तथ्यों का जवाब विशेषणों से देने की भारतीय राजनीति

21 नवंबर 2015

संपादकीय
भाजपा के एक प्रमुख और बड़बोले नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने राहुल गांधी पर एक तगड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि ब्रिटेन की एक कंपनी में वे डायरेक्टर हैं, और इस कंपनी के कागजात में उन्होंने अपने को ब्रिटिश नागरिक बताया है, और यह भारत के चुनाव कानून के भी खिलाफ है, और भारत के विदेशी मुद्रा कानून के खिलाफ भी। उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखकर इस पर जांच मांगी। दूसरी तरफ राहुल गांधी ने कांग्रेस की एक बड़ी सभा में मंच से प्रधानमंत्री को चुनौती दी कि वे इस मामले की जांच करवाएं, और अगर वे कुसूरवार हैं, तो उन्हें जेल भेजें। लेकिन पिछले चार दिनों में सुब्रमण्यम स्वामी के आरोपों के तथ्यों के बारे में कांग्रेस ने कुछ नहीं कहा है। खुद राहुल ने भी स्वामी को मोदी का चमचा कहा, लेकिन किसी तथ्य का खंडन नहीं किया। यह पहला मौका नहीं है जब लोग तथ्यों का जवाब तथ्यों से देने के बजाय विशेषणों से दे रहे हैं। जब स्मृति ईरानी पर फर्जी डिग्री का आरोप लगा, जब रॉबर्ट वाड्रा पर जमीनों के धंधे में सरकारी ताकत के बेजा इस्तेमाल का आरोप लगा, जब राहुल-सोनिया पर नेशनल हेराल्ड कंपनी को लेकर अदालत तक मामला गया, तब जवाब तथ्यों में सामने नहीं आ रहे। दोनों ही पार्टियों के पास, बल्कि राजनीति में हर पार्टी के पास, सुप्रीम कोर्ट के बड़े दिग्गज वकील हैं, लेकिन तथ्यों और तर्कों के जवाब में विशेषण खोखले लगते हैं। 
भारतीय राजनीति में यह बड़ी विचित्र बात है कि नेता अपने पर लगने वाले आरोपों को कभी जनता की अदालत में साबित करने की बात करते हैं, और कभी कानून की अदालत में। हमारा अनुभव यह रहा है कि जब नेताओं के खिलाफ मामला कानूनी रूप से पुख्ता होता है, तो वे जनता की अदालत में जाकर चुनाव में अपने को सही साबित करने की बात करते हैं, और जब उनके खिलाफ आरोप कानूनी रूप से कमजोर रहते हैं, तो वे जनता के बीच जाकर ऐसी सार्वजनिक चुनौती देते हैं कि सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करे। यहां पर ऐसे नेताओं तक पहुंच वाली राजधानियों की मीडिया की कमजोरी भी सामने आती है कि वह बिना तीखे सवालों के, महज बयान दर्ज करके लौट आती है, कि उसका जिम्मा मानो एक नेता के बयान को दूसरे तक पहुंचाना हो। होना तो यह चाहिए कि मीडिया के लोग पुख्ता आरोपों पर पुख्ता जवाब मांगें, और जब तक वह जवाब न मिले, नेताओं को अप्रासंगिक बयानबाजी न करने दें। हालांकि इन दिनों सोशल मीडिया अपने आप में ऐसे तीखे सवाल उठाता है, लेकिन फिर भी भारत का प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कमजोर साबित होते हैं। 
लोगों को याद होगा कि बहुत से मामलों में जब विपक्ष के पास सररकार के खिलाफ कई मुद्दे होते हैं, और उनमें से किसी एक मुद्दे पर जब सरकार बुरी तरह घिर रही हो तो विपक्ष मांग करता है कि उस मुद्दे पर सरकार श्वेत पत्र जारी करे। हमारा तो मानना है कि सरकार हो या विपक्ष, हर किसी के सामने जनता की तरफ से यह मांग खड़ी होनी चाहिए कि ऐसे किसी विवाद के मामले में संबंधित लोग श्वेत पत्र जारी करें, और खुद होकर सारे तथ्य सामने रखें। आमतौर पर पार्टियां और नेता इस बात की आड़ लेते दिखते हैं कि मामला अदालत में हैं, या मामले की जांच चल रही है, इसलिए उस पर बोलना ठीक नहीं रहेगा। लेकिन हमारा मानना यह है कि तथ्य अगर ठोस तथ्य है, तो न तो वे अदालत को प्रभावित करने के दर्जे में आते, और न ही जांच को प्रभावित करने के। फिर जांच को प्रभावित करने का काम सरकार की तरफ से आया हुआ बयान तो कर सकता है, विपक्ष का बयान किसी जांच को कैसे प्रभावित कर सकता है? और जहां तक अदालत से इंसाफ आने की बात है, तो भारत की जनता यह जानती है कि यहां की न्यायपालिका कई मामलों में आधी सदी तक कोई फैसला सुनाए बिना रह सकती है। और जनता यह भी देखती है कि मुजरिम साबित होने के बाद किस तरह बहुत से नेताओं की पार्टियां सत्ता में आ जाती हैं, उनका कुनबा मंत्री बन जाता है, जमानत पर छूटे लोग पार्टियों के पदाधिकारी बन जाते हैं, कुल मिलाकर कोई भी कार्रवाई भारतीय लोकतंत्र में लोगों की बाधा नहीं बनती।
इसलिए अब सार्वजनिक रूप से ऐसा एक माहौल बनना चाहिए कि जनता की तरफ से लोगों से ठोस सवाल पूछे जाएं, और नेता, पार्टी, या सरकार जो भी हो, उन्हें कानून की अदालत या जनता की अदालत जैसी ढाल का इस्तेमाल नहीं करने देना चाहिए। 

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