विजेता नीतीश की विनम्रता से सबको कुछ सीखने की जरूरत

संपादकीय 
9 नवम्बर 2015

बिहार में ऐतिहासिक जीत के बाद नीतीश कुमार ने अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में विपक्ष के साथ काम करने के लिए जिस तरह की दरियादिली की बात कही है, वह गौर करने के लायक है। अपने डीएनए के लिए भाजपा के प्रधानमंत्री की गालियां खाने के बाद भी नीतीश कुमार ने कल जितनी समझदारी और संतुलन की बातें की हैं, उनसे उन लोगों को सीखने की जरूरत है, जो कि जीतने के बाद आपा खो बैठते हैं, और भाषा का शिष्टाचार भी जिनका खत्म हो जाता है। दरअसल विजेता को विनम्र होना भी चाहिए, और नीतीश कुमार तो अच्छे या बुरे कैसे भी वक्त में संतुलित बातें करने के लिए जाने जाते हैं। यही वजह है कि कल जब कई टीवी चैनलों पर नीतीश को लेकर बहस चल रही थी, तो कुछ विश्लेेषकों का यह मानना था कि देश के अगले आम चुनाव में हो सकता है कि भाजपा के विरोध का गठबंधन नीतीश के इर्दगिर्द इकट्ठा हो। हालांकि ऐसी बात करने का अभी कोई वक्त नहीं है,क्योंकि अगले आम चुनाव साढ़े तीन बरस दूर हैं, लेकिन ऐसे किसी गठबंधन की संभावनाएं बनने और उसके शक्ल लेने में भी बरसों लगते ही हैं। और आने वाले बरसों में जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं, वहां पर भाजपा या एनडीए के खिलाफ बाकी पार्टियों के बीच के तालमेल अगले आम चुनाव के गठबंधन में मददगार भी हो सकते हैं। 
लेकिन अगले आम चुनाव को लेकर किसी अटकल के बजाए हम इस बात पर चर्चा करना चाहेंगे कि किस तरह एक भले नेता को जीत के बाद भी बददिमाग नहीं होना चाहिए, और लोकतांत्रिक उदारता की बात करनी चाहिए, वैसा आचरण करना चाहिए। बिहार में नीतीश के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं, एक सजायाफ्ता और प्रामाणिक भ्रष्ट लालू यादव के साथ मिलकर इस सरकार को चलाना आसान नहीं होगा, और अगर लालू कुनबे की हवस हावी हुई, तो हो सकता है कि नीतीश का तीसरा कार्यकाल मिट्टी में मिल जाए। लेकिन आज देश में राजनीति को नीतीश कुमार की बातों से कुछ सीखने की जरूरत है। आज जितना जहर हवा में घुला हुआ है, उसी का नतीजा है कि भाजपा वाले गठबंधन का ऐसा बुरा हाल देखने मिल रहा है। बिहार में जो बर्बादी भाजपा ने झेली है, वह अपनी बद्जुबानी की वजह से ही झेली है। अब भी वक्त है कि देश में संतुलित और भली बातें करने वाले लोगों से कुछ सीखा जाए। न सिर्फ भाजपा को, बल्कि तमाम राजनीतिक दलों को अपनी गंदी बातों को छोडऩा पड़ेगा, वरना उनके परंपरागत मतदाता भी उनको छोडऩे की मिसाल बिहार में पेश कर ही चुके हैं। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें