आस्था और लोकतंत्र के बीच का टकराव दुनिया भर में छाया

संपादकीय
18 नवंबर 2015

पेरिस पर हुए ताजा हमलों के बाद अब अमरीका से लेकर ब्रिटेन तक, और फ्रांस से लेकर भारत तक संस्कृतियों के टकराव की एक बहस अभूतपूर्व स्तर पर शुरू हुई है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पहली बार ऐसा तीखा बयान दिया है कि इस्लाम के नाम पर किए जा रहे आतंक पर मुस्लिम समाज की प्रतिक्रिया काफी नहीं है। और यह बात भारत के उत्तरप्रदेश के आजम खान से लेकर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह तक, और ब्रिटिश संसद में लेबर पार्टी के एक बड़े नेता तक लगातार उठ रही है। अमरीका से लेकर योरप के देशों तक शरणार्थियों पर उनकी नीतियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, और इन तमाम देशों में बसे हुए मुस्लिम एक अभूतपूर्व सामाजिक तनाव का सामना कर रहे हैं। ऐसे तनाव के बीच उन लोगों की दिमागी हालत की कल्पना नहीं की जा सकती जो कि अपने घरवालों को समंदर के सफर में खोते हुए सीरिया और लीबिया से योरप पहुंच रहे हैं, और सिर छुपाने की जगह मांग रहे हैं। आज का यह तनाव पिछले कई बरसों में कभी इस दर्जे का नहीं था, और इन तमाम देशों ने वहां के स्थानीय नागरिक अपनी खुद की हिफाजत को लेकर इतने फिक्रमंद पहले कभी नहीं थे। और शायद ऐसा ही एक सांस्कृतिक टकराव खड़ा करने इस्लाम के नाम पर आतंक करने वाले आईसिस जैसे संगठनों का मकसद है, क्योंकि वे सीरिया जैसे देश में नागरिकों पर कब्जा करके अपने को हवाई हमले से भी बचाते हैं, और अपनी ताकत भी बढ़ाते हैं। 
आज दुनिया के देशों में मुस्लिम आतंकी संगठनों के हमलों की वजह से एक बहुत बड़ा टकराव खड़ा हो गया है, और लोगों को शरण देने की उदारता दिखाने वाले लोकतांत्रिक देश भी यह सोचने पर मजबूर हुए हैं कि वे क्या करें? अमरीका में राष्ट्रपति पद का चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहा एक नेता वहां की उन तमाम मस्जिदों को बंद करने की मांग उठा रहा है जहां के बारे में यह शक है कि वे इस्लाम के नाम पर कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रही हैं। पश्चिम के जो लोकतंत्र धार्मिक समानता को कड़ाई से मानते हैं, वे आज बहुत बड़ी दुविधा से गुजर रहे हैं। धर्म के नाम पर कुछ संगठन जब लगातार कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रहे हैं, तो वे देश लोकतंत्र के अपने मूल्यों पर कितना कायम रहें, और कितना खतरा झेलें? वहां पर राजनीतिक दल भी अपने देश की और अपनी उदारता के बारे में एक बार फिर सोचने को मजबूर हैं, और सरकारों को यह समझ नहीं आ रहा है कि वे रातों-रात अपनी नीतियों पर फिर कैसे पुनर्विचार करें, और कैसे आते हुए शरणार्थियों को मना करें। 
दरअसल लोकतंत्र और धर्म के बीच एक बुनियादी विरोधाभास है, और आतंकी हमलों में इस विरोधाभास को एक बार फिर सामने रखा है। यह सिर्फ इस्लाम के साथ नहीं है, बल्कि दुनिया के अधिकतर धर्मों के साथ यह बात जुड़ी हुई है कि उन्हें मानने वाले लोग अपनी आस्था को अपने देशों के संविधान से ऊपर मानते हैं, और इसे लेकर देशों के भीतर भी लगातार छोटे या बड़े टकराव होते रहते हैं। भारत में भी बाबरी मस्जिद को लेकर, शाहबानो को लेकर, या कई और मुद्दों पर धर्म और कानून के बीच टकराव होते रहा है। आस्थावान लोग कानून अपने हाथ में लेते हैं, या कि जैसा कि शाहबानो के मामले में हुआ, कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए संसद में अतिबहुमत वाली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया था। दुनिया के तमाम देशों में जहां भी कोई धार्मिक राज नहीं है, जहां भी सभी धर्मों का दर्जा बराबर है, वहां लोगों को अपने धर्म को उन देशों के संविधान के नीचे ही रखना चाहिए। जब लोग अपनी आस्था को देश के कानून के मुकाबले खड़ा करके टकराव करते हैं, तो लोग उनके धर्म को दुनिया भर में एक समस्या की तरह देखते हैं। ऐसा टकराव दुनिया के विकास के साथ कदम मिलाकर नहीं चल सकता। हर धर्म को अपने आपको आस्था और उपासना तक सीमित रखना चाहिए, और आतंक से जोडऩे के बाद किसी भी धर्म के लोग अपने धर्म के बाकी अमन-पसंद लोगों की जिंदगी भी मुश्किल कर देते हैं। आज दुनिया भर में मुस्लिम समाज के जो लोग आतंक के बिल्कुल खिलाफ हैं, वे लोग भी एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक तनाव झेल रहे हैं। और यह कहना समस्या का अतिसरलीकरण होगा कि मुस्लिम समाज को ही इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंक को रोकना चाहिए, ऐसा मुमकिन नहीं है क्योंकि ऐसे आतंकी संगठन बाकी मुस्लिमों के न तो प्रतिनिधि हैं, और न ही उनके काबू में हैं। यह कहना कुछ वैसा ही होगा कि बस्तर के आदिवासियों को चाहिए कि वे नक्सलियों को रोकें। इस्लाम के नाम पर आतंक कर रहे लोगों के खिलाफ फौजी कार्रवाई के अलावा और कुछ कारगर नहीं हो सकता, लेकिन दिक्कत यह है कि ये आतंकी उन्हीं फौजों के खड़े किए हुए हैं, जो फौजें आज उन पर बम बरसा रही है, और बेकसूर मुसलमान ऐसी फौजों और ऐसे आतंकियों के बीच पिस रहे हैं।

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