एक भाषण कड़वाहट ऐसे घटा सकता है

संपादकीय
28 नवंबर 2015

कल लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संविधान पर चर्चा के दौरान गरिमापूर्ण तरीके से आंबेडकर से लेकर नेहरू तक के योगदान का जिक्र किया और संसद में पक्ष, विपक्ष के बीच जमी हुई बर्फ को तोड़ा। शायद इसीलिए संसद के बाद शाम को सोनिया-मनमोहन चाय के उनके न्यौते पर गए, और कुछ विधेयकों पर बात हुई। सोशल मीडिया पर भी मोदी के कटु-आलोचकों और निंदकों ने उनके भाषण की तारीफ की। इस एक भाषण से देश की संंसदीय राजनीति में अनबोला खत्म सा हुआ और उम्मीद की जा सकती है कि संसद के इस जारी सत्र में कुछ काम हो सकेगा। लोग अगर याद करें तो इसके एक ही दिन पहले वित्तमंत्री अरूण जेटली ने संसद में कांग्रेस को आपातकाल को लेकर जी-भरकर कोसा और धिक्कारा था, जबकि उन्हें ही जीएसटी विधेयक पर कांग्रेस के साथ की जरूरत भी है। मोदी ने कल दरियादिली की बातें करके बात संभाली और बातचीत की संभावना फिर कायम की।
हमारा हमेशा से यही कहना रहा है कि संसद में अनबोले जैसा माहौल अलोकतांत्रिक रहता है और देश की जनता के साथ बेईमानी भी रहता है। जनता तो पांच बरस के लिए चुनकर जब भेज देती है तो वह संसद में गतिरोध के बाद भी सांसदों को वापिस तो बुला नहीं सकती। नतीजा यह होता है कि बिना काम खाने-कमाने वाले सांसदों की रियायती थाली देख-देखकर जनता उन्हें कोसती है। कल प्रधानमंत्री ने जो किया वह पहल वे पिछले सत्र में करते तो देश का इतना नुकसान नहीं होता। एक भाषण से कड़वाहट कैसेकम हो सकती है यह कल संसद में साबित हुआ है।
राजनीति के बारे में कहा जाता है कि उसमें न कोई स्थायी मित्र होते और न ही स्थायी शत्रु, और इसी सोचके साथ भारत में तालमेल की जरूरत है। पार्टियों के बीच सैद्धांतिक, नीतिगत, या मुद्दों पर असहमति तो बनी रहेगी, लेकिन बातचीतया बहस का रिश्ता टूट जाना अलोकतांत्रिक होता है। सभी पार्टियों को अपनी अकड़ और दूसरों की हेठी से अधिक देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी की फिक्र करनी चाहिए।  

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