कुचले जा रहे संविधान के बीच समारोह गैरजरूरी, नाजायज

संपादकीय
26 नवंबर 2015

संविधान दिवस पर आज प्रधानमंत्री से लेकर केन्द्रीय गृहमंत्री तक संविधान की तारीफ में, और उसके प्रमुख-निर्माता डॉ. बाबा साहब आंबेडकर के तारीफ में संसद और बाहर बड़ी-बड़ी बातें बोल रहे थे। आज के इस सालाना जलसे में ऐसी बहुत सी बातें और कही जाएंगी, जिन पर अमल न तो इन शब्दों के पहले हो रहा है, और न ही इन शब्दों के बाद। यह एक बड़ी अजीब सी हिन्दुस्तानी बात है कि महान लोगों को याद करते हुए, शहीदों को याद करते हुए, उनके बारे में महानता की वे तमाम बातें कही जाती हैं, जिनमें से किसी पर अमल करने की न नीयत होती है, न वैसा बर्ताव होता है। जब मोदी विदेशों में गांधी को याद करते हैं, तो हिन्दुस्तान में गोडसे की पूजा करने की कोशिश होती है, और उसका कोई विरोध मोदी की तरफ से नहीं होता। इसी तरह जब आज इस देश में जगह-जगह दलितों से बलात्कार हो रहा है, उनकी हत्या हो रही है, उन्हें मंदिरों में घुसने से रोका जा रहा है, और खासकर भाजपा के राज वाले मध्यप्रदेश में ऐसी घटनाएं सबसे अधिक हो रही हैं, तब इन पर कुछ भी न बोलकर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री आज संविधान के बारे में जितना कुछ भी कहें, उन बातों का कोई वजन नहीं लगता। और आज संसद में आंबेडकर का इस्तेमाल गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने असहिष्णुता पर फिक्र करने वाले आमिर खान पर हमला करने के लिए भी कर लिया, और कहा कि उपेक्षा के बावजूद आंबेडकर ने देश छोडऩे की बात कभी नहीं कही। 
आज भारत में संविधान के शब्दों और उसकी भावना को जिस तरह और जिस हद तक कुचला जा रहा है, उस पर चुप्पी रखकर, उसे एक अपवाद साबित करने की कोशिश करके संविधान का जलसा बिल्कुल ही बेमानी है। आज इस लोकतंत्र में अगर किसी दस्तावेज की भावना को उस पर चढ़कर कूद-कूदकर कुचला जा रहा है, रौंदा जा रहा है, तो वह संविधान ही है। और यह बात अगर शब्दों से परे असल जिंदगी में हो, तो संविधान की लुग्दी ही बन चुकी होती। आज का यह जलसा, आज का संविधान दिवस लोगों को उनके कुचले जा रहे संवैधानिक अधिकारों की याद अधिक दिला रहा है। ऐसे हर सालाना जलसे लोगों को नाम से परे असल हालत की याद अधिक दिलाते हैं। 
कभी गांधी, कभी भगत सिंह, कभी सरदार पटेल, और कभी विवेकानंद, ऐसे लोगों के नाम और चेहरों का इस्तेमाल करके जब लोग और संगठन एक नाजायज सम्मान पाने की कोशिश करते हैं, तो आम लोग तो उस झांसे में आ जाते हैं, लेकिन जो जागरूक लोग हैं वे ऐसी कोशिश के भीतर के विरोधाभास को तुरंत समझ लेते हैं। लोगों को ऐसे लोगों की लिखी और कही हुई बातें एक बार फिर ढूंढने की जरूरत महसूस होती है, और लोग यहां तक निकाल लेते हैं कि सावरकर ने गाय को खाने से परहेज को कैसे गलत करार दिया था। आज का संविधान दिवस इस देश में बिल्कुल ही खोखला और गैरजरूरी है। देश की नौबत इतनी खराब है, खास और आम के बीच का फर्क इतना अधिक हो गया है, कि संविधान के रास्ते से पाई हुई ताकत से लोग बाकी लोगों के संवैधानिक अधिकारों को कुचलने का काम कर रहे हैं। जिस देश में साल के बाकी तमाम दिन, और संविधान दिवस के दिन समारोह से परे के बाकी तमाम घंटे देश के सबसे कमजोर तबकों, अल्पसंख्यकों, आम लोगों के अधिकारों की हत्या के हों, वहां पर संविधान दिवस निहायत गैरजरूरी, नाजायज, और चुभने वाला समारोह है। इसे मनाने वाले लोग अगर ईमानदार हैं तो उन्हें संविधान के शब्द और उसकी भावना का सम्मान करना सीखना चाहिए। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें