सिखों पर लतीफे, चलें या थमे, मामला सुप्रीम कोर्ट में

संपादकीय
31 अक्टूबर 2015

सुप्रीम कोर्ट में वैसे तो सिवाय बहुत गंभीर मुद्दों पर बहुत गंभीर बहस के और कुछ होता नहीं, लेकिन कल अदालत कुछ लतीफेबाजी के मूड में थी। नतीजा यह हुआ कि उसने सिखों के हास्यबोध को लेकर ढेरों तारीफ की, और सिख-लतीफों पर रोक लगाने की याचिका के खिलाफ अपना विचार व्यक्त किया। इस पर अभी फैसला नहीं आया है, और जिस सिख-पंजाबी महिला-वकील ने यह याचिका लगाई है, उसने अदालत से अपने तर्कों को विस्तार से सामने रखने के लिए कुछ और वक्त मांगा है। इस महिला-वकील ने अदालत से यह कहा था कि सिखों को लेकर जितने तरह के मजाक बनाए जाते हैं, उनसे इस समुदाय के लोगों की भावनाएं आहत होती हैं, और उन्हें सामाजिक मजाक-मजाक में मानसिक तकलीफ झेलनी पड़ती है। अदालत ने एक बड़ी खिलाड़ी भावना का इस्तेमाल करते हुए यह जवाब दिया कि सिख खुद भी अपने पर बनाए हुए लतीफों का मजा लेते हैं, और उनका हास्यबोध बहुत ही जबर्दस्त होता है। जज का यह भी कहना था कि अगर सिख-लतीफों पर रोक लगाई जाएगी तो हो सकता है कि सिख खुद भी इसका बुरा मान लें। 
लतीफों को लेकर यह एक बड़ा गंभीर मुद्दा है, और यह महज हिन्दुस्तान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में धर्म को लेकर, जाति को लेकर, ईश्वर और रंग को लेकर, मोटापे को लेकर इतने तरह के लतीफे चलते हैं कि उन्हें अगर न्याय और अन्याय के हिसाब से देखा जाए तो उनमें से बहुत से बदनीयत से बने हुए रहते हैं, और किसी न किसी तबके पर हमला करने वाले रहते हैं, किसी तबके का अपमान करने वाले रहते हैं। और यह दुनिया की अलग-अलग संस्कृतियों की सहनशीलता रहती है कि कौन उसे कितना बर्दाश्त कर सकते हैं। पश्चिमी देशों में जहां पर सबसे अधिक आबादी ईसाई धर्म को मानने वालों की है, वहां पर ईसा मसीह को लेकर, कुंवारी मां को लेकर, चर्च और पादरी को लेकर, सलीब को लेकर इतने तरह के लतीफे चलते हैं, कि वे भारत में इस्तेमाल हों, तो धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने के हजारों मामले दायर हो जाएं। लेकिन पश्चिमी देशों में बर्दाश्त कुछ अलग किस्म की है, और वहां के लोगों का हास्यबोध बहुत अलग किस्म का है। पिछले दिनों पेरिस की जिस कार्टून-व्यंग्य पत्रिका के लोगों पर हमला करके उन्हें मार डाला गया था, उस पत्रिका के कार्टून को नापसंद करने वाले अनगिनत लोग हैं, लेकिन ऐसे लोग भी उस पत्रिका के अभिव्यक्ति की आजादी के हक को पसंद करते हैं, और इस नाते उसके मजाक को, उसके तानों को बर्दाश्त करते हैं। अमरीका के बारे में लोगों को याद होगा कि वहां पर एक ईसाई पादरी ने किस तरह मुनादी करके कुरान के पन्ने जलाए, और वहां की सरकार ने, वहां के कानून ने उसे बर्दाश्त किया। 
लेकिन हम फिर से आज के मुद्दे पर लौटें, तो सिखों को लेकर जो लतीफे चलते हैं, वे आज मानो दूसरी बार बहस का मुद्दा बने हैं। पहली बार इनको लेकर तब तनाव हुआ था जब पंजाब में आतंक चल रहा था, और तब देश भर में सिखों को कहीं मजाक में, तो कहीं गंभीरता से, खाड़कू (आतंकी के लिए इस्तेमाल होने वाला एक शब्द) कहा जाने लगा था, और पहली बार सिखों को उसका बुरा लगना शुरू हुआ था। इसके अलावा यह बिरादरी बहुत ही जिंदादिल, बहुत ही यारबाज, और बहुत ही मजाकपसंद मानी जाती है, और इसके खुशवंत सिंह सरीखे गंभीर लेखकों से लेकर आम सिखों तक लोगों की सहनशीलता बहुत रही। लेकिन आज अदालत को अगर इस पर फैसला करना है, तो हमारा यह मानना है कि अदालत का कल का रूख एक उदारवादी और स्वस्थ रूख था, और अगर इसे बर्दाश्त किया जा सकता है, तो यह एक बेहतर नौबत होगी। लेकिन दूसरी तरफ एक धार्मिक समुदाय को इस बात के लिए बेबस भी नहीं किया जा सकता कि वह दूसरों के मजाक बर्दाश्त करे, और यह कोई दूसरे तय नहीं कर सकते कि सिखों को कितना मजाक बर्दाश्त करना चाहिए। भारत में सहनशीलता घटती चल रही है, और धार्मिक आधार पर बना हुआ कोई समुदाय शायद ही एक समुदाय के रूप में अपनी मजाक को उतना बर्दाश्त करता हो, उसका उतना मजा लेता हो जितना कि फनजाबी कहे जाने वाले पंजाबी-सिख लोग करते हैं। यह बात मजाक की है, लेकिन है बहुत गंभीर। हमारी निजी राय अगर कोई पूछे, तो हम यही कहेंगे कि देश के बाकी धर्मों के लोगों को भी सिखों जितना उदार इस मामले में होना चाहिए, और एक बेहतर हास्यबोध, एक बड़ा सेंस ऑफ ह्यूमर एक सेहतमंद दिमाग का सुबूत भी होता है। सिखों के दिमाग को लेकर अनगिनत लतीफे और मजाक चलते हैं, लेकिन हमारा मानना है कि ऐसे मजाक के लिए बर्दाश्त एक बड़े दिलवाले, और एक बड़े दिमाग वाले ही रखते हैं। 

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