छत्तीसगढ़ की राजधानी में बड़े-बड़े जुर्म, और पुलिस

संपादकीय
19 अक्टूबर 2015

देश भर की खबरों में पिछले चार महीनों से बने हुए रायपुर के नन-बलात्कार कांड में पुलिस ने सैकड़ों लोगों की छानबीन के बाद डीएनए जांच के आधार पर दो नौजवानों को गिरफ्तार करके मीडिया के सामने पेश किया, जो कि उसी इलाके में घूमने वाले, नशे के आदी लोग थे। इस घटना को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार और पुलिस को देश भर से सवालों के जवाब भी देने पड़ रहे थे, और मीडिया में कुछ ऐसा माहौल भी बन रहा था कि यह बलात्कार देश में बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता का एक नतीजा हो सकता है। अभी जो नतीजा पुलिस ने सामने रखा है, वह ऐसी किसी साम्प्रदायिकता की उपज नहीं दिख रहा है, और ऐसा न हो तो ही इस शांत राज्य के लिए बेहतर है। 
यह मौका रायपुर पुलिस के बारे में कुछ लिखने का है। पिछले कुछ बरसों में लगातार इस शहर में जितने बड़े-बड़े मामले हुए, उनमें से अधिकतर मामले पुलिस ने सुलझा लिए। इसमें कई तरह की हत्या, कई तरह की लूट, कई तरह की डकैती के मामले थे, और पुलिस की कामयाबी उसे कुछ तारीफ का हकदार बनाती है। आमतौर पर पुलिस के खिलाफ लिखने की जरूरत पड़ती है, और पुलिस का काम ऐसा है कि उसकी खामियां सिर चढ़कर बोलती हैं, और उसकी खूबियां अनदेखी रह जाती हैं। इसलिए हम सरकार के किसी अमले के अच्छे काम, या उसकी किसी खूबी को अनदेखा करने के बजाय उस पर लिख रहे हैं। इस शहर में बड़े-बड़े जुर्म कम नहीं हुए, खासे हुए हैं, लेकिन उनमें मुजरिमों को पकड़ लेना, करोड़ों की नगदी को बरामद करके पेश कर देना छोटी बात नहीं है। कई बार पुलिस की ऐसी तस्वीर बनती है कि वह जुए की फड़ में जब्त रकम को भी दबा देती है, लेकिन रायपुर पुलिस ने शहर से एक डकैती में गई पौन करोड़ के करीब की रकम फिल्मी अंदाज में जब्त की, और जब तक डकैत पूना पहुंचकर ट्रेन से उतरते, तब तक रायपुर पुलिस वहां पहुंचकर उनका इंतजार कर रही थी। 
भ्रष्टाचार की कहानियां सरकार के किसी भी दूसरे विभाग की तरह पुलिस विभाग को लेकर भी चलती रहती हैं, उनसे कोई इंकार नहीं हो सकता। लेकिन बड़े-बड़े जुर्म में मुजरिमों का लगातार पकड़ा जाना हमारे हिसाब से पुलिस की एक बड़ी कामयाबी है। दूसरी बात लगे हाथों यह भी कहना ठीक है कि छत्तीसगढ़ की इस राजधानी में संगठित अपराध, संगठित गुंडागर्दी, संगठित उगाही के दिन खत्म हो गए हैं। पिछले कुछ बरसों में लगातार पुलिस का कुछ ऐसा दबाव अपराधियों पर रहा कि ऐसे गिरोह और ऐसे नामी-गिरामी गुंडे एक-एक कर घर बैठ गए। 
कुछ लोगों को लग सकता है कि बलात्कार के आंकड़ों में छत्तीसगढ़ देश में सबसे ऊपर के राज्यों में आता है, लेकिन बलात्कार को हम आमतौर पर रोके जा सकने वाले अपराध में नहीं गिनते। कुछ मामले ऐसे जरूर रहते हैं जिनमें छेडख़ानी की शिकायतों के बाद भी पुलिस लापरवाही बरतती है, और फिर ऐसे में हौसला बढऩे के बाद गुंडे बलात्कार करते हैं, और ऐसे मामलों में पुलिस जवाबदेह गिनी जानी चाहिए। लेकिन बलात्कार के अधिकतर मामले पुलिस के रोके रूकने वाले नहीं रहते। इनके लिए जनता को ही सावधान रहना चाहिए, या फिर अधिक से अधिक यह हो सकता है कि बलात्कारी को पकड़कर अदालत से सजा दिलवाने की अपनी जिम्मेदारी पुलिस पूरी करे। नन-बलात्कार कांड में आज महीनों बाद यह नौबत आ रही है, और बिना किसी सुबूत के, बिना किसी संदेह के, इन मुजरिमों को पकडऩा आसान भी नहीं था। 
किसी भी प्रदेश या शहर में पुलिस की कामयाबी के लिए समाज की एक जागरूक हिस्सेदारी भी जरूरी होती है। यह बात तो सही है कि आज पुलिस का बहुत सा काम टेलीफोन कॉल रिकॉर्ड और उससे मुमकिन हुई तलाश की वजह से आसान हो गया है, लेकिन फिर भी चौकसी में जनभागीदारी का महत्व कम नहीं हो जाता। लोगों को खुद भी समाज में अपराध की आशंकाओं पर नजर रखनी चाहिए, और उसी से एक बेहतर पुलिसिंग मुमकिन है। फिलहाल यह मौका रायपुर पुलिस को उसकी कामयाबी पर बधाई देने का है। 

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