भारतीय लोकतांत्रिक चुनाव मोडऩा इस कदर आसान है?

संपादकीय
19 नवंबर 2015

लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी और भाजपा के लिए काम करने वाले अमरीका से लौटे एक भारतवंशी नौजवान प्रशांत किशोर भारतीय चुनावी राजनीति में एक जादूगर की तरह समझे जा रहे हैं। उन्होंने मोदी की जीत में मदद की, और अभी बिहार के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के लिए काम किया। वे जमीनी स्तर पर राजनीतिक विश्लेषण करने से लेकर चुनाव संचालन तक सलाह देने का काम करते रहे, और चुनाव अभियान रास्ता दिखाते रहे। अब उनके बारे में कई राजनीतिक दलों और कई प्रदेशों की तरफ से उत्सुकता से न्यौता भेजा जा रहा है कि वे उनको रास्ता दिखाएं। प्रशांत किशोर अभी कुछ बरस पहले तक भारतीय राजनीति में कहीं नहीं थे, और वे एक संगठन सिटीजंस फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस के तहत काम करते हैं, और नीतीश कुमार की ऐसी करिश्माई जीत का खासा बड़ा श्रेय उन्हें दिया जा रहा है। 
अमरीकी चुनावी राजनीति में तरह-तरह के विशेषज्ञों और संचालकों का हमेशा से एक बड़ा महंगा दखल रहते आया है, लेकिन भारतीय राजनीति में यह एक नई बात है। यहां पर पार्टियां और नेता अपने परंपरागत तौर-तरीकों से काम करते आए हैं, और मोदी ऐसे पहले नेता रहे जिन्होंने सोशल मीडिया से लेकर बाकी तरह के डिजिटल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया, और वे एक आंधी की तरह आए और छा गए। उनसे एक पीढ़ी कम उम्र के नौजवान राहुल गांधी के आसपास किसी ने सोशल मीडिया या डिजिटल मीडिया का नाम भी नहीं सुना था। लेकिन बिहार जिसे कि आमतौर पर एक पिछड़ा प्रदेश माना जाता है, और नीतीश कुमार भी अपनी पार्टी के साथ-साथ किसी तरह की आधुनिक तकनीक के लिए नहीं जाने जाते, वे भी पहली बार ऐसी विशेषज्ञ सेवा लेते देखे गए, और उसका नतीजा भी सामने है। 
हम ऐसी योजना और ऐसे चुनाव संचालन की खूबी की तो तारीफ करते हैं, लेकिन एक बात फिक्र खड़ी करती है कि क्या भारतीय चुनावी लोकतंत्र कुछ योजनाओं से इस हद तक प्रभावित किया जा सकता है? तो फिर पांच बरस के कामकाज, पचास बरस की पार्टी की साख, और नेताओं की अपनी छवि का क्या मतलब रह जाता है? अगर भारत के चुनाव कुछ कम्प्यूटर और समाज विज्ञान विशेषज्ञ इस तरह मोड़ सकते हैं, तो इसका एक मतलब यह है कि भारतीय लोकतंत्र परिपक्वता से दूर है, और इस तरह की विशेषज्ञता को कोई पैसों से हासिल करके बिना चुनावी भ्रष्टाचार के भी अपनी संभावनाएं बढ़ा सकते हैं। यह नौबत खतरनाक है। अभी तक तो हम यह मानकर चल रहे थे कि चुनावों में भ्रष्टाचार से मतदाताओं को प्रभावित किया जा सकता है, किया जाता है। लेकिन अब अगर चुनाव संचालन एक विज्ञान की तरह हो गया है, और उसे कुछ लोग राजनीति के बाहर से आकर इस हद तक प्रभावित कर सकते हैं, तो यह काम कल के दिन किसी दूसरे देश की ताकतें, भारत की कारोबारी ताकतें, या कोई आतंकी ताकतें भी खर्च करके कर सकती हैं।
भारतीय लोकतंत्र में चूंकि किसी भी नेता या पार्टी के लिए न सिर्फ ऐसा अहिंसक औजार इस्तेमाल करने की आजादी, इसलिए इस पर कोई रोक तो नहीं लग सकती, लेकिन लोगों को यह सोचना होगा कि यह सिलसिला मतदाताओं की स्वाभाविक पसंद पर किस हद तक हावी हो सकता है, और उससे कैसे जूझा जा सकता है? और फिर यह नेताओं और राजनीतिक दलों के पारंपरिक तरीकों की एक नाकामयाबी भी है, जिसके बारे में उनको सोचना चाहिए। 

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