मन की बात कहने का हक भी नहीं है आमिर खान को?

संपादकीय
25 नवंबर 2015

आमिर खान के बयान पर देश में दो तबके उबले पड़े हैं। एक तो धर्मान्ध तबका है जो कि देश में बढ़ाई जा रही साम्प्रदायिकता पर मंत्रमुग्ध है, और भारतीय लोकतंत्र को एक धर्मराज्य में तब्दील करने पर आमादा है। दूसरा तबका उन लोगों का है जो इस बढ़ती हुई असहिष्णुता के खिलाफ हैं, और सचमुच डरे हुए भी हैं, और लड़ भी रहे हैं। लेकिन देश में सबसे हमलावर तेवरों के साथ जो लोग एक हिंदुत्व लागू करना चाहते हैं, लादना चाहते हैं, उनके पास हर असहमति के लिए एक बड़ा आसान समाधान है कि जो इस हमले से असहमत हैं, वे पाकिस्तान चले जाएं। आज देशद्रोह की परिभाषा बहुत आसान हो गई है, कि जो लोग आक्रामक राष्ट्रवाद का झंडा-डंडा लेकर चलने को तैयार नहीं हैं, जो लोग मोदी के आलोचक हैं, जो लोग गोमांस के आरोप में इंसान की हत्या के खिलाफ हैं, जो लोग भारतीय लोकतंत्र में धर्मों की गैरबराबरी के खिलाफ हैं, वे तमाम लोग देश छोड़कर चले जाएं, और उनके लिए मानो थोक में पाकिस्तान के वीजा का इंतजाम नफरतजीवियों ने कर रखा है। 
यह देश में एक साम्प्रदायिकता भड़काने की सोची-समझी साजिश है जिसके तहत साम्प्रदायिकता-विरोधी लोगों को अपने मन की बात करने से भी रोका जा सकता है। फिल्म अभिनेता आमिर खान ने महज इतना कहा था कि उनकी पत्नी किरण राव ने घर पर बातचीत में देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता पर फिक्र जाहिर करते हुए कहा था कि क्या इस देश में रहना सुरक्षित है, या बच्चों की सुरक्षा के लिए कहीं बाहर चले जाना चाहिए? इतनी सी बात को लेकर देश के लोग उन पर टूट पड़े हैं, और उनके नाम गालियों का अंबार लग गया है। अब सवाल यह है कि जो माहौल देश में पिछले एक बरस से खबरों में है, चर्चा में है, बहस का मुद्दा है, वह अगर किसी के मन में उठे, तो क्या उस पर लाठियां लेकर इस तरह टूट पड़ें? 
यह एक हकीकत है कि आज देश में साम्प्रदायिक बर्दाश्त खत्म किया जा रहा है। देश में एक धर्मान्ध आक्रामकता लागू की जा रही है। और देश में सनातनी हिन्दू सभ्यता के कुछ गिने-चुने मूल्यों को बाकी आबादी पर लादा जा रहा है, जिनसे कि हिन्दू आबादी का भी अधिकांश हिस्सा असहमत हैं। इस बढ़ती हुई बेचैनी को देश में करोड़ों लोग सोशल मीडिया पर उठा चुके हैं, और बड़े-बड़े नामी-गिरामी विचारक, साहित्यकार, कलाकार, वैज्ञानिक, और लेखक-पत्रकार इस बारे में लिख चुके हैं। देश के राष्ट्रपति एक से अधिक बार इस बारे में बोल चुके हैं, और फिक्र जाहिर कर चुके हैं। देश के भीतर इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखने वाले प्रधानमंत्री भी दूसरे देशों में जाकर भारत की सहनशीलता और संस्कृति की विविधता के बारे में बड़ी-बड़ी बातें बोलकर आ गए हैं। लेकिन देश के भीतर प्रधानमंत्री के संगी-साथी किसी भी आलोचना या किसी भी सहमति को पाकिस्तान भेजने पर आमादा हैं। 
यह बात जाहिर है कि भारत की फौजी लड़ाई, फौजी दुश्मनी, पड़ोस का सबसे बड़ा टकराव सिर्फ पाकिस्तान के साथ है। ऐसे में किसी को पाकिस्तान जाने की सलाह देने देश छोड़कर किसी दूसरे देश जाने की सलाह देना नहीं है, वह एक दुश्मन -देश जाने की सलाह देना है। और इस बात को तो प्रधानमंत्री के आसपास के लोग, उनके साथी-संगठन सौ-सौ बार बोल चुके हैं कि देश के माहौल की आलोचना करने वाले गद्दार लोग हैं, देशद्रोही हैं, और उनको पाकिस्तान चले जाना चाहिए। असम के राज्यपाल ने अभी दो दिन पहले ही जिस घोर साम्प्रदायिक जुबान में इस देश को महज हिन्दुओं का देश करार देने की कोशिश की है, वह अकेली बात उनकी राजभवन की बर्खास्तगी के लिए काफी होनी चाहिए थी, अगर देश का सुप्रीम कोर्ट इस बयान का नोटिस लेता।
इस देश में जिस धर्म के भी, जो भी लोग यहां के नागरिक हैं, वे तमाम लोग अपनी पसंद से यहां बसे हैं, और उनका हक किसी भी दूसरे नागरिक के मुकाबले कम नहीं है। इसलिए वैचारिक असहमति और आलोचना को लेकर किसी को गद्दार, किसी को देशद्रोही, किसी को देश का दुश्मन साबित करना एक शर्मनाक बात है। प्रधानमंत्री देश के बाहर जाकर दरियादिली के बयान देकर देश की हालत को नहीं सुधार सकते, इसके लिए उनको अपने ही संगी-साथियों को काबू में करना होगा, अगर वे ऐसा चाहते हैं तो। 

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