक मुद्दे, विकास की संभावनाएं, और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय आर्थिक चुनौतियां, इनको बहस का मुद्दा रहना चाहिए था। लेकिन इस पूरी बहस को भाजपा के लोगों ने, भाजपा के साथ के लोगों ने, मोदी के मंत्रियों और सांसद-विधायकों ने ले जाकर गाय के खूंटे से बांध दिया है, और गोमांस, हिन्दू-मुस्लिम, साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों को इस देश का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बना दिया है। यह पूरी तस्वीर उस पश्चिमी दुनिया में मोदी की दिखाई गई हिन्दुस्तान की तस्वीर के ठीक खिलाफ है जिसमें वे इक्कीसवीं सदी के भारत की संभावनाएं लुभावने अंदाज में दिखाकर लौटे हैं। जिस पश्चिमी दुनिया में प्रवासीय भारतवंशियों के बीच मोदी कामयाबी के झंडे गाड़कर लौटे हैं, उनके लिए गोमांस कोई मुद्दा नहीं है। वे जिस दुनिया में जीते हैं वहां जिसे गोमांस खाना है, वे खाते हैं, जिन्हें नहीं खाना है, वे नहीं खाते हैं। लेकिन वहां कोई गाय के नाम पर किसी दूसरे का कत्ल नहीं करते। 
आज हिन्दुस्तान में बिहार के चुनाव से परे भी माहौल जिंदगी के जिन असल मुद्दों पर बहस का होना चाहिए, उसे कहीं विसर्जन पर आमादा साधुओं की भीड़ नदी में डुबा दे रही है, तो कहीं कोई साध्वी जाकर यह साबित करने पर आमादा है कि देश अभी अठारहवीं सदी में भी नहीं पहुंचा है। पता नहीं कैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया के नेताओं के साथ मिलते हुए भारत में ऐसे लोगों के मुखिया भी बने हुए हैं। ऐसा लगता है कि जिस भारत को यहां पर साम्प्रदायिक लोग गढऩा चाह रहे हैं, उसका मुखिया तो विदेश जाकर सिर्फ नेपोलियन से मिल सकता है, क्योंकि भारत उसी युग में जीने की कोशिश में लगा है। आज हिन्दुस्तान में अगर बहुत से साहित्यकार, कलाकार, पढ़े-लिखे लोग, और अमन-पसंद जनता अगर यह सवाल कर रहे हैं कि मोदी इन तमाम मुद्दों पर चुप क्यों हैं, और उनके साथी इस कदर खुलकर हिंसक क्यों हैं, तो लोगों के ये सवाल नाजायज नहीं हैं। देश भर में जिस तरह की धार्मिक कट्टरता, जिस तरह की धर्मान्धता फैलाई जा रही है, भारत का ऐतिहासिक बर्दाश्त जिस तरह खत्म किया जा रहा है, वह इस देश पर पिछले बहुत समय में मंडराया सबसे बड़ा खतरा है। देश की हवा ऐसी जहरीली बना दी गई है कि धार्मिक सद्भाव की बात करने वाले, तर्क और तथ्य की बात करने वाले मारे जा रहे हैं, और उनके घर जलाने की भी धमकी दी जा रही है। उनको मारने की खुली धमकी देने वाले साम्प्रदायिक संगठन, उनके कत्ल में पकड़ाने वाले साम्प्रदायिक संगठन आज भी हौसले के साथ बयानबाजी कर रहे हैं, और केन्द्र की सरकार ऐसी हिंसा पर खामोश है। यह खामोशी इतिहास में भी दर्ज हो रही है, और इस देश का भविष्य भी तबाह कर रही है। 

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