आतंकियों पर हमला तो ठीक, लेकिन हमलावर एकराय नहीं

संपादकीय
22 नवंबर 2015

पेरिस पर हुए ताजा आतंकी हमलों के बाद जिस तरह संयुक्त राष्ट्र संघ ने आईएसआईएस नाम के स्वघोषित इस्लामी आतंकी संगठन को खत्म करने के लिए दुनिया को मंजूरी दी है, वह देखने लायक है। यह संगठन तो दुनिया के किसी कानून के लिए जवाबदेह नहीं है, लेकिन जो इजराइल इसी संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य है, उस इजराइल के आए दिन फिलीस्तीन पर होने वाले हमलों, और हर बरस मारे जा रहे हजारों फिलीस्तीनियों को लेकर संयुक्त राष्ट्र अपने ही खुद के प्रस्तावों को पिछले कई दशकों में लागू नहीं करवा पाया है। इसलिए लोगों के बीच ये सवाल उठने जायज है कि क्या किसी एक देश की जिंदगी, किसी दूसरे देश की जिंदगी से अधिक अहमियत रखती है? जिस तरह अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र की तमाम नसीहतों के खिलाफ जाकर इराक पर हमला किया, और वहां पर व्यापक जनसंहार के रासायनिक हथियार होने के गढ़े हुए झूठे सुबूतों के आधार पर फौजी कार्रवाई की, वहां के शासक की हत्या की, और संयुक्त राष्ट्र बैठे चुपचाप देखते रहा, उससे अब दुनिया के कारोबार में इस पंचायत पर सवाल उठ रहे हैं, और ये सवाल भी उठ रहे हैं कि अगर संयुक्त राष्ट्र नहीं तो फिर कौन? 
सीरिया पर हुए ताजा हमलों को देखें, तो मुस्लिम देशों की अपनी आपसी दुश्मनी भी सीरिया पर निकलते दिखती है, सउदी अरब जैसे सबसे संपन्न देशों की आतंकी-फंडिंग भी दिखती है, और यह बात भी उभरकर दिखती हैं कि मक्का का रखवाला देश किस तरह लाखों मुस्लिमों को मारने वाले आतंकी संगठनों का मददगार बना हुआ है। लेकिन आज एक नया सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सीरिया जैसा इलाका गांव की गरीब की लुगाई हो गया है कि जिसका हाथ जो चाहे जाकर थाम ले? उधर अमरीका या फ्रांस अपने हिसाब से सीरिया पर हमला करते हैं, इधर रूस ने सीरिया पर हमले किए, और वहां पर काम कर रहे, कुछ हिस्सों पर काबिज आतंकी संगठनों पर हमला करने के अपने-अपने फैसले लेते रहते हैं। ऐसे में क्या सीरिया दुनिया की इन बड़ी ताकतों का एक फ्री-स्टाइल अखाड़ा नहीं बन गया है? आज कहने के लिए तो ये बड़े देश, दुनिया की ये सबसे बड़ी फौजी ताकतें आतंकी संगठनों पर हमला कर रही हैं, लेकिन कब किसको आतंकी माना जाए, और उस पर कितनी ताकत का कैसा हमला किया जाए, और कब कितने बेकसूरों की साथ होने वाली मौतों को जायज माना जाए, इसे लेकर दुनिया के देश अलग-अलग सोचते हैं। क्या आतंकियों पर हमले की ऐसी अलग-अलग फौजी कार्रवाईयां कल के दिन आपस में टकराव का एक नया मुद्दा नहीं बनेंगी? और उस दिन इनमें सुलह किस तरह से होगी? आज सीरिया की सरकार अपने घरेलू आतंक के सामने बेबस है, और वह बाहर से आ रही ऐसी फौजी मदद का स्वागत कर रही है, लेकिन सीरिया का यह मैदान कब महाशक्तियों के दंगल में बदल जाएगा, इसका क्या ठिकाना है? 
और रूस तो फिर भी एक हद तक भरोसेमंद देश माना जाता है, अमरीका तो एक ऐसे गिरोह का सरगना है जो कि झूठे केस खड़े करके, पश्चिम के देशों को डरा-धमकाकर अपनी हमलावर फौज में शामिल करता है, और एक के बाद दूसरे देश पर हमला करता है, उन पर कब्जा करता है। ऐसे में रूस और अमरीका की अलग-अलग फौजी कार्रवाईयां चाहे एक ही आतंकी संगठन के खिलाफ क्यों न हों, वे आपसी सहमति और सर्वसम्मति की कार्रवाई नहीं बन सकतीं। दुनिया के कारोबार में इन दो महाशक्तियों की योजनाएं बिल्कुल अलग-अलग हैं, और परस्पर टकराव की भी हैं। कल के दिन अगर रूस इजराइल पर ऐसी ही आतंकी कार्रवाई का आरोप लगाकर हमला करे, तो अमरीका की क्या सोच होगी? इसलिए दुनिया में संयुक्त राष्ट्र की सोच जैसे एक संगठन की जरूरत है, जो कि सच में असरदार भी हो। आज तो अमरीका जैसा देश अपनी ताकत से बददिमाग होकर पर्यावरण के मुद्दों पर भी बाकी पूरी दुनिया को हिकारत से नकार देता है, और अपनी मर्जी से काम करता है। और उसकी ऐसी ही हिकारत बाकी दुनिया के जिंदा रहने के हक पर भी हैं। लेकिन हाल के बरसों में पहली बार रूस ने अपनी सरहद से परे अपनी फौजी मौजूदगी दर्ज कराई है, और लोग उत्सुकता से उसकी इस नई भूमिका, उसके इस नए रूख को देख रहे हैं, और अधिक दखल के साथ रूस अमरीकी हमलावर तेवरों पर एक नकेल भी बन सकता है। लेकिन अभी ऐसी किसी अटकल से दूर हम इस मुद्दे पर महज चर्चा कर रहे हैं, और आगे यह पता नहीं कौन सा रूख लेगा। 
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