सवाल यह नहीं कि सवाली कितने हैं, सवाल यह कि सवाल क्या हैं?

संपादकीय
13 नवंबर 2015

ब्रिटेन की यात्रा पर पहुंचे भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बहुत से असुविधाजनक सवालों का सामना करना पड़ रहा है। उनका स्वागत तो सरकार और भारतवंशी समुदाय की तरफ से हो रहा है, लेकिन अलग-अलग तबके छोटी संख्या में उनकी नीतियों के खिलाफ, और भारत के आज के हालात के खिलाफ बैनर लिए सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, और भारत का एक तबका इन प्रदर्शनों को आकार से आंक रहा है। ये तमाम पहलू अलग-अलग नजरिए से सही हैं, और गलत भी हैं। विरोधी प्रदर्शन आकार में अगर छोटा है, तो उसे कमजोर या कम, महत्वहीन, या अनदेखा करने लायक मानना ठीक नहीं है। ऐसी ही अनदेखी के चलते भारत में बिहार के चुनावों में मोदी की पार्टी और गठबंधन की चुनावी बदहाली हुई है। और आज मोदी विदेशी जमीन पर भारत में आज फैली धर्मान्ध-हिंसा के खिलाफ कुछ शब्द चाहे बोल रहे हों, देश में भड़काई जा रही कट्टरता और साम्प्रदायिकता के खिलाफ उनकी जो चुप्पी लगातार दर्ज हो रही है, उसे ब्रिटेन में बसे भारतवंशी भी देख रहे हैं, और ब्रिटेन की सरकार भी। 
हम पहले भी इसी जगह कुछ मौकों पर यह बात लिख चुके हैं कि गुजरात दंगों के अपने इतिहास से उबरकर, आगे निकलकर, एक बड़ा नेता बनने की जो संभावनाएं मोदी के सामने थीं, उनमें से एक का भी इस्तेमाल उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद से नहीं किया है, और वे महज एक प्रधानमंत्री भर बन पाए हैं, जिनके बारे में उन्हीं के सहयोगी दल शिवसेना ने चार दिन पहले ही यह लिखा है कि लोकसभा चुनाव में मोदी की असाधारण सफलता इस वजह से हुई थी क्योंकि उनके सामने राहुल गांधी जैसा विकल्प विपक्ष ने पेश किया था। यह अलग बात है कि राहुल गांधी के मुकाबले कांग्रेस का कोई और मजबूत विकल्प भी पेश होता, तो भी शायद यूपीए का हश्र वही होता, लेकिन मोदी की जीत, एनडीए की जीत, ऐसी असाधारण नहीं हुई होती। आज ब्रिटेन की जमीन पर पहुंचकर भी मोदी का यह दौरा जिन घरेलू सवालों से लदा हुआ है, उनसे उनको घर पर रहते हुए ही जूझना था, उनका सामना करना था, और अपने आपको एक बेहतर लीडर साबित भी करना था। कुछ लोगों के सामने बड़ा बनने की संभावनाएं ही नहीं रहती हैं, लेकिन कुछ लोगों के सामने वक्त ऐसी संभावना पेश करता है। मोदी इन सवालों से वर्तमान में तो बच सकते हैं, लेकिन इतिहास के भविष्य में, या भविष्य के इतिहास में कैसे बचेंगे? 
बिहार का चुनाव न तो मोदी की शुरुआत है, और न ही मोदी का अंत। लेकिन यह एक अहमियत वाला बड़ा पड़ाव जरूर है, और भाजपा के सयान-लोगों के आलोचना वाले बयान से परे भी यह एक ऐसा पड़ाव है जिसमें डेरे पर ठहरकर मोदी और उनके साथियों को यह सोचना चाहिए कि देश के माहौल में जो जहर घोला गया है, उसी जहरीली हवा से मोदी की जीत की संभावनाओं में किस तरह दम तोड़ दिया। आज मोदी के साथ एक दिक्कत यह है कि जिस सोशल मीडिया को वे अपनी कुर्सी तक पहुंचने की राह में इस्तेमाल करके आए हैं, उसी सोशल मीडिया पर उनके ऐसे नामलेवा लोग तमाम किस्म की हिंसा और साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं, जिन लोगों को मोदी ट्विटर पर फॉलो भी करते हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो मोदी हर किसी की हिंसा के लिए जवाबदेह न होने का तर्क देते हुए भड़काई जा रही साम्प्रदायिकता से अपने को अलग साबित कर देते, लेकिन जब भारत का प्रधानमंत्री, या नरेन्द्र मोदी एक व्यक्ति के रूप में, ऐसे लोगों की ट्वीट फॉलो भी करते हैं, तो फिर वे अपनी एक न्यूनतम जिम्मेदारी से बरी भी नहीं हो सकते। 
लंदन में मोदी के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों को अनदेखा भी किया जा सकता है कि कुछ सौ लोग तो कहीं भी, किसी भी मुद्दे पर बैनर लिए हुए जुट सकते हैं, लेकिन सवाल गिनती का नहीं, मुद्दों का है, और योरप के देश इस बात के लिए भी जाने जाते हैं कि वहां की संसद दूसरे देशों के कुछ किस्म के घरेलू मामलों पर भी चर्चा करती है, और उन पर भी अपनी सोच सामने रखती है। हमको यह अंदाज नहीं है कि लंदन में उठ रहे इन मुद्दों का मोदी घर पर उठ रहे इन्हीं मुद्दों के मुकाबले कुछ अधिक नोटिस लेंगे या नहीं, लेकिन एक समझदार नेता को अपनी चुप्पी से परे इन आवाजों को सुनना और समझना चाहिए, और इतिहास में जो एक ऐतिहासिक मौका उसके सामने रखा है, उस मौके का इस्तेमाल करना चाहिए। 

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