भारत की राजनीति पर दलाई लामा का निहायत गैरजरूरी बयान

संपादकीय
15 नवंबर 2015
भारत में राजनीतिक शरण पर रह रहे तिब्बत के निर्वासित नेता दलाई लामा ने लोगों को बहस का एक और मौका दे दिया है। उन्होंने बिहार के चुनावी नतीजों को लेकर कहा कि ये नतीजे साबित करते हैं कि हिन्दू आबादी शांति और सद्भाव में यकीन करती है। अब भारत के राजनीतिक चुनावों को लेकर भारत में रह रहे एक धर्मगुरू का यह कहना एक राजनीतिक बयान के दर्जे में आता है, और कुछ लोगों ने उन्हें याद भी दिलाया है कि उन्हें यहां शरण मिली हुई है, यहां की राजनीति में हिस्सा लेने की जगह नहीं मिली है। दलाई लामा की कही हुई बातों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित इस बौद्ध धर्मगुरू का यह कहना कुछ अटपटा जरूर है। 
लोगों का दूसरे देशों में अलग-अलग दर्जा होता है, उन्हें कहीं पर काम करने की इजाजत मिलती है, और कहीं पर उन्हें केवल सिर छुपाने की जगह मिलती है। भारत में पड़ोस के देशों से आए हुए शरणार्थियों को जगह देने का लंबा इतिहास रहा है। यहां बांग्लादेश बनने के पहले के पूर्वी पाकिस्तान से आए हुए लाखों शरणार्थी कभी लौटे नहीं। उधर तिब्बत से आए हुए लाखों लोगों को भारत सरकार ने कई प्रदेशों में उनके माकूल मौसम वाले इलाकों में बसाया है, जिनमें छत्तीसगढ़ के मैनपाट का नाम भी है। और छत्तीसगढ़ में बांग्लादेशी शरणार्थियों की भी बड़ी पुरानी बसाहट है, उसके भी पहले पाकिस्तान से आए हुए शरणार्थी छत्तीसगढ़ में बसे हुए हैं। नेपाल से दसियों लाख लोग भारत में आकर काम करते हैं, बर्मा के लोग यहां रहते हैं, और भूटान के लोग भी। भारत की इस दरियादिली के बीच लोगों को यह शिष्टाचार निभाना चाहिए कि जिन शर्तों पर उनको यहां रहने की इजाजत मिली है, उनसे परे जाकर वे कोई ऐसा काम न करें जिससे कि भारत सरकार पर जनता के किसी हिस्से का यह दबाव आए कि ऐसे लोगों को बाहर निकाला जाए। लोगों को याद होगा कि बांग्लादेश से निकाली गई, या वहां न जा पा रही लेखिका तस्लीमा नसरीन लंबे समय से भारत में बसी हुई थीं, और यहां के कट्टरपंथी मुस्लिमों की नाराजगी के बावजूद भारत सरकार ने उनको यहां पर रहने की इजाजत दी, और बहुत खर्चीली हिफाजत भी अपनी तरफ से मुहैया कराई। कई बार तस्लीमा को लेकर यह विवाद उठता था कि सरकार इतनी खर्चीली शरण क्यों दे रही है? 
लेकिन आज हम इस मुद्दे पर एक दूसरी वजह से भी लिख रहे हैं। आज खाड़ी के देशों से लाखों मुस्लिम जान पर खेलते हुए योरप के देशों तक पहुंच रहे हैं और वहां शरण मांग रहे हैं, पा भी रहे हैं। लेकिन योरप में जगह-जगह स्थानीय लोग उनका विरोध भी कर रहे हैं, उनको शरणार्थियों के साथ आतंकियों के आने का भी डर है, और उनको एक सांस्कृतिक टकराव खड़ा होने की आशंका भी है। कुछ जगहों पर जिन गांवों में सैकड़ों सीरियाई शरणार्थियों को बसाया गया है, वहां पर गांवों की आबादी ही कुछ दर्जन ही थी। ऐसे में उन गांवों का पूरा हुलिया ही बदल गया है, और स्थानीय लोगों को इससे असुविधा महसूस हो रही है। अब ऐसे माहौल में अगर शरणार्थी जगह पाने के बाद स्थानीय सरकार के नियमों से टकराएं, वहां की संस्कृति से टकराएं, तो उनका अपना नुकसान भी होता है, और उनके बाद बाहर से शरण मांगते वहां पहुंचने वाले लोगों को जगह मिलने की संभावना भी कम हो जाती है। इसलिए लोगों को स्थानीय कानून, स्थानीय संस्कृति, और स्थानीय वातावरण का सम्मान करना भी सीखना चाहिए। आज पर्यटक वीजा लेकर लोग अगर किसी दूसरे देश में जाते हैं, और वहां पर राजनीति में हिस्सा लेने लगते हैं, तो उनको तो वहां से निकाला ही जा सकता है, उनके बाद वहां जाने का वीजा मांगने वाले लोगों के लिए दिक्कतें आ खड़ी होती हैं। लोगों को याद होगा कि भारत से संगीत-दलों में दूसरे देशों में जाने वाले लोग जब वहां पहुंचकर गायब हो जाते हैं, और वीजा खत्म होने पर भी नहीं लौटते हैं, तो वे अपने देश के बाकी लोगों के लिए एक परेशानी खड़ी कर देते हैं। हमारा मानना है कि दलाई लामा का यह राजनीतिक बयान निहायत गैरजरूरी है, और भारत में उनके दर्जे के माकूल भी नहीं है। वे खुद तो नोबल शांति पुरस्कार की वजह से कई तरह की रियायतें पा सकते हैं, लेकिन वे बाकी तिब्बतियों के लिए एक परेशानी खड़ी कर रहे हैं। 
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