नीतीश की राष्ट्रीय संभावनाएं बिहार की कामयाबी पर टिकीं

संपादकीय
20 नवंबर 2015

बिहार में आज से नीतीश कुमार की एक नई गठबंधन सरकार काम सम्हाल रही है, और देश भर की नजरें इस सरकार पर दो वजहों से टिकी रहेंगी, एक तो यह कि नीतीश मोदी के एक विकल्प की तरह चर्चा में हैं, और दूसरी बात यह कि लालू-कुनबे के साथ नीतीश अपनी बेहतर-प्र्रशासन की छवि को कैसे जारी रख सकेंगे। ये दोनों ही बातें इसलिए महत्व रखती हैं क्योंकि देश अब एनडीए-मोदी के एक विकल्प की तरफ देख रहा है, और यह विकल्प कांग्रेस-रहित तो नहीं रहेगा, लेकिन कांग्रेस की अगुवाई वाला भी शायद न रहे। कहने के लिए भारतीय राजनीति में लंबे समय से गैरकांग्रेस-गैरभाजपा विकल्प की बात होती है, लेकिन देश भर की तस्वीर को देखें तो ऐसा कुछ मुमकिन नहीं दिखता है। इसलिए बिहार से भाजपा-एनडीए का जो विकल्प उभरकर सामने आया है, और जिसमें नीतीश-लालू-कांग्रेस मिलकर शानदार तरीके से जीतकर आए हैं, उसकी राज्य में कामयाबी अगर नहीं होती है, तो देश में उस मॉडल को अगले आम चुनाव के पहले ही खारिज कर दिया जाएगा। 
चुनाव जीतना एक अलग बात होती है, और सरकार चलाना एक बिल्कुल अलग बात। और यह बात पिछले आम चुनाव के बाद से अब तक खुद नरेन्द्र मोदी ने सबसे अधिक साबित की है। वे एक ऐतिहासिक जीत के बाद प्रधानमंत्री बने, और फिर मानो अगले ही दिन से सरकार और पार्टी सब कुछ उनके काबू से परे हो गए, और चुनावी मोर्चे की जीत सरकारी कामकाज के मोर्चे की जीत में तब्दील नहीं हो पाई। नीतीश कुमार के सामने भी यह एक बहुत बड़ी चुनौती रहेगी कि लालू यादव के दो बेटों के मंत्री रहते हुए, और लालू की पार्टी के बराबरी की गिनती के मंत्री रहते हुए वे एक साफ-सुथरा शासन कैसे चला पाएंगे? लालू यादव का अपना इतिहास सरकार में घोर अराजकता, और परले दर्जे के भ्रष्टाचार का रहा है, वे सजायाफ्ता हैं, और अदालती अपील के चलते हुए जमानत पर जेल से बाहर हैं। वे घोर कुनबापरस्त हैं, और धर्मनिरपेक्षता के नारे से परे उनका लोकतंत्र पर कोई भरोसा नहीं है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार इनमें से अधिकतर खामियों से परे हैं, और उनके पिछले दो कार्यकाल बेहतर रहे, और इसीलिए जनता ने इस बार इस गठबंधन को चुना, क्योंकि पहले से यह साफ था कि लालू और कांग्रेस के बावजूद मुख्यमंत्री नीतीश ही रहेंगे। 
खुद लालू यादव के लिए बेहतर यही होगा कि वे अपनी अगली पीढ़ी को एक कम बेईमान राजनीति करने का एक मौका दें, अपने बेटों को ईमानदारी से राजनीति चलाने का एक मौका दें, वरना जनता के बीच इस सुगबुगाहट में अधिक वक्त नहीं लगेगा कि भ्रष्टाचार और बेईमानी इन बेटों के डीएनए में है। इसलिए अपने बेटों की भलाई के लिए, और देश में एक नए राजनीतिक विकल्प के लिए लालू यादव को भ्रष्टाचार की अपनी हवस को काबू में रखना चाहिए। चूंकि उनकी पार्टी की सीटें नीतीश की पार्टी से भी अधिक रही हैं, इसलिए उनकी बददिमागी का एक खतरा खड़ा हो सकता है, और भाजपा-एनडीए ऐसी ही किसी नौबत की तरफ हसरत लगाए देख रही हैं। 
बिहार की चुनावी राजनीति ने कांग्रेस को उसकी जगह बता दी है। और जिस ठंडे मिजाज के साथ कांग्रेस ने बिहार में इसे बर्दाश्त किया है, उसे वैसी ही बर्दाश्त बाकी देश के लिए भी विकसित करनी चाहिए। बहुत से ऐसे मौके आते हैं जब इतिहास के बड़े लोगों को वर्तमान में छोटे लोगों के मातहत काम करना पड़ता है, और उसे किसी गुस्से या निराशा के साथ नहीं, उसे एक सबक की तरह लेना चाहिए। नीतीश कुमार देश में भाजपा गठबंधन के एक मजबूत विकल्प की तरह उभरने की संभावना रखते हैं, लेकिन यह संभावना बिहार में उनकी इस पारी की कामयाबी पर ही टिकी हुई है।

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