नेताओं को ईमानदार अफसर विपक्ष में रहने तक सुहाते हैं

संपादकीय
29 नवंबर 2015
हरियाणा में एक बड़बोले मंत्री ने जिले की एक बैठक में शराब की अवैध बिक्री को लेकर सवाल-जवाब के दौरान वहां की महिला पुलिस अधीक्षक को बैठक से निकल जाने के लिए कहा। इस बदतमीजी के जवाब में अफसर ने बैठक से जाने से इंकार कर दिया तो मंत्री खुद ही अपने समर्थकों सहित वहां से निकल गए। चौबीस घंटे के भीतर इस दलित महिला आईपीएस का तबादला कर दिया गया। चूंकि यह पूरा मामला वीडियो रिकॉर्डिंग की शक्ल में इंटरनेट और टीवी पर मौजूद है, इसलिए देश भर में इसे लेकर हरियाणा की खट्टर सरकार की धिक्कार हो रही है। लेकिन हमको इसमें हैरानी की कोई बात नहीं लगती। ये मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ही हैं जिनका एक बयान महिलाओं को लेकर कुछ समय पहले आया था कि अगर महिलाओं को आजादी चाहिए, तो वे बिना कपड़ों के क्यों नहीं घूमतीं? 
हरियाणा में एक तरफ तो खाप पंचायतों की दकियानूसी सोच हमेशा ही खबरें खड़ी करती रहती है, दूसरी तरफ वहां महिलाओं की समाज में जगह इससे भी पता लगती है कि देश में लड़के-लड़कियों का अनुपात सबसे खराब हरियाणा में ही है, वहां के लोग बेटियों को जन्म के पहले ही मार डालने के आरोप झेलते हैं, और बाद में अपने बेटों के लिए दूसरे प्रदेशों से लड़कियां तरह-तरह से जुटाने की तोहमत भी उन पर लगती है। यह ऐसा प्रदेश भी है जहां की लड़कियां, जब उनको मौका मिलता है, वे दुनिया भर के खेल मुकाबलों से मैडल लेकर आती हैं। लेकिन यह प्रदेश लड़कियों को बराबरी का हक देना तो दूर रहा, उनको इंसान मानने से भी इंकार करने वाले प्रदेशों में माना जाता है, और हरियाणा की खाप पंचायतों की हत्यारी सोच के खिलाफ लगातार लिखा भी जाता है। दूसरी तरफ राजनीतिक ताकतें हैं जो कि अपने वोटों के लिए इन खाप पंचायतों के खिलाफ मुंह खोलने से भी डरती हैं, और कांग्रेस हो या भाजपा वे खाप पंचायतों को जिंदा रखना चाहती हैं, साथ रखना चाहती हैं। और तो और इंदिरा और सोनिया की पार्टी के पिछले कांग्रेसी मुख्यमंत्री खाप पंचायतों का गुणगान करते थकते नहीं थे, जब इन पंचायतों पर हत्या के फतवे जारी करने, हत्याएं करवाने जैसे आरोप लगे थे। 
अब यहां पर दो सवाल और है, एक तो दलित लड़की अपने दम पर आईपीएस बन रही है, और उसके अच्छे काम की चारों तरफ चर्चा भी है। ऐसे में एक बदतमीज मंत्री भीड़भरी बैठक में उससे बदसलूकी करता है, और लोकतंत्र में मिले अधिकारों के तहत सरकार उस अफसर को हटा भी देती है। लोगों को याद होगा कि इसी हरियाणा में जब एक दूसरे ईमानदार कहे जाने वाले खेमका नाम के आईएएस ने रॉबर्ट वाड्रा की जमीनों के मामलों में सरकारी मेहरबानी का भांडाफोड़ किया था, तो भाजपा ने देश भर में उसे चुनावी मुद्दा बनाया था। इसके बाद हरियाणा में भाजपा की सरकार बनी, और खेमका को उठाकर ऐसे हाशिए पर फेंका गया, कि आज उनका ओहदा भी किसी को याद नहीं है। अच्छे अफसरों को लेकर राजनीतिक दल तब तक ही खुश रहते हैं, जब तक कि वे अफसर उनके मातहत न हों। जब कड़क या ईमानदार अफसरों से काम लेना हो, तो राजनीतिक ताकतें उनकी जगह भ्रष्ट अफसर चाहती हैं, ताकि गलत काम कर चुके अफसरों से और गलत काम आसानी से कराए जा सकें। 
देश भर में राजनीतिक और सामाजिक ताकतों को एक काबिल और ईमानदार दलित महिला अफसर के साथ ऐसे सुलूक को लेकर एक सामाजिक जनजागरण अभियान छेडऩा चाहिए, और चाहे जो भी पार्टी ऐसा करे, उसे जगह-जगह धिक्कारना चाहिए। 

एक भाषण कड़वाहट ऐसे घटा सकता है

संपादकीय
28 नवंबर 2015

कल लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संविधान पर चर्चा के दौरान गरिमापूर्ण तरीके से आंबेडकर से लेकर नेहरू तक के योगदान का जिक्र किया और संसद में पक्ष, विपक्ष के बीच जमी हुई बर्फ को तोड़ा। शायद इसीलिए संसद के बाद शाम को सोनिया-मनमोहन चाय के उनके न्यौते पर गए, और कुछ विधेयकों पर बात हुई। सोशल मीडिया पर भी मोदी के कटु-आलोचकों और निंदकों ने उनके भाषण की तारीफ की। इस एक भाषण से देश की संंसदीय राजनीति में अनबोला खत्म सा हुआ और उम्मीद की जा सकती है कि संसद के इस जारी सत्र में कुछ काम हो सकेगा। लोग अगर याद करें तो इसके एक ही दिन पहले वित्तमंत्री अरूण जेटली ने संसद में कांग्रेस को आपातकाल को लेकर जी-भरकर कोसा और धिक्कारा था, जबकि उन्हें ही जीएसटी विधेयक पर कांग्रेस के साथ की जरूरत भी है। मोदी ने कल दरियादिली की बातें करके बात संभाली और बातचीत की संभावना फिर कायम की।
हमारा हमेशा से यही कहना रहा है कि संसद में अनबोले जैसा माहौल अलोकतांत्रिक रहता है और देश की जनता के साथ बेईमानी भी रहता है। जनता तो पांच बरस के लिए चुनकर जब भेज देती है तो वह संसद में गतिरोध के बाद भी सांसदों को वापिस तो बुला नहीं सकती। नतीजा यह होता है कि बिना काम खाने-कमाने वाले सांसदों की रियायती थाली देख-देखकर जनता उन्हें कोसती है। कल प्रधानमंत्री ने जो किया वह पहल वे पिछले सत्र में करते तो देश का इतना नुकसान नहीं होता। एक भाषण से कड़वाहट कैसेकम हो सकती है यह कल संसद में साबित हुआ है।
राजनीति के बारे में कहा जाता है कि उसमें न कोई स्थायी मित्र होते और न ही स्थायी शत्रु, और इसी सोचके साथ भारत में तालमेल की जरूरत है। पार्टियों के बीच सैद्धांतिक, नीतिगत, या मुद्दों पर असहमति तो बनी रहेगी, लेकिन बातचीतया बहस का रिश्ता टूट जाना अलोकतांत्रिक होता है। सभी पार्टियों को अपनी अकड़ और दूसरों की हेठी से अधिक देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी की फिक्र करनी चाहिए।  

गरीब आबादी की पढ़ाई और इलाज बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता

27 नवंबर 2015
संपादकीय
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन अभी-अभी एक इंटरव्यू में भारत के मौजूदा हाल को लेकर कहा है कि दुनिया का कोई भी देश अपने लोगों को बुनियादी रूप से आगे बढ़ाए बिना, उनकी प्राथमिक जरूरतों को पूरा किए बिना, उनकी पढ़ाई और इलाज का इंतजाम किए बिना आगे नहीं बढ़ सकता। उन्होंने दुनिया के कई देशों की मिसाल देते हुए भारत को इस बारे में आगाह किया कि अगर वह एक आर्थिक ताकत बनना चाहता है तो अशिक्षित और बीमार, कमजोर आबादी के साथ वह कभी इस मंजिल पर नहीं पहुंच सकता। अमर्त्य सेन को गरीबों का हिमायती, और जनकल्याणकारी योजनाओं की वकालत करने वाला अर्थशास्त्री माना जाता है, और भारत के पूंजीवादी लोग उनकी सामाजिक सोच से गहरी असहमति रखते हैं। भारत में पिछली सरकार से लेकर इस सरकार तक ऐसे लोग कम नहीं हैं जो कि यह मानते हैं कि सामाजिक क्षेत्र में सरकार द्वारा दी गई सबसिडी से देश की आर्थिक हालत तबाह हो रही है। लेकिन अमर्त्य सेन का सोचना अलग है। सबसे गरीबों के आर्थिक और सामाजिक विकास को जरूरी बताने के साथ-साथ अमत्र्य सेन ने यह भी कहा कि जैसा कि अभी आरबीआई गवर्नर ने कहा है, देश में सहिष्णुता भी विकास के लिए जरूरी है।
हम अमर्त्य सेन की बातों से सहमत हैं, और पूंजीवाद को उनकी सोच में यह खोट दिख सकती है कि समाज कल्याण में और गरीबों को रियायत में सरकारी पैसे की बर्बादी बहुत होती है। ऐसा मानने वाले लोग भी कम नहीं हैं कि सबसिडी का अधिकांश हिस्सा चोरी में चले जाता है। लेकिन हमारा सवाल यह है कि ऐसी चोरी करने वालों में उन लोगों का तो कोई योगदान नहीं रहता जो कि इन रियायतों के असली हकदार हैं। जो गैरगरीब लोग सरकार में हैं, वे ही चोरी करते हैं, और चूंकि सरकारी चोरी को रोकने में लोग नाकाम रहते हैं, इसलिए इसे सबसिडी के खिलाफ एक तर्क बनाकर इस्तेमाल कर लिया जाता है।
हम अभी-अभी संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट का जिक्र करना चाहेेंगे जो बताती है कि कुछ दशकों के भीतर ही, 2050 तक दुनिया में कामकाजी लोगों की कमी पडऩे लगेगी। और इस रिपोर्ट के आकड़े अगर देखें, तो यह साफ है कि भारत की आबादी उसका बोझ नहीं है, वह उसकी दौलत है। अगर वह सेहतमंद रहे, और अगर वह पढ़ी-लिखी रहे, प्रशिक्षित रहे, हुनर सीखी हुई रहे, तो वह पूरी दुनिया में कमाकर देश का घर भर सकती है। 
इस रिपोर्ट के मुताबिक- एक तरफ भारत जैसे देश में सरकारी मेहनत से आबादी को काबू में रखने की भरसक कोशिश चल रही है और इसे एक आबादी-बम करार दिया जा रहा है कि भारत में लोगों के रहने-खाने को जगह नहीं बचेगी। दूसरी तरफ आने वाले बरसों को लेकर संयुक्त राष्ट्र का एक अंदाज यह है कि दुनिया एक दूसरे किस्म के आबादी-बम पर बैठी हुई है, और वह है घटती हुई आबादी का। विशेषज्ञों का एक अनुमान यह है कि 2050 में काम करने वाले लोग बहुत कम रह जाएंगे और वह दुनिया के लिए एक बहुत बड़ी समस्या होगी। 
अमरीका के कारोबारी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल में छपी एक रिपोर्ट में आबादी के भविष्य के आंकड़े पेश किए गए हैं। उनके मुताबिक अगला बरस ही दुनिया के विकसित देशों के लिए ऐसा पहला बरस होने जा रहा है जब वहां की कामकाजी आबादी 1950 के मुकाबले कम रह जाएगी। और एक अंदाज है कि 2050 तक यह कामकाजी आबादी 5 फीसदी घट जाएगी। चीन और रूस जैसे बढ़ते हुए बाजारों मेें भी कामगारों की कमी होने लगेगी, और उसी दौर में इन देशों में 65 से अधिक उम्र वाली आबादी आसमान छूने लगेगी। मतलब यह कि दुनिया की सबसे संपन्न अर्थव्यवस्थाएं कामगारों को तरस जाएंगी। 
हम अमर्त्य सेन की सोच, और संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों को मिलाकर देखें तो यह साफ-साफ तस्वीर उभरती है कि भारत के लोगों को काबिल बनाकर, सेहतमंद बनाकर यह देश आगे बढ़ सकता है, और ऐसा होने पर ही आगे बढ़ सकता है। इसके बिना दुनिया की कोई भी बड़ी अर्थव्यवस्था कभी आगे नहीं बढ़ी है। इसलिए इस देश के गरीब तबके की बुनियादी जरूरतों को पूरा करके उनका जीवनस्तर एक न्यूनतम सीमा के ऊपर लाना जरूरी है, और पांच-पांच बरसों में बंटे हुए जिन वित्तमंत्रियों को यह बोझ लगता है, वे लोग देश के भविष्य को अनदेखा करने के कुसूरवार के रूप में इतिहास में दर्ज होंगे।

कुचले जा रहे संविधान के बीच समारोह गैरजरूरी, नाजायज

संपादकीय
26 नवंबर 2015

संविधान दिवस पर आज प्रधानमंत्री से लेकर केन्द्रीय गृहमंत्री तक संविधान की तारीफ में, और उसके प्रमुख-निर्माता डॉ. बाबा साहब आंबेडकर के तारीफ में संसद और बाहर बड़ी-बड़ी बातें बोल रहे थे। आज के इस सालाना जलसे में ऐसी बहुत सी बातें और कही जाएंगी, जिन पर अमल न तो इन शब्दों के पहले हो रहा है, और न ही इन शब्दों के बाद। यह एक बड़ी अजीब सी हिन्दुस्तानी बात है कि महान लोगों को याद करते हुए, शहीदों को याद करते हुए, उनके बारे में महानता की वे तमाम बातें कही जाती हैं, जिनमें से किसी पर अमल करने की न नीयत होती है, न वैसा बर्ताव होता है। जब मोदी विदेशों में गांधी को याद करते हैं, तो हिन्दुस्तान में गोडसे की पूजा करने की कोशिश होती है, और उसका कोई विरोध मोदी की तरफ से नहीं होता। इसी तरह जब आज इस देश में जगह-जगह दलितों से बलात्कार हो रहा है, उनकी हत्या हो रही है, उन्हें मंदिरों में घुसने से रोका जा रहा है, और खासकर भाजपा के राज वाले मध्यप्रदेश में ऐसी घटनाएं सबसे अधिक हो रही हैं, तब इन पर कुछ भी न बोलकर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री आज संविधान के बारे में जितना कुछ भी कहें, उन बातों का कोई वजन नहीं लगता। और आज संसद में आंबेडकर का इस्तेमाल गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने असहिष्णुता पर फिक्र करने वाले आमिर खान पर हमला करने के लिए भी कर लिया, और कहा कि उपेक्षा के बावजूद आंबेडकर ने देश छोडऩे की बात कभी नहीं कही। 
आज भारत में संविधान के शब्दों और उसकी भावना को जिस तरह और जिस हद तक कुचला जा रहा है, उस पर चुप्पी रखकर, उसे एक अपवाद साबित करने की कोशिश करके संविधान का जलसा बिल्कुल ही बेमानी है। आज इस लोकतंत्र में अगर किसी दस्तावेज की भावना को उस पर चढ़कर कूद-कूदकर कुचला जा रहा है, रौंदा जा रहा है, तो वह संविधान ही है। और यह बात अगर शब्दों से परे असल जिंदगी में हो, तो संविधान की लुग्दी ही बन चुकी होती। आज का यह जलसा, आज का संविधान दिवस लोगों को उनके कुचले जा रहे संवैधानिक अधिकारों की याद अधिक दिला रहा है। ऐसे हर सालाना जलसे लोगों को नाम से परे असल हालत की याद अधिक दिलाते हैं। 
कभी गांधी, कभी भगत सिंह, कभी सरदार पटेल, और कभी विवेकानंद, ऐसे लोगों के नाम और चेहरों का इस्तेमाल करके जब लोग और संगठन एक नाजायज सम्मान पाने की कोशिश करते हैं, तो आम लोग तो उस झांसे में आ जाते हैं, लेकिन जो जागरूक लोग हैं वे ऐसी कोशिश के भीतर के विरोधाभास को तुरंत समझ लेते हैं। लोगों को ऐसे लोगों की लिखी और कही हुई बातें एक बार फिर ढूंढने की जरूरत महसूस होती है, और लोग यहां तक निकाल लेते हैं कि सावरकर ने गाय को खाने से परहेज को कैसे गलत करार दिया था। आज का संविधान दिवस इस देश में बिल्कुल ही खोखला और गैरजरूरी है। देश की नौबत इतनी खराब है, खास और आम के बीच का फर्क इतना अधिक हो गया है, कि संविधान के रास्ते से पाई हुई ताकत से लोग बाकी लोगों के संवैधानिक अधिकारों को कुचलने का काम कर रहे हैं। जिस देश में साल के बाकी तमाम दिन, और संविधान दिवस के दिन समारोह से परे के बाकी तमाम घंटे देश के सबसे कमजोर तबकों, अल्पसंख्यकों, आम लोगों के अधिकारों की हत्या के हों, वहां पर संविधान दिवस निहायत गैरजरूरी, नाजायज, और चुभने वाला समारोह है। इसे मनाने वाले लोग अगर ईमानदार हैं तो उन्हें संविधान के शब्द और उसकी भावना का सम्मान करना सीखना चाहिए। 

मन की बात कहने का हक भी नहीं है आमिर खान को?

संपादकीय
25 नवंबर 2015

आमिर खान के बयान पर देश में दो तबके उबले पड़े हैं। एक तो धर्मान्ध तबका है जो कि देश में बढ़ाई जा रही साम्प्रदायिकता पर मंत्रमुग्ध है, और भारतीय लोकतंत्र को एक धर्मराज्य में तब्दील करने पर आमादा है। दूसरा तबका उन लोगों का है जो इस बढ़ती हुई असहिष्णुता के खिलाफ हैं, और सचमुच डरे हुए भी हैं, और लड़ भी रहे हैं। लेकिन देश में सबसे हमलावर तेवरों के साथ जो लोग एक हिंदुत्व लागू करना चाहते हैं, लादना चाहते हैं, उनके पास हर असहमति के लिए एक बड़ा आसान समाधान है कि जो इस हमले से असहमत हैं, वे पाकिस्तान चले जाएं। आज देशद्रोह की परिभाषा बहुत आसान हो गई है, कि जो लोग आक्रामक राष्ट्रवाद का झंडा-डंडा लेकर चलने को तैयार नहीं हैं, जो लोग मोदी के आलोचक हैं, जो लोग गोमांस के आरोप में इंसान की हत्या के खिलाफ हैं, जो लोग भारतीय लोकतंत्र में धर्मों की गैरबराबरी के खिलाफ हैं, वे तमाम लोग देश छोड़कर चले जाएं, और उनके लिए मानो थोक में पाकिस्तान के वीजा का इंतजाम नफरतजीवियों ने कर रखा है। 
यह देश में एक साम्प्रदायिकता भड़काने की सोची-समझी साजिश है जिसके तहत साम्प्रदायिकता-विरोधी लोगों को अपने मन की बात करने से भी रोका जा सकता है। फिल्म अभिनेता आमिर खान ने महज इतना कहा था कि उनकी पत्नी किरण राव ने घर पर बातचीत में देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता पर फिक्र जाहिर करते हुए कहा था कि क्या इस देश में रहना सुरक्षित है, या बच्चों की सुरक्षा के लिए कहीं बाहर चले जाना चाहिए? इतनी सी बात को लेकर देश के लोग उन पर टूट पड़े हैं, और उनके नाम गालियों का अंबार लग गया है। अब सवाल यह है कि जो माहौल देश में पिछले एक बरस से खबरों में है, चर्चा में है, बहस का मुद्दा है, वह अगर किसी के मन में उठे, तो क्या उस पर लाठियां लेकर इस तरह टूट पड़ें? 
यह एक हकीकत है कि आज देश में साम्प्रदायिक बर्दाश्त खत्म किया जा रहा है। देश में एक धर्मान्ध आक्रामकता लागू की जा रही है। और देश में सनातनी हिन्दू सभ्यता के कुछ गिने-चुने मूल्यों को बाकी आबादी पर लादा जा रहा है, जिनसे कि हिन्दू आबादी का भी अधिकांश हिस्सा असहमत हैं। इस बढ़ती हुई बेचैनी को देश में करोड़ों लोग सोशल मीडिया पर उठा चुके हैं, और बड़े-बड़े नामी-गिरामी विचारक, साहित्यकार, कलाकार, वैज्ञानिक, और लेखक-पत्रकार इस बारे में लिख चुके हैं। देश के राष्ट्रपति एक से अधिक बार इस बारे में बोल चुके हैं, और फिक्र जाहिर कर चुके हैं। देश के भीतर इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखने वाले प्रधानमंत्री भी दूसरे देशों में जाकर भारत की सहनशीलता और संस्कृति की विविधता के बारे में बड़ी-बड़ी बातें बोलकर आ गए हैं। लेकिन देश के भीतर प्रधानमंत्री के संगी-साथी किसी भी आलोचना या किसी भी सहमति को पाकिस्तान भेजने पर आमादा हैं। 
यह बात जाहिर है कि भारत की फौजी लड़ाई, फौजी दुश्मनी, पड़ोस का सबसे बड़ा टकराव सिर्फ पाकिस्तान के साथ है। ऐसे में किसी को पाकिस्तान जाने की सलाह देने देश छोड़कर किसी दूसरे देश जाने की सलाह देना नहीं है, वह एक दुश्मन -देश जाने की सलाह देना है। और इस बात को तो प्रधानमंत्री के आसपास के लोग, उनके साथी-संगठन सौ-सौ बार बोल चुके हैं कि देश के माहौल की आलोचना करने वाले गद्दार लोग हैं, देशद्रोही हैं, और उनको पाकिस्तान चले जाना चाहिए। असम के राज्यपाल ने अभी दो दिन पहले ही जिस घोर साम्प्रदायिक जुबान में इस देश को महज हिन्दुओं का देश करार देने की कोशिश की है, वह अकेली बात उनकी राजभवन की बर्खास्तगी के लिए काफी होनी चाहिए थी, अगर देश का सुप्रीम कोर्ट इस बयान का नोटिस लेता।
इस देश में जिस धर्म के भी, जो भी लोग यहां के नागरिक हैं, वे तमाम लोग अपनी पसंद से यहां बसे हैं, और उनका हक किसी भी दूसरे नागरिक के मुकाबले कम नहीं है। इसलिए वैचारिक असहमति और आलोचना को लेकर किसी को गद्दार, किसी को देशद्रोही, किसी को देश का दुश्मन साबित करना एक शर्मनाक बात है। प्रधानमंत्री देश के बाहर जाकर दरियादिली के बयान देकर देश की हालत को नहीं सुधार सकते, इसके लिए उनको अपने ही संगी-साथियों को काबू में करना होगा, अगर वे ऐसा चाहते हैं तो। 

घटते-सिमटते मैदान, और बढ़ते स्टेडियमों वाला प्रदेश

संपादकीय
24 नवंबर 2015

छत्तीसगढ़ में देश-विदेश की टीमें आकर बड़े-बड़े मैच खेल रही हैं, और इनसे बड़ी-बड़ी खबरें निकलती हैं, यहां के लोगों को पहली बार ऐसे कैमरे देखने मिल रहे हैं, और राज्य एक-एक कर बड़े-बड़े स्टेडियमों से सजते चल रहा है। लेकिन इसके साथ जुड़ी हुई खेल की कुछ ऐसी बातें हैं जिनको अनदेखा करना इस राज्य को हमेशा के लिए दर्शक बनाकर रखेगा। राज्य में सैकड़ों करोड़ की लागत से बड़े स्टेडियम और उससे जुड़े हुए दूसरे ढांचे तो तैयार हो रहे हैं, लेकिन गांव-कस्बे और शहर के छोटे-छोटे स्कूली मैदान, कॉलोनियों के मैदान धीरे-धीरे कर सिमटते जा रहे हैं। उन पर या तो अवैध कब्जे हो रहे हैं, या सड़कों को चौड़ा करने के लिए राजधानी रायपुर में ही सारे बड़े मैदानों को घटाकर छोटा कर दिया गया है, और उसमें से कई तो अब किसी बड़े खेल के लायक बचे नहीं हैं। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती है। अगर इस प्रदेश की राजधानी कोई संकेत है, तो फिर मैदानों का बाजारू और कारोबारी इस्तेमाल इतना बढ़ गया है कि खिलाडिय़ों को खेलने के लिए वे नसीब ही नहीं हैं। एक के बाद एक प्रदर्शनी और बिक्री इन मैदानों पर लदी रहती हैं, और खिलाडिय़ों की कोई आवाज नहीं बची है। महंगे खेल और संपन्न खिलाड़ी तो क्लबों में चले जाते हैं, लेकिन असंगठित छोटे-छोटे खिलाड़ी, बिना टूर्नामेंट वाले बच्चे मैदानों को खोते जा रहे हैं। 
दूसरी तरफ इसी राज्य का यह अनुभव है कि जिन शहरों में साफ-सुथरे बाग-बगाचे बने हैं, वहां पर हजारों लोग रोज जाने लगे हैं, और अपने तन-मन का भला करने लगे हैं। अगर अच्छी सहूलियतें हों, तो लोग उनमें दिलचस्पी लेते हैं। लेकिन जिस प्रदेश में सौ-पचास साल पुराने चले आ रहे मैदानों के काट-काटकर छोटा कर दिया गया है, उस प्रदेश में खिलाड़ी बनने के बजाय दर्शक ही अधिक बनने की संभावना दिखती है। राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह खेल संगठनों से सीधे जुड़े हुए हैं, और करीब-करीब हर बड़े खेल-आयोजन में वे नजर आते हैं। लेकिन राज्य सरकार की ऐसी कोई नीति अभी तक सामने नहीं आई है जो कि मैदानों को छोटा होने से बचाए। शहरी ढांचे के विकास के लिए भी अगर किसी मैदान को किसी कोने से कम करना है, तो किसी दूसरी तरफ पहले मैदान को उतना बढ़ाया जाए, ऐसी कोई योजना न राज्य में है, और न ही म्युनिसिपल जैसी किसी संस्था के पास। शहर के बीच जो गिनी-चुनी खाली जगहें बची भी हैं, उन पर नगर निगम या विकास प्राधिकरण जैसी संस्थाएं व्यावसायिक प्रोजेक्ट बनाने में लगी हैं, बजाय ऐसी खुली जगहों को मैदान या उद्यान के काम में लाया जाए। 
दुनिया के कोई देश घटते हुए खेल मैदानों के साथ, या खेल मैदानों पर बाजारू प्रदर्शनियां लगाकर आगे नहीं बढ़ सकते। राज्य सरकार की तरफ से कई बार यह बात सामने आती है कि खेल मैदानों को गैर खेल उपयोगों के लिए नहीं दिया जाएगा, लेकिन राजधानी में सरकार के ही मंत्री-मुख्यमंत्री इन्हीं मैदानों पर प्रदर्शनियों के उद्घाटन के लिए आए दिन जाते रहते हैं। बड़े स्टेडियम और अंतरराष्ट्रीय मैच तो ठीक हैं, लेकिन क्या छत्तीसगढ़ी नौजवान पीढ़ी को महज दर्शक बनाकर रखना काफी है, या फिर स्कूल-कॉलेज के बच्चों के खेल के मैदान बचाना जरूरी है? मुख्यमंत्री को पूरे प्रदेश से सिर्फ यही रिपोर्ट बुलवाना चाहिए कि पिछले दस-बीस बरसों में खेल के मैदानों का आकार कितना रह गया है, और उनका कितना बाजारू या धार्मिक-सामाजिक-राजनीतिक इस्तेमाल होता है, और कितने दिन मैदान पर हो चुके गड्ढों के बीच बच्चे खेल पाते हैं? जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक छत्तीसगढ़ एक जिंदा टीवी स्क्रीन के सामने बैठकर बड़े-बड़े मैच देखने वाला दर्शक बना रहेगा। 

कतरा-कतरा खूबियों और खामियों से बनती धारणा...

संपादकीय
23 नवंबर 2015

लोगों का मूल्यांकन करते हुए दुनिया उनकी खूबियों और खामियों के बीच कई बार उलझ जाती है। अभी किसी ने इटली के कुछ सदी पहले के एक सबसे चर्चित कलाकार लियोनार्दो दा विंची की इस खूबी के बारे में लिखा कि वे बाजार में बिक रहे पशु-पक्षियों को इसलिए खरीद लेते थे, कि वे उनको आजाद कर सकें। लेकिन इटली के उन्हीं के जीवनकाल के दूसरे पहलू को देखें तो यह दिखता है कि वहां पर दास प्रथा कायम थी, और गुलाम खरीदे-बेचे जाते थे, और इस कलाकार की मौत के बरसों बाद पोप ने गुलाम प्रथा के खिलाफ फतवा जारी किया था। अब पशु-पक्षियों को आजाद करने की खूबी तो है, लेकिन उसी दौर में इंसानों की मंडी के खिलाफ कुछ न कहने की बात के मुकाबले यह बात दब जानी चाहिए थी। 
आज भी दुनिया भर में बहुत से लोग बेईमानी से करोड़ों कमा लेते हैं, और उसमें से कुछ लाख खर्च करके समाजसेवा का कोई ऐसा काम करते हैं जो कि सामने दिखता है। सतह पर देखकर अपना मन तय करने वाले लोग ऐसे लोगों को महान समाजसेवक मान लेते हैं, और उनके गुणगान करने लगते हैं। ऐसा ही दुनिया के बहुत से लोगों के शाकाहारी होने, या उनके शराब न पीने, या उनकी जिंदगी बहुत अनुशासित होने को लेकर मान लेते हैं, और उनके सात खून माफ कर देते हैं। दुनिया के बुरे से बुरे लोगों की कुछ खूबियों को लेकर उनकी खामियों को अनदेखा करने की चूक कर बैठते हैं। 
इसी तरह अच्छे लोगों की कुछ बुरी बातों को, उनके कुछ गलत कामों, या उनकी कुछ गलतियों को लोग उनकी अच्छी बातों से ऊपर देखना और दिखाना शुरू कर देते हैं। भारत में जवाहर लाल नेहरू के जो सबसे सक्रिय आलोचक हैं, उनके पास नेहरू की दो-तीन तस्वीरें हैं। एक में वे सिगरेट पीते दिख रहे हैं, और एक में वे एडविना माउंटबेटन के साथ हंसते हुए दिख रहे हैं। इन दो को लेकर नेहरू को बदचलन साबित करने की कोशिश आधी सदी से चली आ रही है, और अब डिजिटल जमाना आ जाने के बाद लोगों को यह लगता है कि अगर इन दो तस्वीरों को चारों तरफ बांटा नहीं गया, तो उग्र-राष्ट्रवाद में योगदान देना नहीं हो पाएगा। कुछ लोग इससे भी अधिक आगे बढ़ते हैं और किसी विदेशी महिला के साथ गांधी के डांस करने की एक फर्जी तस्वीर को यह बताते हुए फैलाते हैं कि गांधी कितने बदचलन थे। 
लेकिन ऐसी साजिशों से परे अगर महज हकीकत की बात करें, तो लोगों को किसी की खूबी या खामी को एक व्यापक संदर्भ में ही देखना चाहिए। नेहरू के मांसाहारी होने को जो लोग उनके खिलाफ इस्तेमाल करते हैं, उनको यह भी सोचना चाहिए कि उनके अपने साथी इस देश में गांधी से लेकर गुजरात तक कितना लहू बहा चुके हैं। उनको यह भी याद रखना चाहिए कि जिस गाय को बचाने के नाम पर लोग वाहवाही पाते हैं, उनमें से कितने लोग ऐसे हैं जो कि गाय को लेकर इंसानों के कत्ल पर कुछ भी नहीं बोलते। ऐसे लोगों का मूल्यांकन हर एक बयान के बाद नहीं हो सकता, लेकिन जो समझदार लोग हैं वे दूसरों की खूबियों के बिना उनकी खामियों का मूल्यांकन नहीं करते, और न ही उनकी खामियों के बिना उनकी खूबियों का। 
गरीबों का हक दबाने वाले लोग जब सड़क किनारे प्याऊ और भंडारे खोलकर गरीबों की सेवा का नाटक करते हैं, तो उन्हें समाजसेवी मान लेने के पहले उनके बारे में गहराई से कुछ सोच भी लेना चाहिए। यह बात आसान नहीं है, क्योंकि यह बात बहुत कड़वाहट फैलाने वाली है, लेकिन दुनिया के जो गंभीर और जिम्मेदार लोग हैं, वे कतरा-कतरा बातों पर किसी के बारे में अपनी धारणा नहीं बनाते। इसलिए छोटी-छोटी खूबियों और खामियों से उबरकर एक व्यापक नजरिए से लोगों के बारे में, मुद्दों के बारे में सोचना सीखना चाहिए।

आतंकियों पर हमला तो ठीक, लेकिन हमलावर एकराय नहीं

संपादकीय
22 नवंबर 2015

पेरिस पर हुए ताजा आतंकी हमलों के बाद जिस तरह संयुक्त राष्ट्र संघ ने आईएसआईएस नाम के स्वघोषित इस्लामी आतंकी संगठन को खत्म करने के लिए दुनिया को मंजूरी दी है, वह देखने लायक है। यह संगठन तो दुनिया के किसी कानून के लिए जवाबदेह नहीं है, लेकिन जो इजराइल इसी संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य है, उस इजराइल के आए दिन फिलीस्तीन पर होने वाले हमलों, और हर बरस मारे जा रहे हजारों फिलीस्तीनियों को लेकर संयुक्त राष्ट्र अपने ही खुद के प्रस्तावों को पिछले कई दशकों में लागू नहीं करवा पाया है। इसलिए लोगों के बीच ये सवाल उठने जायज है कि क्या किसी एक देश की जिंदगी, किसी दूसरे देश की जिंदगी से अधिक अहमियत रखती है? जिस तरह अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र की तमाम नसीहतों के खिलाफ जाकर इराक पर हमला किया, और वहां पर व्यापक जनसंहार के रासायनिक हथियार होने के गढ़े हुए झूठे सुबूतों के आधार पर फौजी कार्रवाई की, वहां के शासक की हत्या की, और संयुक्त राष्ट्र बैठे चुपचाप देखते रहा, उससे अब दुनिया के कारोबार में इस पंचायत पर सवाल उठ रहे हैं, और ये सवाल भी उठ रहे हैं कि अगर संयुक्त राष्ट्र नहीं तो फिर कौन? 
सीरिया पर हुए ताजा हमलों को देखें, तो मुस्लिम देशों की अपनी आपसी दुश्मनी भी सीरिया पर निकलते दिखती है, सउदी अरब जैसे सबसे संपन्न देशों की आतंकी-फंडिंग भी दिखती है, और यह बात भी उभरकर दिखती हैं कि मक्का का रखवाला देश किस तरह लाखों मुस्लिमों को मारने वाले आतंकी संगठनों का मददगार बना हुआ है। लेकिन आज एक नया सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सीरिया जैसा इलाका गांव की गरीब की लुगाई हो गया है कि जिसका हाथ जो चाहे जाकर थाम ले? उधर अमरीका या फ्रांस अपने हिसाब से सीरिया पर हमला करते हैं, इधर रूस ने सीरिया पर हमले किए, और वहां पर काम कर रहे, कुछ हिस्सों पर काबिज आतंकी संगठनों पर हमला करने के अपने-अपने फैसले लेते रहते हैं। ऐसे में क्या सीरिया दुनिया की इन बड़ी ताकतों का एक फ्री-स्टाइल अखाड़ा नहीं बन गया है? आज कहने के लिए तो ये बड़े देश, दुनिया की ये सबसे बड़ी फौजी ताकतें आतंकी संगठनों पर हमला कर रही हैं, लेकिन कब किसको आतंकी माना जाए, और उस पर कितनी ताकत का कैसा हमला किया जाए, और कब कितने बेकसूरों की साथ होने वाली मौतों को जायज माना जाए, इसे लेकर दुनिया के देश अलग-अलग सोचते हैं। क्या आतंकियों पर हमले की ऐसी अलग-अलग फौजी कार्रवाईयां कल के दिन आपस में टकराव का एक नया मुद्दा नहीं बनेंगी? और उस दिन इनमें सुलह किस तरह से होगी? आज सीरिया की सरकार अपने घरेलू आतंक के सामने बेबस है, और वह बाहर से आ रही ऐसी फौजी मदद का स्वागत कर रही है, लेकिन सीरिया का यह मैदान कब महाशक्तियों के दंगल में बदल जाएगा, इसका क्या ठिकाना है? 
और रूस तो फिर भी एक हद तक भरोसेमंद देश माना जाता है, अमरीका तो एक ऐसे गिरोह का सरगना है जो कि झूठे केस खड़े करके, पश्चिम के देशों को डरा-धमकाकर अपनी हमलावर फौज में शामिल करता है, और एक के बाद दूसरे देश पर हमला करता है, उन पर कब्जा करता है। ऐसे में रूस और अमरीका की अलग-अलग फौजी कार्रवाईयां चाहे एक ही आतंकी संगठन के खिलाफ क्यों न हों, वे आपसी सहमति और सर्वसम्मति की कार्रवाई नहीं बन सकतीं। दुनिया के कारोबार में इन दो महाशक्तियों की योजनाएं बिल्कुल अलग-अलग हैं, और परस्पर टकराव की भी हैं। कल के दिन अगर रूस इजराइल पर ऐसी ही आतंकी कार्रवाई का आरोप लगाकर हमला करे, तो अमरीका की क्या सोच होगी? इसलिए दुनिया में संयुक्त राष्ट्र की सोच जैसे एक संगठन की जरूरत है, जो कि सच में असरदार भी हो। आज तो अमरीका जैसा देश अपनी ताकत से बददिमाग होकर पर्यावरण के मुद्दों पर भी बाकी पूरी दुनिया को हिकारत से नकार देता है, और अपनी मर्जी से काम करता है। और उसकी ऐसी ही हिकारत बाकी दुनिया के जिंदा रहने के हक पर भी हैं। लेकिन हाल के बरसों में पहली बार रूस ने अपनी सरहद से परे अपनी फौजी मौजूदगी दर्ज कराई है, और लोग उत्सुकता से उसकी इस नई भूमिका, उसके इस नए रूख को देख रहे हैं, और अधिक दखल के साथ रूस अमरीकी हमलावर तेवरों पर एक नकेल भी बन सकता है। लेकिन अभी ऐसी किसी अटकल से दूर हम इस मुद्दे पर महज चर्चा कर रहे हैं, और आगे यह पता नहीं कौन सा रूख लेगा। 
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तथ्यों का जवाब विशेषणों से देने की भारतीय राजनीति

21 नवंबर 2015

संपादकीय
भाजपा के एक प्रमुख और बड़बोले नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने राहुल गांधी पर एक तगड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि ब्रिटेन की एक कंपनी में वे डायरेक्टर हैं, और इस कंपनी के कागजात में उन्होंने अपने को ब्रिटिश नागरिक बताया है, और यह भारत के चुनाव कानून के भी खिलाफ है, और भारत के विदेशी मुद्रा कानून के खिलाफ भी। उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखकर इस पर जांच मांगी। दूसरी तरफ राहुल गांधी ने कांग्रेस की एक बड़ी सभा में मंच से प्रधानमंत्री को चुनौती दी कि वे इस मामले की जांच करवाएं, और अगर वे कुसूरवार हैं, तो उन्हें जेल भेजें। लेकिन पिछले चार दिनों में सुब्रमण्यम स्वामी के आरोपों के तथ्यों के बारे में कांग्रेस ने कुछ नहीं कहा है। खुद राहुल ने भी स्वामी को मोदी का चमचा कहा, लेकिन किसी तथ्य का खंडन नहीं किया। यह पहला मौका नहीं है जब लोग तथ्यों का जवाब तथ्यों से देने के बजाय विशेषणों से दे रहे हैं। जब स्मृति ईरानी पर फर्जी डिग्री का आरोप लगा, जब रॉबर्ट वाड्रा पर जमीनों के धंधे में सरकारी ताकत के बेजा इस्तेमाल का आरोप लगा, जब राहुल-सोनिया पर नेशनल हेराल्ड कंपनी को लेकर अदालत तक मामला गया, तब जवाब तथ्यों में सामने नहीं आ रहे। दोनों ही पार्टियों के पास, बल्कि राजनीति में हर पार्टी के पास, सुप्रीम कोर्ट के बड़े दिग्गज वकील हैं, लेकिन तथ्यों और तर्कों के जवाब में विशेषण खोखले लगते हैं। 
भारतीय राजनीति में यह बड़ी विचित्र बात है कि नेता अपने पर लगने वाले आरोपों को कभी जनता की अदालत में साबित करने की बात करते हैं, और कभी कानून की अदालत में। हमारा अनुभव यह रहा है कि जब नेताओं के खिलाफ मामला कानूनी रूप से पुख्ता होता है, तो वे जनता की अदालत में जाकर चुनाव में अपने को सही साबित करने की बात करते हैं, और जब उनके खिलाफ आरोप कानूनी रूप से कमजोर रहते हैं, तो वे जनता के बीच जाकर ऐसी सार्वजनिक चुनौती देते हैं कि सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करे। यहां पर ऐसे नेताओं तक पहुंच वाली राजधानियों की मीडिया की कमजोरी भी सामने आती है कि वह बिना तीखे सवालों के, महज बयान दर्ज करके लौट आती है, कि उसका जिम्मा मानो एक नेता के बयान को दूसरे तक पहुंचाना हो। होना तो यह चाहिए कि मीडिया के लोग पुख्ता आरोपों पर पुख्ता जवाब मांगें, और जब तक वह जवाब न मिले, नेताओं को अप्रासंगिक बयानबाजी न करने दें। हालांकि इन दिनों सोशल मीडिया अपने आप में ऐसे तीखे सवाल उठाता है, लेकिन फिर भी भारत का प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कमजोर साबित होते हैं। 
लोगों को याद होगा कि बहुत से मामलों में जब विपक्ष के पास सररकार के खिलाफ कई मुद्दे होते हैं, और उनमें से किसी एक मुद्दे पर जब सरकार बुरी तरह घिर रही हो तो विपक्ष मांग करता है कि उस मुद्दे पर सरकार श्वेत पत्र जारी करे। हमारा तो मानना है कि सरकार हो या विपक्ष, हर किसी के सामने जनता की तरफ से यह मांग खड़ी होनी चाहिए कि ऐसे किसी विवाद के मामले में संबंधित लोग श्वेत पत्र जारी करें, और खुद होकर सारे तथ्य सामने रखें। आमतौर पर पार्टियां और नेता इस बात की आड़ लेते दिखते हैं कि मामला अदालत में हैं, या मामले की जांच चल रही है, इसलिए उस पर बोलना ठीक नहीं रहेगा। लेकिन हमारा मानना यह है कि तथ्य अगर ठोस तथ्य है, तो न तो वे अदालत को प्रभावित करने के दर्जे में आते, और न ही जांच को प्रभावित करने के। फिर जांच को प्रभावित करने का काम सरकार की तरफ से आया हुआ बयान तो कर सकता है, विपक्ष का बयान किसी जांच को कैसे प्रभावित कर सकता है? और जहां तक अदालत से इंसाफ आने की बात है, तो भारत की जनता यह जानती है कि यहां की न्यायपालिका कई मामलों में आधी सदी तक कोई फैसला सुनाए बिना रह सकती है। और जनता यह भी देखती है कि मुजरिम साबित होने के बाद किस तरह बहुत से नेताओं की पार्टियां सत्ता में आ जाती हैं, उनका कुनबा मंत्री बन जाता है, जमानत पर छूटे लोग पार्टियों के पदाधिकारी बन जाते हैं, कुल मिलाकर कोई भी कार्रवाई भारतीय लोकतंत्र में लोगों की बाधा नहीं बनती।
इसलिए अब सार्वजनिक रूप से ऐसा एक माहौल बनना चाहिए कि जनता की तरफ से लोगों से ठोस सवाल पूछे जाएं, और नेता, पार्टी, या सरकार जो भी हो, उन्हें कानून की अदालत या जनता की अदालत जैसी ढाल का इस्तेमाल नहीं करने देना चाहिए। 

नीतीश की राष्ट्रीय संभावनाएं बिहार की कामयाबी पर टिकीं

संपादकीय
20 नवंबर 2015

बिहार में आज से नीतीश कुमार की एक नई गठबंधन सरकार काम सम्हाल रही है, और देश भर की नजरें इस सरकार पर दो वजहों से टिकी रहेंगी, एक तो यह कि नीतीश मोदी के एक विकल्प की तरह चर्चा में हैं, और दूसरी बात यह कि लालू-कुनबे के साथ नीतीश अपनी बेहतर-प्र्रशासन की छवि को कैसे जारी रख सकेंगे। ये दोनों ही बातें इसलिए महत्व रखती हैं क्योंकि देश अब एनडीए-मोदी के एक विकल्प की तरफ देख रहा है, और यह विकल्प कांग्रेस-रहित तो नहीं रहेगा, लेकिन कांग्रेस की अगुवाई वाला भी शायद न रहे। कहने के लिए भारतीय राजनीति में लंबे समय से गैरकांग्रेस-गैरभाजपा विकल्प की बात होती है, लेकिन देश भर की तस्वीर को देखें तो ऐसा कुछ मुमकिन नहीं दिखता है। इसलिए बिहार से भाजपा-एनडीए का जो विकल्प उभरकर सामने आया है, और जिसमें नीतीश-लालू-कांग्रेस मिलकर शानदार तरीके से जीतकर आए हैं, उसकी राज्य में कामयाबी अगर नहीं होती है, तो देश में उस मॉडल को अगले आम चुनाव के पहले ही खारिज कर दिया जाएगा। 
चुनाव जीतना एक अलग बात होती है, और सरकार चलाना एक बिल्कुल अलग बात। और यह बात पिछले आम चुनाव के बाद से अब तक खुद नरेन्द्र मोदी ने सबसे अधिक साबित की है। वे एक ऐतिहासिक जीत के बाद प्रधानमंत्री बने, और फिर मानो अगले ही दिन से सरकार और पार्टी सब कुछ उनके काबू से परे हो गए, और चुनावी मोर्चे की जीत सरकारी कामकाज के मोर्चे की जीत में तब्दील नहीं हो पाई। नीतीश कुमार के सामने भी यह एक बहुत बड़ी चुनौती रहेगी कि लालू यादव के दो बेटों के मंत्री रहते हुए, और लालू की पार्टी के बराबरी की गिनती के मंत्री रहते हुए वे एक साफ-सुथरा शासन कैसे चला पाएंगे? लालू यादव का अपना इतिहास सरकार में घोर अराजकता, और परले दर्जे के भ्रष्टाचार का रहा है, वे सजायाफ्ता हैं, और अदालती अपील के चलते हुए जमानत पर जेल से बाहर हैं। वे घोर कुनबापरस्त हैं, और धर्मनिरपेक्षता के नारे से परे उनका लोकतंत्र पर कोई भरोसा नहीं है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार इनमें से अधिकतर खामियों से परे हैं, और उनके पिछले दो कार्यकाल बेहतर रहे, और इसीलिए जनता ने इस बार इस गठबंधन को चुना, क्योंकि पहले से यह साफ था कि लालू और कांग्रेस के बावजूद मुख्यमंत्री नीतीश ही रहेंगे। 
खुद लालू यादव के लिए बेहतर यही होगा कि वे अपनी अगली पीढ़ी को एक कम बेईमान राजनीति करने का एक मौका दें, अपने बेटों को ईमानदारी से राजनीति चलाने का एक मौका दें, वरना जनता के बीच इस सुगबुगाहट में अधिक वक्त नहीं लगेगा कि भ्रष्टाचार और बेईमानी इन बेटों के डीएनए में है। इसलिए अपने बेटों की भलाई के लिए, और देश में एक नए राजनीतिक विकल्प के लिए लालू यादव को भ्रष्टाचार की अपनी हवस को काबू में रखना चाहिए। चूंकि उनकी पार्टी की सीटें नीतीश की पार्टी से भी अधिक रही हैं, इसलिए उनकी बददिमागी का एक खतरा खड़ा हो सकता है, और भाजपा-एनडीए ऐसी ही किसी नौबत की तरफ हसरत लगाए देख रही हैं। 
बिहार की चुनावी राजनीति ने कांग्रेस को उसकी जगह बता दी है। और जिस ठंडे मिजाज के साथ कांग्रेस ने बिहार में इसे बर्दाश्त किया है, उसे वैसी ही बर्दाश्त बाकी देश के लिए भी विकसित करनी चाहिए। बहुत से ऐसे मौके आते हैं जब इतिहास के बड़े लोगों को वर्तमान में छोटे लोगों के मातहत काम करना पड़ता है, और उसे किसी गुस्से या निराशा के साथ नहीं, उसे एक सबक की तरह लेना चाहिए। नीतीश कुमार देश में भाजपा गठबंधन के एक मजबूत विकल्प की तरह उभरने की संभावना रखते हैं, लेकिन यह संभावना बिहार में उनकी इस पारी की कामयाबी पर ही टिकी हुई है।

भारतीय लोकतांत्रिक चुनाव मोडऩा इस कदर आसान है?

संपादकीय
19 नवंबर 2015

लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी और भाजपा के लिए काम करने वाले अमरीका से लौटे एक भारतवंशी नौजवान प्रशांत किशोर भारतीय चुनावी राजनीति में एक जादूगर की तरह समझे जा रहे हैं। उन्होंने मोदी की जीत में मदद की, और अभी बिहार के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के लिए काम किया। वे जमीनी स्तर पर राजनीतिक विश्लेषण करने से लेकर चुनाव संचालन तक सलाह देने का काम करते रहे, और चुनाव अभियान रास्ता दिखाते रहे। अब उनके बारे में कई राजनीतिक दलों और कई प्रदेशों की तरफ से उत्सुकता से न्यौता भेजा जा रहा है कि वे उनको रास्ता दिखाएं। प्रशांत किशोर अभी कुछ बरस पहले तक भारतीय राजनीति में कहीं नहीं थे, और वे एक संगठन सिटीजंस फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस के तहत काम करते हैं, और नीतीश कुमार की ऐसी करिश्माई जीत का खासा बड़ा श्रेय उन्हें दिया जा रहा है। 
अमरीकी चुनावी राजनीति में तरह-तरह के विशेषज्ञों और संचालकों का हमेशा से एक बड़ा महंगा दखल रहते आया है, लेकिन भारतीय राजनीति में यह एक नई बात है। यहां पर पार्टियां और नेता अपने परंपरागत तौर-तरीकों से काम करते आए हैं, और मोदी ऐसे पहले नेता रहे जिन्होंने सोशल मीडिया से लेकर बाकी तरह के डिजिटल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया, और वे एक आंधी की तरह आए और छा गए। उनसे एक पीढ़ी कम उम्र के नौजवान राहुल गांधी के आसपास किसी ने सोशल मीडिया या डिजिटल मीडिया का नाम भी नहीं सुना था। लेकिन बिहार जिसे कि आमतौर पर एक पिछड़ा प्रदेश माना जाता है, और नीतीश कुमार भी अपनी पार्टी के साथ-साथ किसी तरह की आधुनिक तकनीक के लिए नहीं जाने जाते, वे भी पहली बार ऐसी विशेषज्ञ सेवा लेते देखे गए, और उसका नतीजा भी सामने है। 
हम ऐसी योजना और ऐसे चुनाव संचालन की खूबी की तो तारीफ करते हैं, लेकिन एक बात फिक्र खड़ी करती है कि क्या भारतीय चुनावी लोकतंत्र कुछ योजनाओं से इस हद तक प्रभावित किया जा सकता है? तो फिर पांच बरस के कामकाज, पचास बरस की पार्टी की साख, और नेताओं की अपनी छवि का क्या मतलब रह जाता है? अगर भारत के चुनाव कुछ कम्प्यूटर और समाज विज्ञान विशेषज्ञ इस तरह मोड़ सकते हैं, तो इसका एक मतलब यह है कि भारतीय लोकतंत्र परिपक्वता से दूर है, और इस तरह की विशेषज्ञता को कोई पैसों से हासिल करके बिना चुनावी भ्रष्टाचार के भी अपनी संभावनाएं बढ़ा सकते हैं। यह नौबत खतरनाक है। अभी तक तो हम यह मानकर चल रहे थे कि चुनावों में भ्रष्टाचार से मतदाताओं को प्रभावित किया जा सकता है, किया जाता है। लेकिन अब अगर चुनाव संचालन एक विज्ञान की तरह हो गया है, और उसे कुछ लोग राजनीति के बाहर से आकर इस हद तक प्रभावित कर सकते हैं, तो यह काम कल के दिन किसी दूसरे देश की ताकतें, भारत की कारोबारी ताकतें, या कोई आतंकी ताकतें भी खर्च करके कर सकती हैं।
भारतीय लोकतंत्र में चूंकि किसी भी नेता या पार्टी के लिए न सिर्फ ऐसा अहिंसक औजार इस्तेमाल करने की आजादी, इसलिए इस पर कोई रोक तो नहीं लग सकती, लेकिन लोगों को यह सोचना होगा कि यह सिलसिला मतदाताओं की स्वाभाविक पसंद पर किस हद तक हावी हो सकता है, और उससे कैसे जूझा जा सकता है? और फिर यह नेताओं और राजनीतिक दलों के पारंपरिक तरीकों की एक नाकामयाबी भी है, जिसके बारे में उनको सोचना चाहिए। 

आस्था और लोकतंत्र के बीच का टकराव दुनिया भर में छाया

संपादकीय
18 नवंबर 2015

पेरिस पर हुए ताजा हमलों के बाद अब अमरीका से लेकर ब्रिटेन तक, और फ्रांस से लेकर भारत तक संस्कृतियों के टकराव की एक बहस अभूतपूर्व स्तर पर शुरू हुई है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पहली बार ऐसा तीखा बयान दिया है कि इस्लाम के नाम पर किए जा रहे आतंक पर मुस्लिम समाज की प्रतिक्रिया काफी नहीं है। और यह बात भारत के उत्तरप्रदेश के आजम खान से लेकर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह तक, और ब्रिटिश संसद में लेबर पार्टी के एक बड़े नेता तक लगातार उठ रही है। अमरीका से लेकर योरप के देशों तक शरणार्थियों पर उनकी नीतियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, और इन तमाम देशों में बसे हुए मुस्लिम एक अभूतपूर्व सामाजिक तनाव का सामना कर रहे हैं। ऐसे तनाव के बीच उन लोगों की दिमागी हालत की कल्पना नहीं की जा सकती जो कि अपने घरवालों को समंदर के सफर में खोते हुए सीरिया और लीबिया से योरप पहुंच रहे हैं, और सिर छुपाने की जगह मांग रहे हैं। आज का यह तनाव पिछले कई बरसों में कभी इस दर्जे का नहीं था, और इन तमाम देशों ने वहां के स्थानीय नागरिक अपनी खुद की हिफाजत को लेकर इतने फिक्रमंद पहले कभी नहीं थे। और शायद ऐसा ही एक सांस्कृतिक टकराव खड़ा करने इस्लाम के नाम पर आतंक करने वाले आईसिस जैसे संगठनों का मकसद है, क्योंकि वे सीरिया जैसे देश में नागरिकों पर कब्जा करके अपने को हवाई हमले से भी बचाते हैं, और अपनी ताकत भी बढ़ाते हैं। 
आज दुनिया के देशों में मुस्लिम आतंकी संगठनों के हमलों की वजह से एक बहुत बड़ा टकराव खड़ा हो गया है, और लोगों को शरण देने की उदारता दिखाने वाले लोकतांत्रिक देश भी यह सोचने पर मजबूर हुए हैं कि वे क्या करें? अमरीका में राष्ट्रपति पद का चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहा एक नेता वहां की उन तमाम मस्जिदों को बंद करने की मांग उठा रहा है जहां के बारे में यह शक है कि वे इस्लाम के नाम पर कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रही हैं। पश्चिम के जो लोकतंत्र धार्मिक समानता को कड़ाई से मानते हैं, वे आज बहुत बड़ी दुविधा से गुजर रहे हैं। धर्म के नाम पर कुछ संगठन जब लगातार कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रहे हैं, तो वे देश लोकतंत्र के अपने मूल्यों पर कितना कायम रहें, और कितना खतरा झेलें? वहां पर राजनीतिक दल भी अपने देश की और अपनी उदारता के बारे में एक बार फिर सोचने को मजबूर हैं, और सरकारों को यह समझ नहीं आ रहा है कि वे रातों-रात अपनी नीतियों पर फिर कैसे पुनर्विचार करें, और कैसे आते हुए शरणार्थियों को मना करें। 
दरअसल लोकतंत्र और धर्म के बीच एक बुनियादी विरोधाभास है, और आतंकी हमलों में इस विरोधाभास को एक बार फिर सामने रखा है। यह सिर्फ इस्लाम के साथ नहीं है, बल्कि दुनिया के अधिकतर धर्मों के साथ यह बात जुड़ी हुई है कि उन्हें मानने वाले लोग अपनी आस्था को अपने देशों के संविधान से ऊपर मानते हैं, और इसे लेकर देशों के भीतर भी लगातार छोटे या बड़े टकराव होते रहते हैं। भारत में भी बाबरी मस्जिद को लेकर, शाहबानो को लेकर, या कई और मुद्दों पर धर्म और कानून के बीच टकराव होते रहा है। आस्थावान लोग कानून अपने हाथ में लेते हैं, या कि जैसा कि शाहबानो के मामले में हुआ, कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए संसद में अतिबहुमत वाली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया था। दुनिया के तमाम देशों में जहां भी कोई धार्मिक राज नहीं है, जहां भी सभी धर्मों का दर्जा बराबर है, वहां लोगों को अपने धर्म को उन देशों के संविधान के नीचे ही रखना चाहिए। जब लोग अपनी आस्था को देश के कानून के मुकाबले खड़ा करके टकराव करते हैं, तो लोग उनके धर्म को दुनिया भर में एक समस्या की तरह देखते हैं। ऐसा टकराव दुनिया के विकास के साथ कदम मिलाकर नहीं चल सकता। हर धर्म को अपने आपको आस्था और उपासना तक सीमित रखना चाहिए, और आतंक से जोडऩे के बाद किसी भी धर्म के लोग अपने धर्म के बाकी अमन-पसंद लोगों की जिंदगी भी मुश्किल कर देते हैं। आज दुनिया भर में मुस्लिम समाज के जो लोग आतंक के बिल्कुल खिलाफ हैं, वे लोग भी एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक तनाव झेल रहे हैं। और यह कहना समस्या का अतिसरलीकरण होगा कि मुस्लिम समाज को ही इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंक को रोकना चाहिए, ऐसा मुमकिन नहीं है क्योंकि ऐसे आतंकी संगठन बाकी मुस्लिमों के न तो प्रतिनिधि हैं, और न ही उनके काबू में हैं। यह कहना कुछ वैसा ही होगा कि बस्तर के आदिवासियों को चाहिए कि वे नक्सलियों को रोकें। इस्लाम के नाम पर आतंक कर रहे लोगों के खिलाफ फौजी कार्रवाई के अलावा और कुछ कारगर नहीं हो सकता, लेकिन दिक्कत यह है कि ये आतंकी उन्हीं फौजों के खड़े किए हुए हैं, जो फौजें आज उन पर बम बरसा रही है, और बेकसूर मुसलमान ऐसी फौजों और ऐसे आतंकियों के बीच पिस रहे हैं।

आत्महत्या तक बढ़ जाने वाला तनाव पहले रोकने की जरूरत

संपादकीय
17 नवंबर 2015

 बिलासपुर में एक कॉलेज छात्रा ने प्रताडऩा और रैगिंग से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। उसके परिवार ने दो दिन पहले कॉलेज के प्राचार्य से हॉस्टल वार्डन के बर्ताव की शिकायत की थी। छत्तीसगढ़ में स्कूल और कॉलेज के हॉस्टलों में, और गांव-शहर के मुहल्लों में, लड़कियों के साथ कई तरह की ज्यादतियों के मामले हर हफ्ते दो हफ्ते में सामने आते ही हैं। हर पखवाड़े या महीने कोई न कोई लड़की छेडख़ानी से त्रस्त होकर आत्महत्या कर लेती है, और पुलिस बाद में गुंडों को पकड़कर कार्रवाई करती है। बहुत से ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें लड़की का परिवार लंबे समय से कुछ गुंडों-बदमाशों के खिलाफ छेडख़ानी की शिकायत करते आया है, लेकिन कार्रवाई न होने पर थक-हारकर, निराश लड़की आत्महत्या कर लेती है।
आत्महत्या तो किसी की भी जिंदगी की आखिरी कार्रवाई होती है। लेकिन ऐसे आत्मघाती फैसले से पहले लड़की हो या लड़का, बच्चे हों या बड़े हों, वे जिस अंतहीन यातना से गुजरते हुए ऐसा फैसला लेते हैं, वह यातना और उसका दौर सरकारी रिकॉर्ड में नहीं आ पाते। हम पहले भी इसी जगह पर कई बार सामाजिक परामर्श की जरूरत बताते आए हैं कि खुदकुशी कर रहे किसानों और उनके परिवारों को, नक्सल इलाकों में नक्सलियों और पुलिस की हिंसा के शिकार लोगों और उनके परिवारों को जैसे परामर्श की जरूरत है, उस पर इस राज्य में चर्चा भी नहीं होती है। दरअसल सरकारी अस्पतालों में मनोवैज्ञानिक परामर्श की क्षमता ही नहीं है, कुछ गिने-चुने अस्पतालों में शायद एक-एक परामर्शदाता हों, लेकिन वे ढाई करोड़ की आबादी में दसियों लाख जरूरतमंद लोगों में से गिने-चुने लोगों से ही बात कर पाते होंगे। 
ऐसे में सरकार को एक नए नजरिए से सोचना चाहिए। स्कूल और कॉलेज के जो शिक्षक मनोविज्ञान पढ़े हुए हैं, उन्हें परामर्श का एक कोर्स करवाना चाहिए, और उनके स्कूल-कॉलेज में उनके काम के कुछ घंटे इस मदद के लिए रखने चाहिए। लेकिन स्कूल-कॉलेज से परे भी एक बड़ी आबादी को मानसिक परामर्श की जरूरत है, और इसके लिए सरकार को स्वयंसेवी संगठनों, या सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर कुछ करना चाहिए। आज तो प्रदेश में मेडिकल-मनोचिकित्सकों की कमी भी बहुत बुरी है, और परामर्शदाताओं की भी। राज्य सरकार को अपने मेडिकल कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालयों तक में मनोचिकित्सा और मनोविज्ञान को महत्व देने की जरूरत है, आज न इनकी सीटें हैं, और न ही परामर्शदाताओं के लिए कोई नौकरियां ही हैं। छत्तीसगढ़ में गिनी-चुनी महंगी निजी स्कूलें हैं, जहां पर कि कुछ घंटों के लिए परामर्शदाता रहते हैं। आज सामाजिक विसंगतियों के बढ़ते हुए, तरह-तरह के नए प्रेम-संबंधों के बढ़ते हुए, तरह-तरह की हिंसा सामने आ रही है। ऐसी हिंसा से निपटने के लिए समाज की कोई तैयारी नहीं है, और सामाजिक तनाव से हुए अपराधों को महज पुलिस का मामला मान लिया जाता है। 
एक दूसरी दिक्कत यह है कि राज्य में महिलाओं की सुरक्षा के लिए, या मानवाधिकार की रक्षा के लिए, दलितों और आदिवासियों के अधिकारों के लिए जो संवैधानिक आयोग बने हैं, वे भी चूंकि इसी सरकार के मनोनीत लोगों से बने हैं, इसलिए वे सरकार के लिए कोई असुविधा खड़ी करने से बचते हैं। नतीजा यह होता है कि खबरें छपती रहती हैं, कार्रवाई होती नहीं हैं, और संवैधानिक संस्थाएं भी मजे से बैठी रहती हैं। यह सिलसिला भी थमना चाहिए। ऐसी घटनाएं जब विपक्ष के उठाए खबरों में कुछ अधिक आती हैं, विपक्ष सड़कों पर उतरता है, तब जाकर सरकार और आयोग कुछ करते हैं। यह रूख भी बदलने की जरूरत है। 

इस देश में तमीजदार का सारा वक्त भड़ास में...

16 नवंबर 2015
हिन्दुस्तान के बहुत बड़े इलाके में लोगों की सोच देखनी हो तो किसी भी सार्वजनिक जगह पर थोड़ा सा वक्त गुजारना काफी होता है। किसी भी साफ-सुथरी जगह को देखते ही लोगों का मन वहां पर थूकने और हो सके तो मूतने को करने लगता है। किसी स्मारक या पर्यटन केन्द्र की कोई इमारत हो, या चट्टान हो, या किसी तरह की दीवार हो, तो लोगों के हाथ अपनी किसी मोहब्बत को वहां दर्ज करवाने को बेताब होने लगते हैं, और ऐसा न हो सके तो फिर कुदरत के दिए हुए बदन के कुछ चुनिंदा हिस्सों के नाम वहां लिखकर लोग ऐसी सुखद कल्पना में डूबे रहते हैं कि उन्हें पढऩे वाले लोगों के चेहरों पर कैसे भाव दिख रहे होंगे। 
सुबह-सुबह बगीचे में घूमने जाएं, तो लोग आसपास के दूसरे लोगों की मौजूदगी को जाने या अनजाने, अपने बदन को इस तरह खुजाते दिखते हैं, कि यह हैरानी होती है कि वे घर से रवानगी के पहले इस काम को निपटाकर कुछ मिनट लेट क्यों नहीं निकलते। जिस जगह दूसरे लोग चल रहे हों, और तेज चल रहे हों, वहां पर लोग इस अंदाज में झुंड बनाकर खड़े हो जाते हैं कि मानो बारिश के दिनों में डामर की सूखी सड़क पर खड़े होने या बैठने को बेबस जानवर हों। 
फिर आम हिन्दुस्तानियों के साथ एक दिक्कत यह भी रहती है कि वे जब तक अकेले रहते हैं, तब तक तो उनमें किसी कोने में थोड़ी सी इंसानियत बची रहती है, लेकिन जैसे-जैसे उनकी टोली के लोग बढ़ते चलते हैं, दोस्त इक_ा होने लगते हैं, वैसे-वैसे उनकी हिंसा बढऩे लगती है। और अगर यह भीड़ किसी एक जाति या धर्म की हुई, किसी एक पेशे की हुई, या किसी एक संगठन की हुई, तो लोग तुरंत हजारों बरस पहले के उस दौर में जीने लगते हैं जिसमें सबसे ताकतवर के ही अस्तित्व की गुंजाइश रहा करती थी। ऐसी भीड़ तुरंत ही आसपास के लोगों के लिए भारी हिकारत के साथ आपसी मजाक, आपसी गाली-गलौज, आपसी अश्लील बातें करने में जुट जाती है, यह मानते हुए कि भीड़ की इस ताकत के मुकाबले और तो कोई कुछ कर नहीं सकते। 
अभी मेरे शहर में एक बगीचे में महापौर ने निजी दिलचस्पी लेकर कसरत की बहुत सी मशीनें लगवाई हैं। इन पर बच्चे-बड़े, आदमी-औरत, हर उम्र और किस्म के लोग बड़े उत्साह से सेहत बनाने के लिए जुटे हुए दिखते हैं। लेकिन यहीं पर एक ही जाति के लोगों की, एक ही उम्र के नौजवानों की एक ऐसी टोली भी जुटी हुई थी, जो रोज उस बगीचे में आती है, और जहां बहुत से लोग उनको पहचानते भी हैं, लेकिन कसरत की मशीनों को लेकर दूसरों के बच्चों की मौजूदगी में, दूसरी महिलाओं की मौजूदगी में यह टोली अश्लील मजाक जोर-जोर से चिल्लाकर कर रही थी, और यह तो मानकर चल रही थी कि और लोग इसे समझते होंगे, लेकिन यह मानकर भी चल रही थी कि इतनी बड़ी टोली के मुकाबले कोई और विरोध करने खड़े नहीं होंगे। 
और भीड़ बनने के बाद हिंदुस्तानियों का बर्ताव कैसे बदलता है यह देखना हो तो ट्रेन में सफर करने वाले पुलिस वालों से लेकर फौजियों तक की वारदातें हर बरस खबरों में आती हैं कि किस तरह वे लोगों को उनकी सीटों से उठाकर बाहर फेंक देते हैं, और पूरे डिब्बों पर कब्जा कर लेते हैं। अभी कुछ महीने पहले मध्यप्रदेश के इंदौर के पास महू नाम की जगह पर शहर में फौजियों ने झगड़ा किया, और बाद में फौज के कॉलेज से और लोगों को लेकर आए और थाने में भारी तोडफ़ोड़ करके चले गए। इस देश में लोग जब एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं, तो अमूमन अच्छे काम के लिए तो नहीं होते, बुरे काम के लिए तुरंत ही एक बलात्कार पल भर में सामूहिक बलात्कार में बदलने के लिए लोग जुट जाते हैं।
हिन्दुस्तानियों के रंग देखने हों, तो उन जगहों पर देखें जहां सिगरेट पीने की मनाही हो, जहां पीने के लिए साफ पानी का इंतजाम हो। आम हिन्दुस्तानी ऐसी जगहों को जब तक धुएं से, या कुल्ला करके, पानी थूककर, नाक साफ करके जब तक गंदा न कर दें, उनके राष्ट्रवाद का पेट नहीं भरता। उनको लगता है कि वे अपनी हिन्दुस्तानी पहचान बता ही नहीं पाए। यह देश जिसे अपनी संस्कृति के एक काल्पनिक इतिहास पर एक आक्रामक घमंड है, उसे सभ्य लोगों के बीच बैठने का शऊर  भी नहीं है। यहां आने वाले विदेशी पर्यटक यहां के लोगों की वजह से नहीं आते हैं, बल्कि सैकड़ों बरस पहले कुछ दूसरे हिंदुस्तानियों की बनाई हुई इमारतों को देखने आते हैं, और आज के हिंदुस्तानियों के बावजूद आते हैं। आज के यहां के लोगों की वजह से नहीं आते, बल्कि उनके बावजूद आते हैं। इस फर्क को बारीकी से समझने की जरूरत है। 
जब आम हिंदुस्तानी अपनी बदतमीजी इस तरह दिखाते चलते हैं, तो वे अगली पीढ़ी को यही सिखाते भी चलते हैं। यहां के लोगों ने पता नहीं यह पढ़ा है या नहीं, कि चीन में वहां की सरकार ने अपने लोगों सेे बाकी दुनिया में खटकने वाली आदतें छुड़वाने के लिए औपचारिक सिखाना शुरू किया है, ताकि वे जहां जाएं वहां चीन के लिए हिकारत पैदा न करें। 
जिंदगी के बहुत छोटे-छोटे से नियम-कायदों को मानने के लिए भारत के भीतर भी उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच एक बड़ा फासला दिखता है। उत्तर को तो मानो किसी को अपनी किसी हरकत पर कोई उत्तर ही नहीं देना है। देश की यह हालत बदलनी जरूरी है, महज तस्वीर बदलने से काम नहीं चलेगा, क्योंकि न सिर्फ विदेशी सैलानी, बल्कि देशी सैलानी भी देश में जिस अंदाज में लूटे जाते हैं, जिस हद तक बदतमीजी झेलते हैं, उससे लोगों का देश के भीतर भी घूमने का उत्साह जाते रहता है। 
ऐसा नहीं कि आम हिंदुस्तानियों में भले लोग नहीं हैं, लेकिन लापरवाह, नासमझ, और बुरे लोग इतने हैं, उनका खटकने वाला बर्ताव इतना है कि किसी तमीजदार का सारा वक्त एक भड़ास में गुजरता है।

धर्म को कान पकड़कर स्कूलों से बाहर निकाल देने की सख्त जरूरत

16 नवम्बर, 2015
संपादकीय 

ब्रिटेन की स्कूलों में धार्मिक प्रार्थनाएं बंद करने का विचार चल रहा है। लेकिन एक तरफ ब्रिटेन विचार ही कर रहा है दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने घोषणा की है कि वहां एक नया कानून बना लिया गया है, और स्कूलों में धर्म की पढ़ाई को पूरी तरह से रोक दिया जा रहा है। अगर स्कूलें धर्म पढ़ाते मिलेंगी, तो उनको सजा दी जाएगी। और भारत में चारों तरफ फैलाई जा रही धार्मिक असहिष्णुता से लेकर पेरिस पर हुए ताजा धर्मांध हमले की खबरें तो हैं ही जिनके बाद आज से फ्रांस ने सीरिया की जमीन पर चल रहे आइसिस के आतंकी कैंपों पर हवाई हमले शुरू कर दिए हैं। 
दरअसल, जिंदगी में जो धर्म की जो जगह होनी चाहिए, उसे बढ़ाकर जिंदगी पर पूरी तरह और बुरी तरह थोप दिया जा रहा है। यह सिलसिला न सिर्फ जानलेवा हो रहा है, बल्कि दुनिया की तबाही भी साबित हो रहा है। देशों के बीच की तनातनी, आतंक से बचने और निपटने की महंगी तैयारी, कारोबार की तबाही, और लोगों की मानसिकता पर धर्मांध नफरत का वजन, इन सबके बढ़ते चलने से दुनिया की तरक्की एक टूटे हुए पांव की रफ्तार से चल रही है। लोगों के मन में एक-दूसरे देश के लिए, एक दूसरी संस्कृति के लिए, एक दूसरे धर्म के लिए जितना अविश्वास बढ़ता चल रहा है, जितना खून बह रहा है, वह भयानक है। और यह सब धर्म के नाम पर चल रहा है, शायद धर्म की वजह से चल रहा है। 
ऐसे में भारत में भी तमाम स्कूल और कॉलेजों से धर्म को पूरी तरह बाहर कर देना जरूरी है। जब धर्म किताबों में लिखी हुई अपनी कुछ अच्छी बातों से परे महज हिंसा के लिए इस्तेमाल हो रहा है, तो उसके बारे में कुछ सोचने की जरूरत है, और सार्वजनिक जिंदगी से उसकी दखल घटाने की जरूरत है। बच्चों को बचपन से ही अगर धर्म पढ़ाया जाए, और वे अपने चारों तरफ धर्म के नाम पर हिंसक इस्तेमाल ही देखते रहें, तो इससे उनकी मानसिकता पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। लोगों को धर्म को अपनी निजी आस्था तक सीमित रखना चाहिए, और सड़कों के किनारे अवैध कब्जों, अवैध निर्माण से लेकर सांप्रदायिक दंगों तक, नफरत और हत्या तक धर्म का इस्तेमाल खत्म करने का सिलसिला स्कूलों से ही शुरू करना पड़ेगा। 
ऑस्ट्रेलिया शायद कम्यूनिस्ट देशों के बाहर का पहला ऐसा देश है जिसने धर्म को कान पकड़कर स्कूलों से बाहर कर दिया है। दुनिया में जो और समझदार देश हैं, उनको भी इससे नसीहत लेनी चाहिए, खासकर भारत को। 
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भारत की राजनीति पर दलाई लामा का निहायत गैरजरूरी बयान

संपादकीय
15 नवंबर 2015
भारत में राजनीतिक शरण पर रह रहे तिब्बत के निर्वासित नेता दलाई लामा ने लोगों को बहस का एक और मौका दे दिया है। उन्होंने बिहार के चुनावी नतीजों को लेकर कहा कि ये नतीजे साबित करते हैं कि हिन्दू आबादी शांति और सद्भाव में यकीन करती है। अब भारत के राजनीतिक चुनावों को लेकर भारत में रह रहे एक धर्मगुरू का यह कहना एक राजनीतिक बयान के दर्जे में आता है, और कुछ लोगों ने उन्हें याद भी दिलाया है कि उन्हें यहां शरण मिली हुई है, यहां की राजनीति में हिस्सा लेने की जगह नहीं मिली है। दलाई लामा की कही हुई बातों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित इस बौद्ध धर्मगुरू का यह कहना कुछ अटपटा जरूर है। 
लोगों का दूसरे देशों में अलग-अलग दर्जा होता है, उन्हें कहीं पर काम करने की इजाजत मिलती है, और कहीं पर उन्हें केवल सिर छुपाने की जगह मिलती है। भारत में पड़ोस के देशों से आए हुए शरणार्थियों को जगह देने का लंबा इतिहास रहा है। यहां बांग्लादेश बनने के पहले के पूर्वी पाकिस्तान से आए हुए लाखों शरणार्थी कभी लौटे नहीं। उधर तिब्बत से आए हुए लाखों लोगों को भारत सरकार ने कई प्रदेशों में उनके माकूल मौसम वाले इलाकों में बसाया है, जिनमें छत्तीसगढ़ के मैनपाट का नाम भी है। और छत्तीसगढ़ में बांग्लादेशी शरणार्थियों की भी बड़ी पुरानी बसाहट है, उसके भी पहले पाकिस्तान से आए हुए शरणार्थी छत्तीसगढ़ में बसे हुए हैं। नेपाल से दसियों लाख लोग भारत में आकर काम करते हैं, बर्मा के लोग यहां रहते हैं, और भूटान के लोग भी। भारत की इस दरियादिली के बीच लोगों को यह शिष्टाचार निभाना चाहिए कि जिन शर्तों पर उनको यहां रहने की इजाजत मिली है, उनसे परे जाकर वे कोई ऐसा काम न करें जिससे कि भारत सरकार पर जनता के किसी हिस्से का यह दबाव आए कि ऐसे लोगों को बाहर निकाला जाए। लोगों को याद होगा कि बांग्लादेश से निकाली गई, या वहां न जा पा रही लेखिका तस्लीमा नसरीन लंबे समय से भारत में बसी हुई थीं, और यहां के कट्टरपंथी मुस्लिमों की नाराजगी के बावजूद भारत सरकार ने उनको यहां पर रहने की इजाजत दी, और बहुत खर्चीली हिफाजत भी अपनी तरफ से मुहैया कराई। कई बार तस्लीमा को लेकर यह विवाद उठता था कि सरकार इतनी खर्चीली शरण क्यों दे रही है? 
लेकिन आज हम इस मुद्दे पर एक दूसरी वजह से भी लिख रहे हैं। आज खाड़ी के देशों से लाखों मुस्लिम जान पर खेलते हुए योरप के देशों तक पहुंच रहे हैं और वहां शरण मांग रहे हैं, पा भी रहे हैं। लेकिन योरप में जगह-जगह स्थानीय लोग उनका विरोध भी कर रहे हैं, उनको शरणार्थियों के साथ आतंकियों के आने का भी डर है, और उनको एक सांस्कृतिक टकराव खड़ा होने की आशंका भी है। कुछ जगहों पर जिन गांवों में सैकड़ों सीरियाई शरणार्थियों को बसाया गया है, वहां पर गांवों की आबादी ही कुछ दर्जन ही थी। ऐसे में उन गांवों का पूरा हुलिया ही बदल गया है, और स्थानीय लोगों को इससे असुविधा महसूस हो रही है। अब ऐसे माहौल में अगर शरणार्थी जगह पाने के बाद स्थानीय सरकार के नियमों से टकराएं, वहां की संस्कृति से टकराएं, तो उनका अपना नुकसान भी होता है, और उनके बाद बाहर से शरण मांगते वहां पहुंचने वाले लोगों को जगह मिलने की संभावना भी कम हो जाती है। इसलिए लोगों को स्थानीय कानून, स्थानीय संस्कृति, और स्थानीय वातावरण का सम्मान करना भी सीखना चाहिए। आज पर्यटक वीजा लेकर लोग अगर किसी दूसरे देश में जाते हैं, और वहां पर राजनीति में हिस्सा लेने लगते हैं, तो उनको तो वहां से निकाला ही जा सकता है, उनके बाद वहां जाने का वीजा मांगने वाले लोगों के लिए दिक्कतें आ खड़ी होती हैं। लोगों को याद होगा कि भारत से संगीत-दलों में दूसरे देशों में जाने वाले लोग जब वहां पहुंचकर गायब हो जाते हैं, और वीजा खत्म होने पर भी नहीं लौटते हैं, तो वे अपने देश के बाकी लोगों के लिए एक परेशानी खड़ी कर देते हैं। हमारा मानना है कि दलाई लामा का यह राजनीतिक बयान निहायत गैरजरूरी है, और भारत में उनके दर्जे के माकूल भी नहीं है। वे खुद तो नोबल शांति पुरस्कार की वजह से कई तरह की रियायतें पा सकते हैं, लेकिन वे बाकी तिब्बतियों के लिए एक परेशानी खड़ी कर रहे हैं। 
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पेरिस पर आतंकी हमले से बाकी दुनिया भी नसीहत ले

संपादकीय
14 नवंबर 2015

फ्रांस की राजधानी पेरिस में कुछ घंटे पहले हुए एक अभूतपूर्व ताकत के आतंकी हमले ने करीब डेढ़ सौ नागरिकों को मार डाला है। कुछ बरस पहले भी मुंबई-हमले की तरह आतंकियों ने हथियारों से भारी लैस होकर, कई दस्तों में बंटकर, शहर के कई ठिकानों को लगभग एक ही वक्त निशाना बनाया, और बात की बात में उन्होंने इतने लोगों को मार डाला। पहली नजर में ऐसा माना जा रहा है कि इस्लामिक स्टेट नाम के एक आतंकी संगठन ने मध्य-पूर्व के देशों से बाहर निकलकर यह हमला किया है, और इसने एक बड़ी जटिल समस्या यह भी खड़ी कर दी है कि सीरिया और लीबिया जैसे मध्य-पूर्व के देशों से निकलकर जो लाखों शरणार्थी समंदर में जीते-मरते योरप पहुंच रहे हैं, अब उनका क्या होगा? एक अंदाज यह भी है कि मध्य-पूर्व में जगह-जगह काबिज इस्लामिक स्टेट नाम के इस सबसे खूंखार और कातिल आतंकी संगठन की कोशिश यह भी है कि योरप के बहुत से देश जिन शरणार्थियों को शरण दे रहे हैं, वे इस हमले के बाद अब अपने दरवाजे बंद कर लें, और सीरिया जैसे देशों के लोग इस्लामिक स्टेट के मौत के साए तले जीने को मजबूर रहें। लेकिन इससे परे भी कोई वजह इस हमले की हो सकती है, क्योंकि इसी फ्रांस के इसी पेरिस शहर में कुछ अरसा पहले कार्टून की एक पत्रिका से असहमत आतंकियों ने उसके कार्टूनिस्टों को मार डाला था, उनके काम को इस्लाम-विरोधी करार देते हुए ऐसे हमले जारी रखने की धमकी भी दी थी। 
आज एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या ऐसा कोई खूनी और आतंकी संगठन किसी धर्म का नाम लेकर एक संगठन खड़ा कर ले, तो क्या उसे धर्म के नाम के ऐसे बेजा इस्तेमाल की इजाजत देनी चाहिए? लेकिन हम हिन्दुस्तान में भी देखते हैं कि धर्म के नाम पर तरह-तरह का आतंक चल रहा है और हत्या और धमाकों वाले हमलों में भी धार्मिक नाम वाले संगठनों से जुड़े हुए लोग कई बार पकड़ाए हैं, और जेल में हैं, अदालती कटघरों में हैं। अब यह एक बड़ी अजीब समस्या है कि जब कोई संगठन अपने नाम को किसी धर्म के नाम पर जोड़कर खड़ा कर ले, तो उसकी इस आजादी को कैसे मनाही की जा सकती है, और कैसे उसे किसी धर्म के नाम का बेजा इस्तेमाल करने दिया जा सकता है? लेकिन इसके साथ-साथ एक सवाल यह भी है कि म्यांमार के बौद्ध लोगों से लेकर, हिन्दुस्तान के हिन्दू और मुस्लिम संगठनों तक, पाकिस्तान और मध्य-पूर्व के मुस्लिम संगठनों तक अगर धर्म के नाम पर भी आतंक फैलाया जा रहा है, और हिंसा की जा रही है, तो उनके अपराधों से धर्म को अलग कैसे किया जा सकता है? दुनिया का इतिहास गवाह है कि धर्म के आधार पर नफरत ने तमाम जंगों को मिलाकर भी हुई मौतों से अधिक मौतें धरती पर दर्ज की हैं। बल्कि दुनिया के इतिहास में भी बहुत सी जंग धर्म के आधार पर ही हुई हैं। इसलिए धर्म के भले लोग यह चाहें कि आतंक से जुड़े हुए उनके धर्म के बुरे लोग धर्म के नाम का इस्तेमाल न करें, तो यह रोक मुमकिन नहीं हैं। 
फिलहाल पेरिस पर हुए आतंकी हमले को देखें तो यह लगता है कि दुनिया में आतंक पर युद्ध छेडऩे के नाम पर अमरीका ने एक साजिश के तहत इराक और लीबिया जैसे कई देशों पर जो हमले किए, उसकी वजह से दुनिया में एक आतंकी-धर्मान्धता बढ़ी है, और आज खुद अमरीका को अपने आपको चौकसी करके ऐसे हमलों से बचा रहा है, लेकिन उसके पैदा किए हुए, या उसकी प्रतिक्रिया में पैदा हुए आतंकी संगठन दुनिया में जगह-जगह ऐसे हमले कर रहे हैं, और करते रहेंगे। इसलिए यह पूरा मामला, यह पूरी नौबत आसान नहीं है, और ऐसे में आतंक के खिलाफ एक कड़ी फौजी कार्रवाई की भी जरूरत है, लेकिन अमरीकी हमलों की तरह की नहीं, जिसमें कि लाखों बेकसूर मारे जाएं। अमरीका ने दुनिया में आतंक को समर्थन करके, खर्च करके भी बढ़ाया है, और बेकसूरों को मारकर भी। 
आज इस हमले से कुछ सौ लोग मारे गए हैं, और जख्मी हुए हैं, लेकिन इससे भी बड़ा नुकसान उन लाखों शरणार्थियों का हुआ है, जिनकी अब योरप में गुजर-बसर और मुश्किल हो जाएगी। इस पूरे हमले के कई ऐसे पहलू हैं जिसे कि भारत को सबक लेना चाहिए, क्योंकि यहां भी जिस तरह धर्मान्ध-आक्रामकता बढ़ाई जा रही है, उसकी भी इस तरह की कोई प्रतिक्रिया किसी भी तबके से किसी दिन सामने आ सकती है। इसी तरह बाकी दुनिया को भी नसीहत लेने की जरूरत है।
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सवाल यह नहीं कि सवाली कितने हैं, सवाल यह कि सवाल क्या हैं?

संपादकीय
13 नवंबर 2015

ब्रिटेन की यात्रा पर पहुंचे भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बहुत से असुविधाजनक सवालों का सामना करना पड़ रहा है। उनका स्वागत तो सरकार और भारतवंशी समुदाय की तरफ से हो रहा है, लेकिन अलग-अलग तबके छोटी संख्या में उनकी नीतियों के खिलाफ, और भारत के आज के हालात के खिलाफ बैनर लिए सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, और भारत का एक तबका इन प्रदर्शनों को आकार से आंक रहा है। ये तमाम पहलू अलग-अलग नजरिए से सही हैं, और गलत भी हैं। विरोधी प्रदर्शन आकार में अगर छोटा है, तो उसे कमजोर या कम, महत्वहीन, या अनदेखा करने लायक मानना ठीक नहीं है। ऐसी ही अनदेखी के चलते भारत में बिहार के चुनावों में मोदी की पार्टी और गठबंधन की चुनावी बदहाली हुई है। और आज मोदी विदेशी जमीन पर भारत में आज फैली धर्मान्ध-हिंसा के खिलाफ कुछ शब्द चाहे बोल रहे हों, देश में भड़काई जा रही कट्टरता और साम्प्रदायिकता के खिलाफ उनकी जो चुप्पी लगातार दर्ज हो रही है, उसे ब्रिटेन में बसे भारतवंशी भी देख रहे हैं, और ब्रिटेन की सरकार भी। 
हम पहले भी इसी जगह कुछ मौकों पर यह बात लिख चुके हैं कि गुजरात दंगों के अपने इतिहास से उबरकर, आगे निकलकर, एक बड़ा नेता बनने की जो संभावनाएं मोदी के सामने थीं, उनमें से एक का भी इस्तेमाल उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद से नहीं किया है, और वे महज एक प्रधानमंत्री भर बन पाए हैं, जिनके बारे में उन्हीं के सहयोगी दल शिवसेना ने चार दिन पहले ही यह लिखा है कि लोकसभा चुनाव में मोदी की असाधारण सफलता इस वजह से हुई थी क्योंकि उनके सामने राहुल गांधी जैसा विकल्प विपक्ष ने पेश किया था। यह अलग बात है कि राहुल गांधी के मुकाबले कांग्रेस का कोई और मजबूत विकल्प भी पेश होता, तो भी शायद यूपीए का हश्र वही होता, लेकिन मोदी की जीत, एनडीए की जीत, ऐसी असाधारण नहीं हुई होती। आज ब्रिटेन की जमीन पर पहुंचकर भी मोदी का यह दौरा जिन घरेलू सवालों से लदा हुआ है, उनसे उनको घर पर रहते हुए ही जूझना था, उनका सामना करना था, और अपने आपको एक बेहतर लीडर साबित भी करना था। कुछ लोगों के सामने बड़ा बनने की संभावनाएं ही नहीं रहती हैं, लेकिन कुछ लोगों के सामने वक्त ऐसी संभावना पेश करता है। मोदी इन सवालों से वर्तमान में तो बच सकते हैं, लेकिन इतिहास के भविष्य में, या भविष्य के इतिहास में कैसे बचेंगे? 
बिहार का चुनाव न तो मोदी की शुरुआत है, और न ही मोदी का अंत। लेकिन यह एक अहमियत वाला बड़ा पड़ाव जरूर है, और भाजपा के सयान-लोगों के आलोचना वाले बयान से परे भी यह एक ऐसा पड़ाव है जिसमें डेरे पर ठहरकर मोदी और उनके साथियों को यह सोचना चाहिए कि देश के माहौल में जो जहर घोला गया है, उसी जहरीली हवा से मोदी की जीत की संभावनाओं में किस तरह दम तोड़ दिया। आज मोदी के साथ एक दिक्कत यह है कि जिस सोशल मीडिया को वे अपनी कुर्सी तक पहुंचने की राह में इस्तेमाल करके आए हैं, उसी सोशल मीडिया पर उनके ऐसे नामलेवा लोग तमाम किस्म की हिंसा और साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं, जिन लोगों को मोदी ट्विटर पर फॉलो भी करते हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो मोदी हर किसी की हिंसा के लिए जवाबदेह न होने का तर्क देते हुए भड़काई जा रही साम्प्रदायिकता से अपने को अलग साबित कर देते, लेकिन जब भारत का प्रधानमंत्री, या नरेन्द्र मोदी एक व्यक्ति के रूप में, ऐसे लोगों की ट्वीट फॉलो भी करते हैं, तो फिर वे अपनी एक न्यूनतम जिम्मेदारी से बरी भी नहीं हो सकते। 
लंदन में मोदी के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों को अनदेखा भी किया जा सकता है कि कुछ सौ लोग तो कहीं भी, किसी भी मुद्दे पर बैनर लिए हुए जुट सकते हैं, लेकिन सवाल गिनती का नहीं, मुद्दों का है, और योरप के देश इस बात के लिए भी जाने जाते हैं कि वहां की संसद दूसरे देशों के कुछ किस्म के घरेलू मामलों पर भी चर्चा करती है, और उन पर भी अपनी सोच सामने रखती है। हमको यह अंदाज नहीं है कि लंदन में उठ रहे इन मुद्दों का मोदी घर पर उठ रहे इन्हीं मुद्दों के मुकाबले कुछ अधिक नोटिस लेंगे या नहीं, लेकिन एक समझदार नेता को अपनी चुप्पी से परे इन आवाजों को सुनना और समझना चाहिए, और इतिहास में जो एक ऐतिहासिक मौका उसके सामने रखा है, उस मौके का इस्तेमाल करना चाहिए। 

दीवाली का मौका कबाड़ खाली करने का भी होना चाहिए

संपादकीय
10 नवंबर 2015

उत्तर भारत का साल का एक सबसे बड़ा त्यौहार दीवाली कई किस्म के सामाजिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों को लेकर आता है, और शायद साल भर की सबसे अधिक आर्थिक हलचल भी इसी वक्त होती है। गरीबों के लिए और मध्यम वर्ग के लिए किसी भी बड़े त्यौहार की तरह यह त्यौहार भी एक बड़ा बोझ लेकर आता है, और लोग इसके आने और चले जाने की राह अधिक देखते हैं, खुशियां कम मना पाते हैं। लेकिन भारत में अधिकतर लोगों में अपने पुराने सामानों को सम्हालकर रखने की चाहत इतनी मजबूत रहती है कि साल के इस सबसे बड़े एक त्यौहार पर घर की सफाई करते हुए, कबाड़ साफ करते हुए भी बहुत सा ऐसा कबाड़ निकालकर झाड़-पोंछकर वापिस रख लेते हैं जिसे कि दस-बीस बरस में कभी इस्तेमाल नहीं किया गया है। इससे कई किस्म के नुकसान होते हैं, एक तो यह कि यह कबाड़ जिन लोगों के काम आ सकता था, वे इनमें से कुछ सामान नए खरीदते हैं, और धरती पर सामानों का बोझ बढ़ता है, सामान बनाने में पर्यावरण का एक नुकसान होता है। दूसरी बात यह कि हर किस्म का कबाड़ जगह घेरता है, गंदगी इक_ा करता है, और छाती पर बोझ बने रहता है। 
हिन्दुस्तान में रीसाइकिलिंग का एक अभियान चलाने की जरूरत है जिसमें कुछ भरोसेमंद सामाजिक संगठन आगे आएं, और लोगों के सामानों के मोह को घटाने की कोशिश करें, उनसे सामान लेकर उन्हें जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने का काम करें। यह काम एक तरफ तो गरीबों की मदद का होता है, दूसरी तरफ धरती पर से बोझ घटाने का भी होता है। दुनिया के कई देशों में बड़े-बड़े भरोसेमंद संगठन इस काम में लगे रहते हैं, और संपन्न-विकसित योरप के देशों में लोग अपना गैरजरूरी सामान या तो गैराज सेल लगाकर बेच देते हैं, या फिर घरों के बाहर उन सामानों को रख देने के दिन तय रहते हैं, लोग सामान बाहर रखते हैं, और जरूरतमंद लोग उठाकर ले जाते हैं। अगले दिन तक जो सामान कोई नहीं ले जाते, उनको म्युनिसिपल उठाकर कूड़े में ले जाती है। भारत जैसे देश में किसी भी सामान का कूड़ा बनना बड़ा मुश्किल है। लोगों की जरूरतें इतनी हैं कि औने-पौने सामान को भी लोग ले जाते हैं और उससे बरसों तक काम चलाते हैं। दुनिया में जिन सामानों को खराब होने पर लोग सीधे बेच देते हैं, हिन्दुस्तान में उन सामानों को बनाने वाले लोग गांव-गांव तक फैले रहते हैं। 
इसलिए पुराने सामानों के दुबारा और तिबारा इस्तेमाल की संभावना भारत जैसे देश में बहुत अधिक है, और उससे ही धरती पर बोझ बढऩा धीमा हो सकता है। यह काम खासकर शहरों में अधिक आसानी से हो सकता है जहां पर संपन्न लोग अधिक हैं, उनके पास कबाड़ अधिक है, इर्द-गिर्द गरीब अधिक हैं, और बड़े पैमाने पर सामानों की रीसाइकिलिंग अधिक आसान भी हो सकती है। दीवाली का मौका कबाड़ खाली करने का रहता है और लोगों के बीच इस सोच को बढ़ाने का काम जागरूक लोगों को करना चाहिए। 

विजेता नीतीश की विनम्रता से सबको कुछ सीखने की जरूरत

संपादकीय 
9 नवम्बर 2015

बिहार में ऐतिहासिक जीत के बाद नीतीश कुमार ने अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में विपक्ष के साथ काम करने के लिए जिस तरह की दरियादिली की बात कही है, वह गौर करने के लायक है। अपने डीएनए के लिए भाजपा के प्रधानमंत्री की गालियां खाने के बाद भी नीतीश कुमार ने कल जितनी समझदारी और संतुलन की बातें की हैं, उनसे उन लोगों को सीखने की जरूरत है, जो कि जीतने के बाद आपा खो बैठते हैं, और भाषा का शिष्टाचार भी जिनका खत्म हो जाता है। दरअसल विजेता को विनम्र होना भी चाहिए, और नीतीश कुमार तो अच्छे या बुरे कैसे भी वक्त में संतुलित बातें करने के लिए जाने जाते हैं। यही वजह है कि कल जब कई टीवी चैनलों पर नीतीश को लेकर बहस चल रही थी, तो कुछ विश्लेेषकों का यह मानना था कि देश के अगले आम चुनाव में हो सकता है कि भाजपा के विरोध का गठबंधन नीतीश के इर्दगिर्द इकट्ठा हो। हालांकि ऐसी बात करने का अभी कोई वक्त नहीं है,क्योंकि अगले आम चुनाव साढ़े तीन बरस दूर हैं, लेकिन ऐसे किसी गठबंधन की संभावनाएं बनने और उसके शक्ल लेने में भी बरसों लगते ही हैं। और आने वाले बरसों में जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं, वहां पर भाजपा या एनडीए के खिलाफ बाकी पार्टियों के बीच के तालमेल अगले आम चुनाव के गठबंधन में मददगार भी हो सकते हैं। 
लेकिन अगले आम चुनाव को लेकर किसी अटकल के बजाए हम इस बात पर चर्चा करना चाहेंगे कि किस तरह एक भले नेता को जीत के बाद भी बददिमाग नहीं होना चाहिए, और लोकतांत्रिक उदारता की बात करनी चाहिए, वैसा आचरण करना चाहिए। बिहार में नीतीश के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं, एक सजायाफ्ता और प्रामाणिक भ्रष्ट लालू यादव के साथ मिलकर इस सरकार को चलाना आसान नहीं होगा, और अगर लालू कुनबे की हवस हावी हुई, तो हो सकता है कि नीतीश का तीसरा कार्यकाल मिट्टी में मिल जाए। लेकिन आज देश में राजनीति को नीतीश कुमार की बातों से कुछ सीखने की जरूरत है। आज जितना जहर हवा में घुला हुआ है, उसी का नतीजा है कि भाजपा वाले गठबंधन का ऐसा बुरा हाल देखने मिल रहा है। बिहार में जो बर्बादी भाजपा ने झेली है, वह अपनी बद्जुबानी की वजह से ही झेली है। अब भी वक्त है कि देश में संतुलित और भली बातें करने वाले लोगों से कुछ सीखा जाए। न सिर्फ भाजपा को, बल्कि तमाम राजनीतिक दलों को अपनी गंदी बातों को छोडऩा पड़ेगा, वरना उनके परंपरागत मतदाता भी उनको छोडऩे की मिसाल बिहार में पेश कर ही चुके हैं। 

बिहार ने सरकार चुनने के साथ-साथ देश के माहौल पर भी राय जाहिर की है

8 नवंबर 2015
संपादकीय
बिहार के चुनावी नतीजे शायद इस देश के अटकलों को सबसे अधिक पलटने वाले नतीजों में से हैं, अधिकतर सर्वे कड़ी टक्कर या उसके आसपास की भविष्यवाणी कर रहे थे, लेकिन आज के नतीजों ने विश्लेषकों को हिलाकर रख दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में एनडीए की पार्टियों ने जिस जोर-शोर से बिहार में चुनाव लड़ा, और खुद प्रधानमंत्री ने इस चुनाव में जितना वक्त दिया, जितनी आक्रामक बातें कहीं, उनके बाद कोई कसर बाकी नहीं रह गई थी। और अभी दोपहर को जो आंकड़े टीवी के स्क्रीन पर सामने हैं, उनके मुताबिक नीतीश कुमार और उनके साथी मोदी और उनके साथियों के दुगुने से भी अधिक सीटें पाते दिख रहे हैं। यह तस्वीर कम से कम भाजपा के लिए एक बहुत गंभीर और ईमानदार आत्ममंथन सुझाती है। 
हम अभी बिहार की चुनावी राजनीति को लेकर बहुत बारीक विश्लेषण करना नहीं चाहते, क्योंकि वहां के अधिक जानकार लोग उसे अलग से करेंगे ही। लेकिन बिहार के नतीजे ऐसे क्यों आए, इस पर बाकी देश की तरफ से एक नजर डालना जरूरी है। बिहार देश के बीच का राज्य है, और राजनीतिक रूप से यह अधिक पढ़े-लिखे लोगों का, राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों का, पिछले दस बरस से शराफत पर भरोसा रखने वाला, और बेहतर सरकार का साथ देने वाला राज्य साबित हुआ है। हमारा ऐसा मानना है कि पिछले कुछ महीनों में इस देश में राष्ट्रीय स्तर पर जिन साम्प्रदायिक मुद्दों को खड़ा करने, उन्हें सुलगाकर, पंखे से हवा दी गई, उसको बिहार ने अनदेखा नहीं किया है। हमारे पास वोटों का ऐसा कोई विश्लेषण नहीं है कि हम अपनी इस बात को साबित कर सकें, लेकिन महीनों से इस देश में जो भड़काऊ बातें रात-दिन टीवी और अखबारों में छाई हुई थीं, हमारा मानना है कि बिहार की जनता पर उसका खासा असर पड़ा होगा। बिहार के भीतरी जातिवादी समीकरण तो दोनों ही गठबंधनों ने इस्तेमाल किए होंगे, और भाजपा के पक्ष में जो एक बात उसकी कोशिश से, या उसकी किसी जाहिर-कोशिश के बिना हुई, वह थी ओवैसी की मुस्लिम पार्टी का बिहार घुसकर पहली बार इस तरह चुनाव लडऩा, जिससे कि मुस्लिम वोटों का धु्रवीकरण भी हो, और मुस्लिम वोट नीतीश-लालू-कांगे्रस के साम्प्रदायिकता विरोधी गठबंधन के खिलाफ भी चले जाएं। यह बात भी एनडीए-भाजपा के काम आई नहीं, और नीतीश कुमार एक ऐतिहासिक किस्म की जीत के साथ तीसरे कार्यकाल के लिए लौटे हैं। 
भाजपा के भीतर और बाहर इस चुनाव को लेकर कई तरह की सुगबुगाहट चल रही थी, और आज वह कुछ बढ़ भी गई होगी। लेकिन हमको भाजपा के भीतरी मामलों की अधिक फिक्र नहीं है, बाकी देश की फिक्र जरूर है। और बाकी देश पिछले महीनों में भाजपा और उसके साथी संगठनों, उसके अपने मंत्रियों और नेताओं की लगाई आग से झुलस रहा है। इस बात को लेकर हमने इसी जगह पिछले महीनों में लगातार नरेन्द्र मोदी के लिए लिखा भी था कि देश की गैरसवर्ण-हिंदू आबादी के खिलाफ जिस तरह से एक धार्मिक, साम्प्रदायिक, और खानपान का उन्माद लादा जा रहा था, जिस कदर थोक में लोगों को पाकिस्तान भेजा जा रहा था, वह भाजपा के लिए चुनावी नुकसान का काम भी हो रहा था। हमने बड़े साफ शब्दों में गोमांस को लेकर फैलाए जा रहे उन्माद के बारे में लिखा था कि एक सवर्ण-हिंदू तबके का यह झांसा झूठा है कि इस देश में लोग गोमांस नहीं खाते। दलितों के बीच, आदिवासियों के बीच, अल्पसंख्यकों के बीच, उत्तर-पूर्वी लोगों के बीच, और गरीब-मांसाहारियों के बीच जितने बड़े पैमाने पर गोमांस खाया जाता है, उस तथ्य को दबाया गया, और भारत को एक सवर्ण-हिंदू राष्ट्र की मर्जी में ढाला जा रहा था। भारत जैसी विविधता वाले देश में ऐसी आतंकी-उन्मादी जिद अधिक चल नहीं सकती। और हमारा यह मानना है कि बाकी देश में भाजपा और उसके लोगों ने जिस अंदाज में देश के वफादार लोगों को गद्दार करार देकर पाकिस्तान भेजने के फतवे जारी किए, उसका भी नुकसान इस पार्टी को बिहार में आज झेलना पड़ा।
यह भाजपा की अपनी मर्जी की बात है कि वह बिहार की इस शर्मनाक हार के बाद भी एक आत्ममंथन करना चाहती है या नहीं, या फिर वह लोगों को पाकिस्तान भेजने के लिए एक ट्रैवल एजेंसी की तरह मेहनत करना चाहती है? और यह मौका खासकर प्रधानमंत्री के निजी आत्ममंथन का है क्योंकि केंद्र की सरकार, एनडीए गठबंधन, और भाजपा, इन सबके वे आज बेताज बादशाह बने हुए हैं, और वे देश के आज भड़के हुए माहौल, लोगों के बीच फैली हुई दहशत, और उन्मादी-साम्प्रदायिक लोगों की फड़कती बांहों के लिए जिम्मेदार भी हैं। बिहार की हार को महज एक राज्य के विधानसभा चुनाव के नतीजे मानकर चलना अपने-आपको धोखा देना होगा, हमारा मानना है कि बिहार के मतदाताओं ने राज्य में सरकार चुनने के साथ-साथ देश के माहौल पर भी अपनी राय जाहिर की है।  

भारत की न्यायव्यवस्था में बुनियादी फेरबदल जरूरी

संपादकीय
7 नवंबर 2015

मुंबई के फिल्म उद्योग से जुड़े हुए एक अभिनेता आदित्य पंचोली का अपने मकान मालिक के साथ कुछ सौ रूपयों का झगड़ा चलते-चलते अभी सुप्रीम कोर्ट से निपटा, और अदालत ने उन्हें मकान खाली करने का आदेश दिया। यह मामला 1978 से निचली अदालत से शुरू होकर अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर निपटा है। और इतने लंबे सफर, और इतने छोटे मुद्दे को देखकर लगता है कि देश के जिन लोगों के पास महंगे वकील करने, या बड़ी अदालत तक जाने की ताकत नहीं रहती होगी, उनका क्या हाल होता होगा। और दूसरी बात यह कि देश की अदालतों पर अगर ऐसे मामलों के बोझ लदे रहेंगे तो जो अधिक जरूरी मामले हैं, उनका क्या हो सकेगा? अभी भी सुप्रीम कोर्ट और देश की बाकी अदालतों के जानकार लोगों का यह मानना है कि आज अदालतों में चल रहे सारे मामलों के निपटारे में साढ़े तीन सौ बरस लग सकते हैं। 
भारत में इंसाफ इतना मुश्किल है, कि लोग थक-हारकर, निराश होकर अपना इंसाफ खुद भी करने लगते हैं। सड़कों पर कत्ल होते हैं, कहीं नक्सल आंदोलन चलते हैं, कहीं लोग स्थानीय गुंडों के पास जाकर उनके मामले निपटाने की बात करते हैं, और अभी कुछ बरस पहले तक इंसाफ की तरफ से नाउम्मीदी से फूलन की तरह के बागी पैदा होते थे। आज भी सरकार से जुड़े हुए बहुत से मामलों में लोगों को लगता है कि इंसाफ के लिए अदालती लड़ाई के मुकाबले रिश्वत देकर मामले को बाहर ही निपटा लेना आसान है, और सस्ता पड़ेगा। दूसरी तरफ जमीन-जायदाद और कारोबार के बहुत से मामलों में लोग गुंडों को भाड़े पर लेकर मामले निपटा लेते हैं, क्योंकि अदालत जाने का मतलब अगली एक-दो पीढ़ी तक इंतजार करना होता है। इस देश में न्यायपालिका के पूरे कामकाज में ऐसे फेरबदल की जरूरत है कि लोगों को सच में इंसाफ मिले, वक्त रहते मिले, और इंसाफ के नाम पर आज देश में जो चल रहा है वह पाखंड खत्म हो। आज गिने-चुने मामलों में इंसाफ होते दिखता है, और अधिकतर मामलों में यह साफ-साफ दिखता है कि इंसाफ नहीं हो रहा है। 
इस देश में इंसाफ तक गरीब की पहुंच पूरी तरह नामुमकिन है, और पुलिस से लेकर जांच करने वाली प्रयोगशालाओं तक, गवाहों से लेकर वकील तक, और जजों तक इतना भ्रष्टाचार फैला हुआ है कि कदम-कदम पर इंसाफ की संभावना पटरी से उतरती रहती है। यही वजह है कि नक्सलियों के साथ हमदर्दी रखने वाले लोग जो खुद हिंसा पर भरोसा नहीं रखते हैं, वे भी यह मानते हैं कि इस देश में सबसे कमजोर के साथ इंसाफ बिना हिंसा के नहीं हो सकता। मिसाल के लिए कुछ मामलों को गिनाया जा सकता है जिनमें अदालत में खड़े लोगों के जीते जी ही फैसला हो गया हो, लेकिन लोगों के मर-खप जाने के बाद आने वाली पीढिय़ों को मिलने वाले इंसाफ की कहानियां अनगिनत हैं, और उन्हीं को देख-देखकर लोग यह कहते हैं कि ईश्वर खाकी वर्दी और काले कोट से बचाकर ही रखे। 
भारत में अदालतों का जो ढर्रा चले आ रहा है, उसमें बुनियादी फेरबदल की जरूरत है, आज यह सिलसिला गरीबों की पहुंच के भी बाहर है, और इसमें इंसाफ की संभावना भी बहुत कम है। 

फायरब्रिगेड निगमों से लेकर होमगार्ड को, सही फैसला

संपादकीय
6 नवंबर 2015

छत्तीसगढ़ में दमकल विभाग पुलिस विभाग के तहत आने वाले होमगार्ड को दे दिया गया है। अब तक नगर निगम, नगर पालिकाएं अपने इलाकों में आग बुझाने का काम करती थीं, और उनकी बदहाली इतनी थी कि राजधानी रायपुर में किसी भी बड़ी अग्नि दुर्घटना से निपटने के लिए भिलाई इस्पात संयंत्र की फायर ब्रिगेड को 25 किलोमीटर दूर से बुलाना पड़ता था, या कभी एयरपोर्ट की फायर ब्रिगेड की तरफ देखना पड़ता था। छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े शहर और राजधानी बनने के बाद भी रायपुर में म्युनिसिपल की फायर ब्रिगेड का हाल यह था कि उसकी गाडिय़ां कंडम थीं, उनकी टंकी में डीजल नहीं रहता था, ड्राइवरों की कमी थी, और जो ड्राइवर थे भी, उनकी नजरें कमजोर थीं, आग बुझाने वाले कर्मचारियों के पास अपने खुद के बचाव के लिए कोई तरीके नहीं थे, और शहर में बन गई ऊंची इमारतों की ऊपरी मंजिलों तक पहुंचने की फायर ब्रिगेड की क्षमता नहीं थी। कुल मिलाकर नगर निगम के कामकाज के मिजाज में ऐसे हादसों से जूझना था भी नहीं। यह एक अच्छी बात है कि बहुत देर से सही, लेकिन राज्य सरकार ने समझदारी का फैसला लिया, और म्युनिसिपल से उसकी समझ, क्षमता, प्राथमिकता, और मिजाज से बिल्कुल परे का यह काम अलग कर दिया। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय वहां पर भोपाल और शायद कुछ दूसरे शहरों में भी फायर ब्रिगेड कुछ समय पुलिस विभाग के जिम्मे थी, और फिर बाद में पुलिस से हटाकर म्युनिसिपल को दे दी गई थी। अब पता लगा है कि मध्यप्रदेश भी छत्तीसगढ़ की इस नई नीति से कुछ सीखने जा रहा है। छत्तीसगढ़ में इस नए फैसले के तहत आग बुझाने, आपदा प्रबंधन, और आपातकालीन सेवाओं के लिए प्रदेश स्तर की यह नई फोर्स तैयार की जा रही है। जिसमें करीब 12 सौ लोग रहेंगे। 
राज्य सरकार को आपदा प्रबंधन की सोच को फाइलों से निकालना चाहिए। हम पहले भी कई बार इस जगह यह लिखते आए हैं कि पूरे प्रदेश में सरकार और सरकार से परे निजी क्षेत्र की जो क्षमता है, उसका एक ऐसा व्यापक नक्शा बनाने की जरूरत है कि किसी भी तरह की प्राकृतिक, औद्योगिक या किसी और तरह की मानव निर्मित आपदा आने पर तेजरफ्तार बचाव के लिए सारे साधनों और क्षमताओं का तुरंत इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है। इसमें मशीनों से लेकर इलाज की सुविधा तक, और तैराकों से लेकर रक्तदाताओं तक का ऐसा नक्शा संपर्क सहित बनना चाहिए कि प्रदेश में कहीं भी पल भर में यह देखा जा सके कि घायलों को किस तरफ भेजा जाए, वहां पर हर तरह के इंतजाम किस तरह जुटाकर रखे जाएं। इस काम को भी राज्य सरकार के दूसरे विभागों से परे सीधे पुलिस के हवाले इसलिए करना चाहिए कि हर तरह के हादसे में सबसे पहले पुलिस को ही झोकना पड़ता है। आज राज्य के सचिवालय में दूसरे विभागों के अधिकारी आपदा प्रबंधन की योजना बनाते हैं, और उनके विभाग के लोगों का जमीनी आपदा प्रबंधन से कोई लेना-देना नहीं रहता। यह पूरा काम जिला प्रशासन और पुलिस को देखना पड़ता है, और इसकी योजना पुलिस बेहतर तरीके से बना सकती है। 
राज्य सरकार ने म्युनिसिपलों से यह एक अनचाहा काम ले लिया है, और इसे लेकर म्युनिसिपल शायद खुश ही होंगी। सरकार के कुछ और विभागों में कामकाज को दुबारा बांटने की जरूरत है, और राज्य सरकारी ढांचे को एक कल्पनाशील तरीके से दुबारा ढालने की जरूरत है। एक तरफ तो राज्य में डॉक्टरों का भारी अकाल है, दूसरी तरफ सरकार में स्वास्थ्य विभाग में हर स्तर पर प्रशासनिक काम के लिए डॉक्टरों को जिलों से लेकर राजधानी तक झोंका गया है। कॉलेजों में पढ़ाने वाले कम हैं, और बिना किसी प्रशासनिक अनुभव के प्राध्यापकों को वरिष्ठता के आधार पर प्राचार्य बना दिया जाता है। ऐसा ही स्कूलों में भी होता है। सरकार को स्वास्थ्य प्रशासन, शिक्षा प्रशासन जैसे काडर अलग से विकसित करने चाहिए, जिनमें आज के कर्मचारी-अधिकारी ही अपनी जानकारी और अपने अनुभव के आधार पर छांटे जाएं, और उनकी क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल हो। एक नए राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ को मध्यप्रदेश की परंपराओं से अलग होकर एक नई ताजगी के साथ योजनाएं बनाने की सहूलियत थी, लेकिन डेढ़ दशक पूरा होने के बावजूद अधिकतर बातों के लिए यह राज्य अविभाजित मध्यप्रदेश के तौर-तरीकों पर ही टिका रहता है। यह सोच बदलने की जरूरत है। 

बंदूक की हिंसा गई बटुए की हिंसा आई

संपादकीय
5 नवंबर 2015

जब चारों तरफ बुरी बातें हो रही हों, तब कुछ छोटी-छोटी अच्छी-अच्छी बातों को भी देख लेना चाहिए ताकि जिंदगी बिल्कुल ही निराशाजनक न लगने लगे। अब जैसे आज बिहार में इस विधानसभा चुनाव के आखिरी वोट पड़ रहे हैं, और जहां तक अखबारी सुर्खियां याद पड़ रही हैं, कई हफ्तों तक चले मतदान में भी न तो कहीं बूथ पर कब्जा सामने आया, न कहीं कत्ल हुए, और न ही बम फटे। अभी कुछ चुनाव पहले तक की ही बात है, अलग-अलग जातियों की, पार्टियों की, सेनाएं वहां बूथ कब्जा करती थीं, और कागजों पर सील लगाने वाले वोट पर मनमर्जी से थप्पा लगाती थी। बिहार को लेकर ही देश की चुनावी राजनीति में बूथ-छापना शब्द प्रचलित हुआ था, और ऐसा माना जाता था कि देश में सबसे अधिक अराजक चुनाव बिहार में होते हैं, और वहां बंदूकधारी बाहुबली, और बम चलाने वाले लोग चुनाव पर काबू करते हैं। 
लेकिन लोगों को अच्छी बातें तुरंत दिखती नहीं हैं, और आज बिहार में अगर बिना जुर्म, बिना हिंसा, ठीक तरीके से चुनाव हो रहे हैं, तो इसकी चर्चा भी नहीं हो रही है। इसके पीछे राज्य में एक बेहतर सरकार रहना भी एक वजह है, और एक दूसरी वजह है कि चुनाव आयोग ने देश के किसी भी हिस्से के लोकसभा या विधानसभा चुनाव को साफ-सुथरे तरीके से करवाने का इंतजाम कर लिया है। आयोग को इसके लिए असीमित अधिकार भी मिले हैं, और राज्य सरकारों की मनमानी से परे अब चुनाव आयोग अपनी मर्जी से केन्द्रीय बल लगाकर, दूसरे राज्यों से पर्यवेक्षक भेजकर चुनावों को बिना हिंसा करवाने का खासा कामयाब तरीका बना चुका है। 
इस सारी कामयाबी के बाद भी अगर सतह से थोड़ा नीचे जाकर देखें, तो आज भी भारत के चुनाव पैसों के दम पर इस हद तक प्रभावित होते हैं कि जीतने वाली पार्टी हार जाए, और हारने वाली पार्टी जीत जाए। एक तरीके से दिखने वाली हिंसा की जगह अब वोट खरीदने की ताकत रखने वाले बटुए ने ले ली है। पिस्तौल गई, बटुआ आ गया। जिस राज्य में भी पांच-दस फीसदी सीटों का फर्क रहता है, वहां पर अगर पैसों का बड़ा खेल हुआ है, तो फिर जनता का रूख भांपना नामुमकिन हो जाता है। और लोगों के वोट मंडी में इसलिए बिकने खड़े रहते हैं, क्योंकि लोगों को उनके सामने मौजूद विकल्पों में कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं दिखता, किसी में एक किस्म की खामी रहती है, और किसी में दूसरे किस्म की। अगर पार्टियों और उम्मीदवारों के बीच बड़ा साफ-साफ फर्क हो, तो मतदाता शायद बिकने के बजाय चुनना पसंद करें, लेकिन जब एक बुरे और दूसरे बुरे के बीच ही पसंद बची हो, तो फिर लोग बिकने को बुरा भला क्यों मानें? 
लोकतंत्र के लिए यह एक ऐसी खतरनाक बात है कि चुनाव को प्रभावित करने वाली पैसों की ताकत लोगों को जुर्म नहीं लगती, हिंसा नहीं लगती, और चुनाव प्रभावित हो जाते हैं। अब यह हमको ठीक से समझ नहीं पड़ता कि बंदूक की हिंसा जाने, और बटुए की हिंसा आने को लोकतंत्र का विकास माना जाए, या न माना जाए? यह कुछ उसी किस्म का है कि दुनिया की फौजें ऐसे हथियार तैयार कर रही हैं कि लोगों का खून न बहे, और उनकी मौत हो जाए। 

कमजोर और कुचले तबकों के मुद्दों पर चर्चा की जरूरत

संपादकीय
4 नवंबर 2015

छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ दिनों में अलग-अलग इलाकों में किसानों ने आत्महत्या की है। सरकारी अफसर यह साबित करने की कोशिश करते ही हैं कि खुदकुशी कर्ज की वजह से नहीं थी, लेकिन इस कोशिश के बजाय कोशिश यह की जानी चाहिए कि जहां-जहां फसल खराब हुई है, वहां-वहां सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र के सकारात्मक असर रखने वाले लोग बर्बाद हो रहे किसानों के सामने नौबत से उबरने का हौसला रखने की कोशिश करें। हम यह जिम्मा सीधे-सीधे सरकार पर इसलिए नहीं डाल रहे कि सरकार में बैठे लोग किसानों का मनोबल बढ़ाने के नाम पर फिर कुछ हजार एनजीओ बनाकर फिर सौ-पचास करोड़ रूपए इधर-उधर करने का रास्ता निकाल लेंगे। इससे परे जरूरत यह है कि केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं को लेकर खेतिहर-अर्थव्यवस्था के परामर्शदाताओं की एक सोच विकसित की जाए। ऐसे लोग सरकार से परे के होना जरूरी हैं, क्योंकि सरकार में बैठे लोग तो बीज से लेकर खाद तक, और खेती के कर्ज से लेकर बीमा तक किस तरह किसान को लूटने में लगे रहते हैं, इस पर हम इसी जगह कुछ समय पहले लिख चुके हैं। 
अब बात केवल किसानों की नहीं है, बस्तर जैसे इलाके में जहां पर नक्सल हिंसा से घिरे हुए लोगों को पुलिस और सुरक्षा बलों की हिंसा भी झेलनी पड़ रही है, और नक्सलियों की भी। ऐसे पूरे इलाकों में पूरी की पूरी पीढ़ी ही जान का खतरा देखते हुए, और दहशत में जीने को मजबूर है। ऐसे हर गांव में कई लोगों का कत्ल हुआ है, बलात्कार हुए हैं, और आदिवासियों का वह पूरा शोषण जारी है जिसकी वजह से नक्सल हिंसा को बस्तर में जगह मिली थी। अब हिंसा के शिकार ऐसे पूरे-पूरे इलाके की दिमागी हालत के बारे में सोचना कहीं भी सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि वहां के बच्चे ऐसी दहशत के बीच, ऐसी नफरत के बीच किस तरह की दिमागी हालत में बड़े होंगे, और बड़े होने पर वे नक्सलियों या सरकारी वर्दियों से किस तरह का बदला लेने की सोचेंगे? ऐसी सामाजिक स्थिति में व्यापक स्तर के सामाजिक परामर्श की जरूरत है, जो कि निजी स्तर के मनोवैज्ञानिक परामर्श से अलग बात है। अभी छत्तीसगढ़ में ऐसी कोई बात, ऐसी कोई सोच किसी ने सुनी नहीं है, या कम से कम यहां के संदर्भ में ऐसी कोई बात कही नहीं है, लेकिन समाजशास्त्रियों से मदद लेकर, मनोवैज्ञानिकों को साथ रखकर सरकार को सामाजिक-मनोविज्ञान का ख्याल रखने का जिम्मा निभाना चाहिए। 
समाज का जो हिस्सा दूसरों की मदद करने की ताकत रखता है, जिसके पास साधन और सुविधा हैं, जिसके पास अपनी जरूरत से अधिक पैसा है, जिसकी तकलीफें कम हैं, ऐसे लोग अपने निजी ऐशोआराम से परे और किसी बात के बारे में शायद ही सोच पाते हैं। अब जब देश की राजनीतिक ताकतें गैरमुद्दों पर लोगों को भड़काने में लगी हुई हैं, तब संपन्न लेकिन आम लोगों से किसी कुर्बानी या किसी बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी की उम्मीद करना कुछ मुश्किल होता है। लेकिन आज छत्तीसगढ़ की सामाजिक जरूरत यही है कि लोग अपने सरोकार समझें, और दबे-कुचले तबकों का तरह-तरह से साथ देने की कोशिश करें। हमारी बात कुछ अमूर्त जरूर है, यह सरकार के आंकड़ों वाली योजनाओं में ठीक से फिट बैठते नहीं दिखेगी, लेकिन समाज के बीच सकारात्मक मानसिकता को बढ़ाए बिना, मुसीबत और खतरे झेलते तबकों का हौसला बढ़ाए बिना, हम एक असंतुलित सामाजिक विकास ही कर सकते हैं, और इससे देश-प्रदेश बहुत आगे नहीं बढ़ सकते। इस मुद्दे की शुरुआत समाज के कुछ जागरूक लोग कमजोर और कुचले हुए तबकों के मुद्दों पर चर्चा से शुरू कर सकते हैं, फिर यह चर्चा चाय पर हो, या बिना चाय के।

औरों की जिंदगियां बचाते जान देनी वाली बहादुर छत्तीसगढ़-महतारी महिलाएं

संपादकीय 
3 नवंबर 2015
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बीती रात दो ऐसी महिला कामगारों की मौत हुई है, जिनकी बहादुरी की अधिक चर्चा शायद न हो। ये दोनों एक कन्या-छात्रावास में खाना पकाने का काम करती थीं, और वहां रसोई में गैस सिलेंडर में आग लगी, तो जलते हुए सिलेंडर को तीन महिलाओं ने उठाकर बाहर फेंका, और इसी कोशिश में वे बुरी तरह झुलस गईं, और इनमें से दो की मौत अस्पताल में हो गई। इस वक्त हॉस्टल में बहुत सी लड़कियां थीं, और सिलेंडर अगर फटता तो उन सबकी जान जा सकती थी। इन लगभग मजदूर महिलाओं के सामने भी यह रास्ता तो खुला हुआ था ही कि वे भी भागकर अपनी जान बचा लेतीं, और सिलेंडर की आग बुझाने का काम फायर ब्रिगेड जब पहुंचती, तब वह करती। लेकिन इन्होंने जान पर खेलकर जलते सिलेंडर को बाहर निकाला, और अपनी जिम्मेदारी से अधिक का यह खतरनाक काम करते हुए खुद की जान दे दी, लेकिन बाकी लोगों को बचा लिया।  पता नहीं केंद्र या राज्य सरकार के बहादुरी के पुरस्कारों में ऐसी बहादुरी के लिए कोई पैमाना है या नहीं, लेकिन ये गरीब महिलाएं किसी तरह अपने परिवार को चला रही थीं, और इनके चले जाने से इनके घरों की कमर टूट गई होगी। 
बस्तर जैसे नक्सल मोर्चे हों, जहां पर कि तैनात पुलिस को यह पता रहता है कि जान खतरे में डालकर ही ड्यूटी करनी है, तो वहां तो बहादुरी की उम्मीद की जाती है। इसी तरह दमकल कर्मियों से भी आग बुझाते हुए खतरों से जूझने की उम्मीद की जाती है। लेकिन जब मामूली काम में लगे हुए लोग एक गैरमामूली हौसला दिखाते हैं, तो उनकी स्मृतियों का सम्मान सरकार को भी करना चाहिए, और समाज को भी। दरअसल ऐसा हौसला दिखाने वाले लोग बहुत कम होते हैं, अधिकतर लोग तो किसी खतरे के वक्त अपने परिवार की सोचकर पीछे हट जाते हैं, या आंखें बंद कर लेते हैं। जब कोई गरीब-मजदूर महिला खतरे में कूदती है, तो वह अपने पूरे परिवार की हिफाजत को दांव पर लगा देती है। छत्तीसगढ़ में इन तीन महिलाओं ने जो हौसला दिखाया है, उसे हम किसी हादसे में गुजरने वाले आम लोगों की आम मौत की तरह नहीं मानते। हमारा मानना है कि सरकार को इनके लिए आज घोषित मुआवजा बढ़ाना चाहिए, और जिस विभाग के छात्रावास की बच्चियों को बचाने के लिए इन महिलाओं ने अपनी जिंदगी दी है, उस विभाग के नेताओं और अफसरों को भी इनके परिवारों की सीधी मदद करनी चाहिए। ऐसा अगर नहीं होगा, तो बहुत से लोग इस मामले की गंभीरता को भी नहीं समझेंगे, और इनकी बहादुरी का कोई मूल्यांकन भी नहीं होगा।