पेरिस पर आतंकी हमले से बाकी दुनिया भी नसीहत ले

संपादकीय
14 नवंबर 2015

फ्रांस की राजधानी पेरिस में कुछ घंटे पहले हुए एक अभूतपूर्व ताकत के आतंकी हमले ने करीब डेढ़ सौ नागरिकों को मार डाला है। कुछ बरस पहले भी मुंबई-हमले की तरह आतंकियों ने हथियारों से भारी लैस होकर, कई दस्तों में बंटकर, शहर के कई ठिकानों को लगभग एक ही वक्त निशाना बनाया, और बात की बात में उन्होंने इतने लोगों को मार डाला। पहली नजर में ऐसा माना जा रहा है कि इस्लामिक स्टेट नाम के एक आतंकी संगठन ने मध्य-पूर्व के देशों से बाहर निकलकर यह हमला किया है, और इसने एक बड़ी जटिल समस्या यह भी खड़ी कर दी है कि सीरिया और लीबिया जैसे मध्य-पूर्व के देशों से निकलकर जो लाखों शरणार्थी समंदर में जीते-मरते योरप पहुंच रहे हैं, अब उनका क्या होगा? एक अंदाज यह भी है कि मध्य-पूर्व में जगह-जगह काबिज इस्लामिक स्टेट नाम के इस सबसे खूंखार और कातिल आतंकी संगठन की कोशिश यह भी है कि योरप के बहुत से देश जिन शरणार्थियों को शरण दे रहे हैं, वे इस हमले के बाद अब अपने दरवाजे बंद कर लें, और सीरिया जैसे देशों के लोग इस्लामिक स्टेट के मौत के साए तले जीने को मजबूर रहें। लेकिन इससे परे भी कोई वजह इस हमले की हो सकती है, क्योंकि इसी फ्रांस के इसी पेरिस शहर में कुछ अरसा पहले कार्टून की एक पत्रिका से असहमत आतंकियों ने उसके कार्टूनिस्टों को मार डाला था, उनके काम को इस्लाम-विरोधी करार देते हुए ऐसे हमले जारी रखने की धमकी भी दी थी। 
आज एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या ऐसा कोई खूनी और आतंकी संगठन किसी धर्म का नाम लेकर एक संगठन खड़ा कर ले, तो क्या उसे धर्म के नाम के ऐसे बेजा इस्तेमाल की इजाजत देनी चाहिए? लेकिन हम हिन्दुस्तान में भी देखते हैं कि धर्म के नाम पर तरह-तरह का आतंक चल रहा है और हत्या और धमाकों वाले हमलों में भी धार्मिक नाम वाले संगठनों से जुड़े हुए लोग कई बार पकड़ाए हैं, और जेल में हैं, अदालती कटघरों में हैं। अब यह एक बड़ी अजीब समस्या है कि जब कोई संगठन अपने नाम को किसी धर्म के नाम पर जोड़कर खड़ा कर ले, तो उसकी इस आजादी को कैसे मनाही की जा सकती है, और कैसे उसे किसी धर्म के नाम का बेजा इस्तेमाल करने दिया जा सकता है? लेकिन इसके साथ-साथ एक सवाल यह भी है कि म्यांमार के बौद्ध लोगों से लेकर, हिन्दुस्तान के हिन्दू और मुस्लिम संगठनों तक, पाकिस्तान और मध्य-पूर्व के मुस्लिम संगठनों तक अगर धर्म के नाम पर भी आतंक फैलाया जा रहा है, और हिंसा की जा रही है, तो उनके अपराधों से धर्म को अलग कैसे किया जा सकता है? दुनिया का इतिहास गवाह है कि धर्म के आधार पर नफरत ने तमाम जंगों को मिलाकर भी हुई मौतों से अधिक मौतें धरती पर दर्ज की हैं। बल्कि दुनिया के इतिहास में भी बहुत सी जंग धर्म के आधार पर ही हुई हैं। इसलिए धर्म के भले लोग यह चाहें कि आतंक से जुड़े हुए उनके धर्म के बुरे लोग धर्म के नाम का इस्तेमाल न करें, तो यह रोक मुमकिन नहीं हैं। 
फिलहाल पेरिस पर हुए आतंकी हमले को देखें तो यह लगता है कि दुनिया में आतंक पर युद्ध छेडऩे के नाम पर अमरीका ने एक साजिश के तहत इराक और लीबिया जैसे कई देशों पर जो हमले किए, उसकी वजह से दुनिया में एक आतंकी-धर्मान्धता बढ़ी है, और आज खुद अमरीका को अपने आपको चौकसी करके ऐसे हमलों से बचा रहा है, लेकिन उसके पैदा किए हुए, या उसकी प्रतिक्रिया में पैदा हुए आतंकी संगठन दुनिया में जगह-जगह ऐसे हमले कर रहे हैं, और करते रहेंगे। इसलिए यह पूरा मामला, यह पूरी नौबत आसान नहीं है, और ऐसे में आतंक के खिलाफ एक कड़ी फौजी कार्रवाई की भी जरूरत है, लेकिन अमरीकी हमलों की तरह की नहीं, जिसमें कि लाखों बेकसूर मारे जाएं। अमरीका ने दुनिया में आतंक को समर्थन करके, खर्च करके भी बढ़ाया है, और बेकसूरों को मारकर भी। 
आज इस हमले से कुछ सौ लोग मारे गए हैं, और जख्मी हुए हैं, लेकिन इससे भी बड़ा नुकसान उन लाखों शरणार्थियों का हुआ है, जिनकी अब योरप में गुजर-बसर और मुश्किल हो जाएगी। इस पूरे हमले के कई ऐसे पहलू हैं जिसे कि भारत को सबक लेना चाहिए, क्योंकि यहां भी जिस तरह धर्मान्ध-आक्रामकता बढ़ाई जा रही है, उसकी भी इस तरह की कोई प्रतिक्रिया किसी भी तबके से किसी दिन सामने आ सकती है। इसी तरह बाकी दुनिया को भी नसीहत लेने की जरूरत है।
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