भारत की न्यायव्यवस्था में बुनियादी फेरबदल जरूरी

संपादकीय
7 नवंबर 2015

मुंबई के फिल्म उद्योग से जुड़े हुए एक अभिनेता आदित्य पंचोली का अपने मकान मालिक के साथ कुछ सौ रूपयों का झगड़ा चलते-चलते अभी सुप्रीम कोर्ट से निपटा, और अदालत ने उन्हें मकान खाली करने का आदेश दिया। यह मामला 1978 से निचली अदालत से शुरू होकर अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर निपटा है। और इतने लंबे सफर, और इतने छोटे मुद्दे को देखकर लगता है कि देश के जिन लोगों के पास महंगे वकील करने, या बड़ी अदालत तक जाने की ताकत नहीं रहती होगी, उनका क्या हाल होता होगा। और दूसरी बात यह कि देश की अदालतों पर अगर ऐसे मामलों के बोझ लदे रहेंगे तो जो अधिक जरूरी मामले हैं, उनका क्या हो सकेगा? अभी भी सुप्रीम कोर्ट और देश की बाकी अदालतों के जानकार लोगों का यह मानना है कि आज अदालतों में चल रहे सारे मामलों के निपटारे में साढ़े तीन सौ बरस लग सकते हैं। 
भारत में इंसाफ इतना मुश्किल है, कि लोग थक-हारकर, निराश होकर अपना इंसाफ खुद भी करने लगते हैं। सड़कों पर कत्ल होते हैं, कहीं नक्सल आंदोलन चलते हैं, कहीं लोग स्थानीय गुंडों के पास जाकर उनके मामले निपटाने की बात करते हैं, और अभी कुछ बरस पहले तक इंसाफ की तरफ से नाउम्मीदी से फूलन की तरह के बागी पैदा होते थे। आज भी सरकार से जुड़े हुए बहुत से मामलों में लोगों को लगता है कि इंसाफ के लिए अदालती लड़ाई के मुकाबले रिश्वत देकर मामले को बाहर ही निपटा लेना आसान है, और सस्ता पड़ेगा। दूसरी तरफ जमीन-जायदाद और कारोबार के बहुत से मामलों में लोग गुंडों को भाड़े पर लेकर मामले निपटा लेते हैं, क्योंकि अदालत जाने का मतलब अगली एक-दो पीढ़ी तक इंतजार करना होता है। इस देश में न्यायपालिका के पूरे कामकाज में ऐसे फेरबदल की जरूरत है कि लोगों को सच में इंसाफ मिले, वक्त रहते मिले, और इंसाफ के नाम पर आज देश में जो चल रहा है वह पाखंड खत्म हो। आज गिने-चुने मामलों में इंसाफ होते दिखता है, और अधिकतर मामलों में यह साफ-साफ दिखता है कि इंसाफ नहीं हो रहा है। 
इस देश में इंसाफ तक गरीब की पहुंच पूरी तरह नामुमकिन है, और पुलिस से लेकर जांच करने वाली प्रयोगशालाओं तक, गवाहों से लेकर वकील तक, और जजों तक इतना भ्रष्टाचार फैला हुआ है कि कदम-कदम पर इंसाफ की संभावना पटरी से उतरती रहती है। यही वजह है कि नक्सलियों के साथ हमदर्दी रखने वाले लोग जो खुद हिंसा पर भरोसा नहीं रखते हैं, वे भी यह मानते हैं कि इस देश में सबसे कमजोर के साथ इंसाफ बिना हिंसा के नहीं हो सकता। मिसाल के लिए कुछ मामलों को गिनाया जा सकता है जिनमें अदालत में खड़े लोगों के जीते जी ही फैसला हो गया हो, लेकिन लोगों के मर-खप जाने के बाद आने वाली पीढिय़ों को मिलने वाले इंसाफ की कहानियां अनगिनत हैं, और उन्हीं को देख-देखकर लोग यह कहते हैं कि ईश्वर खाकी वर्दी और काले कोट से बचाकर ही रखे। 
भारत में अदालतों का जो ढर्रा चले आ रहा है, उसमें बुनियादी फेरबदल की जरूरत है, आज यह सिलसिला गरीबों की पहुंच के भी बाहर है, और इसमें इंसाफ की संभावना भी बहुत कम है। 

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