बदजुबान नेताओं की गंदगी देश को भारी पड़ती है

संपादकीय
2 नवंबर 2015

भारत के चुनावों में लोगों के मन में बसी हुई गंदगी कुछ उसी तरह फूलकर ऊपर तैरने लगती है जैसा कि किसी कड़ाही में तला जा रहा कोई समोसा या भजिया हो। लोग एक से बढ़कर एक गंदी बातें करने लगते हैं, और लगता है कि शाहिद कपूर के बजाय भारत के नेता नाच-नाचकर गा रहे हैं- गंदी बात, गंदी बात। और मीडिया के लिए यह कुछ मुश्किल बात रहती है कि कितनी गंदगी को दिखाने, सुनाने, या छापने के लायक माना जाए, और कहां पर पूर्णविराम लगाया जाए। मीडिया का आपस का मुकाबला उसे समझदारी का बर्ताव नहीं करने देता, और गंदी बातें पहले पन्ने पर आसानी से अच्छी जगह पा जाती हैं। 
अब जैसे कल ही केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने सोनिया गांधी के बारे में यह कहा कि पाकिस्तान में जब आतंकी ओसामा-बिन-लादेन की मौत हुई, तो सोनिया गांधी रात भर रोती रहीं, सो नहीं पाईं। हमारा ख्याल है कि तर्क से परे, तमीज से परे, और लोकतंत्र से परे की जो सबसे बेहुदी और गंदी बातें जो हो सकती हैं, यह उन्हीं में से एक थी। और यह भारत सरकार के एक मंत्री की कही हुई थीं, जिनकी बेबसी यह भी है कि वे एक हिन्दूवादी भाजपा में एक मुस्लिम नेता होने की अपनी जिम्मेदारी उठाते हुए अपने को कई किस्म के मुस्लिमों का दुश्मन साबित करने के मानसिक दबाव तले जीते हैं। जो लोग अखबारों में काम करते हैं, या कि मुख्तार अब्बास नकवी के बयानों को लगातार पढ़ते आ रहे हैं, उनको यह याद करने में खासी दिक्कत होगी कि पिछली बार नकवी ने कब कोई तर्कसंगत, न्यायसंगत, या अक्ल की बात की थी, अगर की थी तो। जिस तरह कांग्रेस में उसके प्रवक्ताओं में बदजुबानी करने वाले लोगों की भरमार रही, और पार्टी ऐसी बेवकूफी की रणनीति पर चलती रही, कि जब कभी कोई हिन्दू मुद्दा रहा, तो उस पर कांग्रेस की तरफ से लगभग हमेशा ही किसी मुस्लिम प्रवक्ता ने हमला दिखाया। कांग्रेस के प्रवक्ताओं में मनीष तिवारी जैसे लोग रहे जो कि जब मुंह खोलते थे, सुनने वालों के कानों में कड़वाहट घुल जाती थी। 
पार्टियां जानबूझकर गंदी बात पर डांस करने के माहिर लोगों को प्रवक्ता बनाती है, या कोई और वजह है, यह हमारी समझ से परे है। लेकिन जिस पार्टी के लोग भी ऐसी बदजुबानी करते हैं, उनको अखबारी सुर्खियां चाहे मिल जाएं, उनको इज्जत कभी नहीं मिलती, और न ही उनकी पार्टी का इससे कोई फायदा होता। बिहार के चल रहे चुनाव में अमित शाह से लेकर लालू यादव तक कई तरह की गंदी बातें एक-दूसरे के बारे में करते आ रहे हैं, और ऐसा लगता है कि गंदगी से किसी तबके को कोई परहेज नहीं है, और धर्मनिरपेक्षता हो या साम्प्रदायिकता हो, सबको गंदगी भारी पसंद है। फिर चुनावी भाषणों, बयानों और नारों का अक्ल से कोई भी रिश्ता होना जरूरी नहीं है। पाकिस्तान में बहुत बरस पहले हुए एक चुनाव में बेनजीर भुट्टो की पार्टी ने नवाज शरीफ के खिलाफ जगह-जगह बैनर टांगे थे जिन पर लिखा था- न मां शरीफ, न बाप शरीफ, नवाज शरीफ-नवाज शरीफ। 
इन बातों से किसी का मनोरंजन होता होगा तो पता नहीं, लेकिन हवा जहरीली बहुत हो जाती है। देश में अब कौन सा ऐसा तबका है जो कि गाली-गलौज के खिलाफ आवाज उठाए? जहां तक मीडिया का सवाल है, तो घोड़ा अगर घास से दोस्ती करेगा, तो खाएगा क्या? अगर सारे नेता सूफियाना जुबान में बातें करने लगेंगे, तो लोग दो-चार दिन में एक दिन अखबार देख लेंगे। लेकिन समाज के किसी जागरूक तबके को गंदगी के खिलाफ आवाज जरूर उठानी चाहिए। चुनाव के वक्त एक-दूसरे के बारे में कही गई घटिया, हिंसक, और अश्लील बातें बरसों तक लोकतंत्र और संसद का नुकसान करती हैं। भारत इसको भुगत रहा है। लोगों को याद होगा कि सोनिया गांधी का विरोध करते हुए सुषमा स्वराज ने एक वक्त यह कहा था कि अगर सोनिया प्रधानमंत्री बनेंगी, तो वे सिर मुंडा लेंगी। ऐसी नौबत तो नहीं आई, लेकिन अभी जब सुषमा स्वराज ललित मोदी की गैरकानूनी मदद करते हुए पकड़ाईं, तो कांग्रेस ने उनको घेरते हुए पूरी संसद ही ठप कर दी। लोकतंत्र में लोगों को बड़प्पन भी थोड़ा-बहुत सीख लेना चाहिए, वरना उनकी गंदगी देश को भारी पड़ती है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें