आत्महत्या तक बढ़ जाने वाला तनाव पहले रोकने की जरूरत

संपादकीय
17 नवंबर 2015

 बिलासपुर में एक कॉलेज छात्रा ने प्रताडऩा और रैगिंग से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। उसके परिवार ने दो दिन पहले कॉलेज के प्राचार्य से हॉस्टल वार्डन के बर्ताव की शिकायत की थी। छत्तीसगढ़ में स्कूल और कॉलेज के हॉस्टलों में, और गांव-शहर के मुहल्लों में, लड़कियों के साथ कई तरह की ज्यादतियों के मामले हर हफ्ते दो हफ्ते में सामने आते ही हैं। हर पखवाड़े या महीने कोई न कोई लड़की छेडख़ानी से त्रस्त होकर आत्महत्या कर लेती है, और पुलिस बाद में गुंडों को पकड़कर कार्रवाई करती है। बहुत से ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें लड़की का परिवार लंबे समय से कुछ गुंडों-बदमाशों के खिलाफ छेडख़ानी की शिकायत करते आया है, लेकिन कार्रवाई न होने पर थक-हारकर, निराश लड़की आत्महत्या कर लेती है।
आत्महत्या तो किसी की भी जिंदगी की आखिरी कार्रवाई होती है। लेकिन ऐसे आत्मघाती फैसले से पहले लड़की हो या लड़का, बच्चे हों या बड़े हों, वे जिस अंतहीन यातना से गुजरते हुए ऐसा फैसला लेते हैं, वह यातना और उसका दौर सरकारी रिकॉर्ड में नहीं आ पाते। हम पहले भी इसी जगह पर कई बार सामाजिक परामर्श की जरूरत बताते आए हैं कि खुदकुशी कर रहे किसानों और उनके परिवारों को, नक्सल इलाकों में नक्सलियों और पुलिस की हिंसा के शिकार लोगों और उनके परिवारों को जैसे परामर्श की जरूरत है, उस पर इस राज्य में चर्चा भी नहीं होती है। दरअसल सरकारी अस्पतालों में मनोवैज्ञानिक परामर्श की क्षमता ही नहीं है, कुछ गिने-चुने अस्पतालों में शायद एक-एक परामर्शदाता हों, लेकिन वे ढाई करोड़ की आबादी में दसियों लाख जरूरतमंद लोगों में से गिने-चुने लोगों से ही बात कर पाते होंगे। 
ऐसे में सरकार को एक नए नजरिए से सोचना चाहिए। स्कूल और कॉलेज के जो शिक्षक मनोविज्ञान पढ़े हुए हैं, उन्हें परामर्श का एक कोर्स करवाना चाहिए, और उनके स्कूल-कॉलेज में उनके काम के कुछ घंटे इस मदद के लिए रखने चाहिए। लेकिन स्कूल-कॉलेज से परे भी एक बड़ी आबादी को मानसिक परामर्श की जरूरत है, और इसके लिए सरकार को स्वयंसेवी संगठनों, या सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर कुछ करना चाहिए। आज तो प्रदेश में मेडिकल-मनोचिकित्सकों की कमी भी बहुत बुरी है, और परामर्शदाताओं की भी। राज्य सरकार को अपने मेडिकल कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालयों तक में मनोचिकित्सा और मनोविज्ञान को महत्व देने की जरूरत है, आज न इनकी सीटें हैं, और न ही परामर्शदाताओं के लिए कोई नौकरियां ही हैं। छत्तीसगढ़ में गिनी-चुनी महंगी निजी स्कूलें हैं, जहां पर कि कुछ घंटों के लिए परामर्शदाता रहते हैं। आज सामाजिक विसंगतियों के बढ़ते हुए, तरह-तरह के नए प्रेम-संबंधों के बढ़ते हुए, तरह-तरह की हिंसा सामने आ रही है। ऐसी हिंसा से निपटने के लिए समाज की कोई तैयारी नहीं है, और सामाजिक तनाव से हुए अपराधों को महज पुलिस का मामला मान लिया जाता है। 
एक दूसरी दिक्कत यह है कि राज्य में महिलाओं की सुरक्षा के लिए, या मानवाधिकार की रक्षा के लिए, दलितों और आदिवासियों के अधिकारों के लिए जो संवैधानिक आयोग बने हैं, वे भी चूंकि इसी सरकार के मनोनीत लोगों से बने हैं, इसलिए वे सरकार के लिए कोई असुविधा खड़ी करने से बचते हैं। नतीजा यह होता है कि खबरें छपती रहती हैं, कार्रवाई होती नहीं हैं, और संवैधानिक संस्थाएं भी मजे से बैठी रहती हैं। यह सिलसिला भी थमना चाहिए। ऐसी घटनाएं जब विपक्ष के उठाए खबरों में कुछ अधिक आती हैं, विपक्ष सड़कों पर उतरता है, तब जाकर सरकार और आयोग कुछ करते हैं। यह रूख भी बदलने की जरूरत है। 

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