राज्य की स्कूलों की बदहाली अगली पौन सदी के लिए एक कमजोर पीढ़ी देने का जुर्म

संपादकीय
08 अक्टूबर 2015

कल राज्य सरकार के स्कूल शिक्षा में उत्कृष्टता बढ़ाने के एक बड़े कार्यक्रम में पूरी सरकार की मौजूदगी में राज्य के मुख्य सचिव विवेक ढांड ने खुलकर कहा कि राज्य के स्कूली बच्चों की शिक्षा का बहुत बुरा हाल है। उन्होंने कहा छठवीं के बच्चे पढ़ाई में दूसरी क्लास के बच्चों जैसे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री, शिक्षामंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, और बहुत से दूसरे नेताओं के सामने भी यह कहा कि हजारों करोड़ खर्च करने के बाद भी स्कूली शिक्षा का यह हाल है। यह बात राजनीतिक रूप से अटपटी लग सकती है क्योंकि राज्य के प्रशासन-प्रमुख ने इतनी खरी-खोटी सुना दी है, जितनी कि विपक्ष भी इस मुद्दे पर नहीं कह पाया था। लेकिन सरकार का अपने आपको आईना दिखाना भी जरूरी है वरना बजट के आंकड़े उसे ऐसा धोखा देते चलेंगे कि पांच बरस में होने वाले चुनाव में तो सत्तारूढ़ पार्टी को ठोकर लग ही सकती है, राज्य की पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक कमजोर बुनियाद पर खड़ी हो रही है, और वह किसी भी निर्वाचित सरकार के अस्तित्व से अधिक बड़ी फिक्र की बात है। 
स्कूल शिक्षा की बदहाली किसी एक मुद्दे पर नहीं है। स्कूलों में फर्नीचर सप्लाई में ऐसा व्यापक और संगठित भ्रष्टाचार है कि राज्य सरकार की अधिकतर स्कूलों में एक-दो क्लास रूम सिर्फ कबाड़-फर्नीचर से भरे पड़े हैं, और बच्चों के बैठने को क्लास रूम कम पड़ रहे हैं। यही हाल बच्चों को मिलने वाली यूनिफॉर्म का है, कई जिलों में दो के बजाय एक जोड़ा यूनिफॉर्म मिली है, और कई जगह नहीं भी मिली है। स्कूलों के प्रयोगशाला उपकरणों की खरीदी में घोटाला, वहां पर लाइब्रेरी की किताबों की खरीदी में घोटाला, स्टेशनरी से लेकर खेल के सामान तक की खरीदी में घोटाला, इन सब खबरों से प्रदेश के अखबार रंगे पड़े हैं, और गांव-गांव से यही हाल सुनाई पड़ता है। 
बच्चे पैदा होने के बाद अस्पताल का भ्रष्टाचार झेलने के बाद जो दूसरा भ्रष्टाचार पाते हैं, वह स्कूल का ही है। और स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप के मातहत ही आदिम जाति कल्याण विभाग है, और इस विभाग के तहत आने वाली स्कूलों को, आश्रम शालाओं को, स्कूल शिक्षा के तहत करने की कार्रवाई की गई है। कुल मिलाकर दोनों विभाग एक ही राजनीतिक मुखिया के मातहत हैं, और राज्य के दर्जन भर जिलों में आदिवासी बच्चों के छात्रावासों में उनके साथ बलात्कार, उनके देह शोषण के अनगिनत मामले सामने आ चुके हैं। आदिवासी इलाके नजरों और खबरों से कई बार बहुत दूर रहते हैं, और यह आम बात है कि वहां की बहुत सी खबरें दब जाती हैं, और जो सामने आती हैं, वे हंडी में पकते चावल के एक दाने के नमूने जैसी रहती हैं। 
राज्य सरकार में वैसे तो अधिकतर विभागों में भारी भ्रष्टाचार फैला हुआ है, और समय-समय पर मुख्यमंत्री से लेकर विभागीय मंत्री तक नाराजगी जाहिर करते रहते हैं, लेकिन फिर भी स्कूल शिक्षा का विभाग इस सरकार के पिछले कार्यकालों में भी ऐसे ही संगठित भ्रष्टाचार का शिकार रहा। आज इस बात को कहने के लिए हमको अलग से किसी सुबूत की जरूरत इसलिए नहीं है कि राज्य सरकार के प्रशासन-प्रमुख ने खुलकर शासन-प्रमुख के सामने सार्वजनिक मंच पर खुद होकर यह असुविधाजनक बात कही है। विवेक ढांड छत्तीसगढ़ के ही रहने वाले हैं, और वे यहीं पढ़े हैं। यहां के कई जिलों में वे कलेक्टर-कमिश्नर रहे हुए हैं। इसलिए वे अगर यह बात कह रहे हैं तो ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है कि स्कूल शिक्षा में हालत इससे जरा भी बेहतर होगी। 
राज्य सरकार को तुरंत यह सोचने की जरूरत है कि जो बच्चे आज मतदाता नहीं हैं, क्या उनको ऐसी ही दुर्गति में छोड़ देना ठीक है, या स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए कुछ किया जाना चाहिए? यह बात याद रखनी चाहिए कि सरकार के जिस किसी विभाग में लोगों को ऊपर से नीचे तक एक संगठित भ्रष्टाचार की जानकारी रहती है, उनका काम करने का उत्साह भी खत्म हो जाता है। विभाग के छोटे-बड़े ईमानदार लोगों को भी यह लगता है कि वे इतनी मेहनत आखिर क्यों करें, अगर विभाग के ही बड़े लोग लूटपाट करने में लगे हैं? यह हताशा और निराशा छत्तीसगढ़ सरकार के अधिकतर विभागों में दिख रही है, और इसकी वजह से कामकाज चौपट पड़ा है। छत्तीसगढ़ की डॉ. रमन सिंह सरकार को तुरंत ही अपना घर सुधारने की जरूरत है, क्योंकि वे सरकार के भ्रष्टाचार को मानें, या न मानें, उनकी सरकार के लोग, उनकी पार्टी के लोग, और आम जनता भी इसे जान भी रहे हैं, और मान भी रहे हैं। हमारा यह मानना है कि स्कूली शिक्षा में प्रदेश के बाहर के शिक्षकों को लाने के सरकार के फैसले का जो विरोध विपक्षी-कांग्रेस पार्टी कर रही है, उससे सौ गुना तगड़ा विरोध स्कूल शिक्षा की बदहाली का राज्य के मुख्य सचिव ने किया है, और मुख्यमंत्री को अपने ही सबसे बड़े अफसर की बात को गंभीरता से लेना चाहिए। यह नौबत बहुत खराब है, और प्रदेश के छोटे-छोटे बच्चों के हक अगर सत्तारूढ़-लूटपाट में इस तरह खाए जा रहे हैं, तो यह इस प्रदेश को अगली पौन सदी के लिए एक कमजोर पीढ़ी देने का जुर्म है। 

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