कतरा-कतरा खूबियों और खामियों से बनती धारणा...

संपादकीय
23 नवंबर 2015

लोगों का मूल्यांकन करते हुए दुनिया उनकी खूबियों और खामियों के बीच कई बार उलझ जाती है। अभी किसी ने इटली के कुछ सदी पहले के एक सबसे चर्चित कलाकार लियोनार्दो दा विंची की इस खूबी के बारे में लिखा कि वे बाजार में बिक रहे पशु-पक्षियों को इसलिए खरीद लेते थे, कि वे उनको आजाद कर सकें। लेकिन इटली के उन्हीं के जीवनकाल के दूसरे पहलू को देखें तो यह दिखता है कि वहां पर दास प्रथा कायम थी, और गुलाम खरीदे-बेचे जाते थे, और इस कलाकार की मौत के बरसों बाद पोप ने गुलाम प्रथा के खिलाफ फतवा जारी किया था। अब पशु-पक्षियों को आजाद करने की खूबी तो है, लेकिन उसी दौर में इंसानों की मंडी के खिलाफ कुछ न कहने की बात के मुकाबले यह बात दब जानी चाहिए थी। 
आज भी दुनिया भर में बहुत से लोग बेईमानी से करोड़ों कमा लेते हैं, और उसमें से कुछ लाख खर्च करके समाजसेवा का कोई ऐसा काम करते हैं जो कि सामने दिखता है। सतह पर देखकर अपना मन तय करने वाले लोग ऐसे लोगों को महान समाजसेवक मान लेते हैं, और उनके गुणगान करने लगते हैं। ऐसा ही दुनिया के बहुत से लोगों के शाकाहारी होने, या उनके शराब न पीने, या उनकी जिंदगी बहुत अनुशासित होने को लेकर मान लेते हैं, और उनके सात खून माफ कर देते हैं। दुनिया के बुरे से बुरे लोगों की कुछ खूबियों को लेकर उनकी खामियों को अनदेखा करने की चूक कर बैठते हैं। 
इसी तरह अच्छे लोगों की कुछ बुरी बातों को, उनके कुछ गलत कामों, या उनकी कुछ गलतियों को लोग उनकी अच्छी बातों से ऊपर देखना और दिखाना शुरू कर देते हैं। भारत में जवाहर लाल नेहरू के जो सबसे सक्रिय आलोचक हैं, उनके पास नेहरू की दो-तीन तस्वीरें हैं। एक में वे सिगरेट पीते दिख रहे हैं, और एक में वे एडविना माउंटबेटन के साथ हंसते हुए दिख रहे हैं। इन दो को लेकर नेहरू को बदचलन साबित करने की कोशिश आधी सदी से चली आ रही है, और अब डिजिटल जमाना आ जाने के बाद लोगों को यह लगता है कि अगर इन दो तस्वीरों को चारों तरफ बांटा नहीं गया, तो उग्र-राष्ट्रवाद में योगदान देना नहीं हो पाएगा। कुछ लोग इससे भी अधिक आगे बढ़ते हैं और किसी विदेशी महिला के साथ गांधी के डांस करने की एक फर्जी तस्वीर को यह बताते हुए फैलाते हैं कि गांधी कितने बदचलन थे। 
लेकिन ऐसी साजिशों से परे अगर महज हकीकत की बात करें, तो लोगों को किसी की खूबी या खामी को एक व्यापक संदर्भ में ही देखना चाहिए। नेहरू के मांसाहारी होने को जो लोग उनके खिलाफ इस्तेमाल करते हैं, उनको यह भी सोचना चाहिए कि उनके अपने साथी इस देश में गांधी से लेकर गुजरात तक कितना लहू बहा चुके हैं। उनको यह भी याद रखना चाहिए कि जिस गाय को बचाने के नाम पर लोग वाहवाही पाते हैं, उनमें से कितने लोग ऐसे हैं जो कि गाय को लेकर इंसानों के कत्ल पर कुछ भी नहीं बोलते। ऐसे लोगों का मूल्यांकन हर एक बयान के बाद नहीं हो सकता, लेकिन जो समझदार लोग हैं वे दूसरों की खूबियों के बिना उनकी खामियों का मूल्यांकन नहीं करते, और न ही उनकी खामियों के बिना उनकी खूबियों का। 
गरीबों का हक दबाने वाले लोग जब सड़क किनारे प्याऊ और भंडारे खोलकर गरीबों की सेवा का नाटक करते हैं, तो उन्हें समाजसेवी मान लेने के पहले उनके बारे में गहराई से कुछ सोच भी लेना चाहिए। यह बात आसान नहीं है, क्योंकि यह बात बहुत कड़वाहट फैलाने वाली है, लेकिन दुनिया के जो गंभीर और जिम्मेदार लोग हैं, वे कतरा-कतरा बातों पर किसी के बारे में अपनी धारणा नहीं बनाते। इसलिए छोटी-छोटी खूबियों और खामियों से उबरकर एक व्यापक नजरिए से लोगों के बारे में, मुद्दों के बारे में सोचना सीखना चाहिए।

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