कमर कसकर किफायत, और कमाई के रास्तों की जरूरत

संपादकीय
11 अक्टूबर 2015

दक्षिण भारत में डाक तार विभाग में डाकघरों से सरकारी कंपनी का एक सस्ता मोबाइल फोन बेचने का प्रयोग किया, जो कि सफल रहा। अब विभाग निम्न आय वर्ग के लोगों के इस्तेमाल का यह किफायती फोन कुछ और राज्यों से भी बेचना शुरू कर रहा है। देश में कुछ दशक पहले जब दूरसंचार विभाग का निजीकरण शुरू हुआ, और डाक तार विभाग का एकाधिकार खत्म हुआ, तब से डाक और संचार की निजी कंपनियों से सरकार का एक तगड़ा मुकाबला चलते आ रहा है। और ऐसे में अस्तित्व की लड़ाई में सरकारी कंपनियां भी कुछ-कुछ मेहनत करते दिखती हैं। एक वक्त था जब इस देश में फोन के लिए दस-बीस बरस इंतजार करना पड़ता था, और निजी कंपनियां चि_ियों को पहुंचाने का काम गैरकानूनी तरीके से करने पर मजबूर थीं। खुली बाजार व्यवस्था ने तस्वीर बदलकर रख दी है, और अब सरकार को भी जिंदा रहने के लिए कहीं किफायत बरतनी पड़ रही है, तो कहीं पर कमाई के नए रास्ते देखने पड़ रहे हैं। फिर भी आज हिन्दुस्तान में जहां-जहां सरकारी एकाधिकार है, वहां-वहां बदहाली है। जब निजी क्षेत्र के साथ एक मुकाबला होता है, तो खुद सरकार को पता लगता है कि उसका अमला, और उसका कारोबार कितना नुकसान करते हैं। 
यह बात तो एक छोटी सी मिसाल है कि देश के डाकघर कुछ और बेचने का काम कर सकते हैं, और अपनी खुद की कमाई भी बढ़ा सकते हैं, और सरकार के किसी दूसरे विभाग का फायदा भी कर सकते हैं। अभी दो दिन पहले ही डाक दिवस मनाया गया था, और नई पीढ़ी को एक बार फिर डाक के बारे में जानने को मिला, क्योंकि अब चि_ियां लिखना और भेजना बंद सा हो गया है। ऐसे में देश भर में बिखरे हुए सरकार के अपने ढांचे का इस्तेमाल दूसरे काम के लिए भी होना चाहिए, और ऐसा ही काम रेल विभाग को भी अपने रेलवे स्टेशनों पर करना चाहिए, और स्टेशनों के पास की अपनी खाली जमीन पर भी करना चाहिए। आज हर शहर में स्टेशनों के इर्द-गिर्द दर्जनों छोटी-छोटी होटलें खुल जाती हैं, और इनके बजाय ट्रेन मुसाफिरों की जरूरतों के मुताबिक रेलवे की अपनी होटलें खुल सकती हैं, जहां पर लोग अपनी अगली ट्रेन तक कुछ घंटों के लिए भी रह सकते हैं। ऐसा ही काम सरकार को जगह-जगह करना चाहिए, ताकि घाटा गिनाते हुए उसके अपने संस्थान टैक्स देने वाली जनता पर बोझ न बनें। आज भारत की सरकारी विमान कंपनी एयर इंडिया जिस तरह हर बरस दसियों हजार करोड़ का नुकसान देश पर थोप रही है, और अपनी खुद की संपत्ति की संभावनाओं को देख नहीं रही है, वह सिलसिला भी बदलना चाहिए। 
लेकिन जब हम सरकारी ढांचे के बेहतर इस्तेमाल की बात करते हैं, तो राज्य सरकारों को भी अपने स्कूल और कॉलेज की आधे दिन से अधिक खाली रहने वाली इमारतों के इस्तेमाल के बारे में सोचना चाहिए। हर शहर और कस्बे में तरह-तरह के बहुत से कोचिंग सेंटर चलते हैं, और वे सुबह और शाम के वक्त अधिक चलते हैं। ऐसे प्रशिक्षण संस्थानों को सरकार हर दिन कुछ घंटों के लिए अपने क्लास रूम किराए पर देकर स्कूलों को अधिक आत्मनिर्भर बना सकती है। सरकार को यह भी चाहिए कि अपनी इमारतों के अहातों पर, वहां की दीवारों पर मुफ्त लिखे हुए बाजार के इश्तहारों की जगह अपने खुद के इश्तहार वहां पर लिखवाए ताकि सरकार का प्रचार का खर्च घट सके, और सामाजिक योगदान वाली, जनकल्याण वाली योजनाओं की जानकारी सरकारी दीवारों पर रहे। 
सरकारों और स्थानीय निर्वाचित संस्थाओं को कमर कसकर किफायत भी करनी चाहिए, और कमाई के रास्ते भी ढूंढने चाहिए। आज बहुत सी सरकारें और म्युनिसिपलें अपनी संपत्ति को बेचकर या उसके व्यावसायिक इस्तेमाल से कमाई करती हैं, और बिना कल्पनाशीलता के, कम कमाई पर ही थम जाती हैं। आज जब इस देश में ऐसे काबिल और हुनरमंद लोग हैं, प्रतिभाशाली मैनेजर हैं, जो कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों के मुखिया होकर अमरीका और दूसरी जगहों पर काम कर रहे हैं, तो भारत के ऐसे मैनेजमेंट विशेषज्ञों का इस्तेमाल इस देश की क्षमता और इस देश के ढांचे के बेहतर इस्तेमाल के लिए किया जाना चाहिए। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें