बंदूक की हिंसा गई बटुए की हिंसा आई

संपादकीय
5 नवंबर 2015

जब चारों तरफ बुरी बातें हो रही हों, तब कुछ छोटी-छोटी अच्छी-अच्छी बातों को भी देख लेना चाहिए ताकि जिंदगी बिल्कुल ही निराशाजनक न लगने लगे। अब जैसे आज बिहार में इस विधानसभा चुनाव के आखिरी वोट पड़ रहे हैं, और जहां तक अखबारी सुर्खियां याद पड़ रही हैं, कई हफ्तों तक चले मतदान में भी न तो कहीं बूथ पर कब्जा सामने आया, न कहीं कत्ल हुए, और न ही बम फटे। अभी कुछ चुनाव पहले तक की ही बात है, अलग-अलग जातियों की, पार्टियों की, सेनाएं वहां बूथ कब्जा करती थीं, और कागजों पर सील लगाने वाले वोट पर मनमर्जी से थप्पा लगाती थी। बिहार को लेकर ही देश की चुनावी राजनीति में बूथ-छापना शब्द प्रचलित हुआ था, और ऐसा माना जाता था कि देश में सबसे अधिक अराजक चुनाव बिहार में होते हैं, और वहां बंदूकधारी बाहुबली, और बम चलाने वाले लोग चुनाव पर काबू करते हैं। 
लेकिन लोगों को अच्छी बातें तुरंत दिखती नहीं हैं, और आज बिहार में अगर बिना जुर्म, बिना हिंसा, ठीक तरीके से चुनाव हो रहे हैं, तो इसकी चर्चा भी नहीं हो रही है। इसके पीछे राज्य में एक बेहतर सरकार रहना भी एक वजह है, और एक दूसरी वजह है कि चुनाव आयोग ने देश के किसी भी हिस्से के लोकसभा या विधानसभा चुनाव को साफ-सुथरे तरीके से करवाने का इंतजाम कर लिया है। आयोग को इसके लिए असीमित अधिकार भी मिले हैं, और राज्य सरकारों की मनमानी से परे अब चुनाव आयोग अपनी मर्जी से केन्द्रीय बल लगाकर, दूसरे राज्यों से पर्यवेक्षक भेजकर चुनावों को बिना हिंसा करवाने का खासा कामयाब तरीका बना चुका है। 
इस सारी कामयाबी के बाद भी अगर सतह से थोड़ा नीचे जाकर देखें, तो आज भी भारत के चुनाव पैसों के दम पर इस हद तक प्रभावित होते हैं कि जीतने वाली पार्टी हार जाए, और हारने वाली पार्टी जीत जाए। एक तरीके से दिखने वाली हिंसा की जगह अब वोट खरीदने की ताकत रखने वाले बटुए ने ले ली है। पिस्तौल गई, बटुआ आ गया। जिस राज्य में भी पांच-दस फीसदी सीटों का फर्क रहता है, वहां पर अगर पैसों का बड़ा खेल हुआ है, तो फिर जनता का रूख भांपना नामुमकिन हो जाता है। और लोगों के वोट मंडी में इसलिए बिकने खड़े रहते हैं, क्योंकि लोगों को उनके सामने मौजूद विकल्पों में कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं दिखता, किसी में एक किस्म की खामी रहती है, और किसी में दूसरे किस्म की। अगर पार्टियों और उम्मीदवारों के बीच बड़ा साफ-साफ फर्क हो, तो मतदाता शायद बिकने के बजाय चुनना पसंद करें, लेकिन जब एक बुरे और दूसरे बुरे के बीच ही पसंद बची हो, तो फिर लोग बिकने को बुरा भला क्यों मानें? 
लोकतंत्र के लिए यह एक ऐसी खतरनाक बात है कि चुनाव को प्रभावित करने वाली पैसों की ताकत लोगों को जुर्म नहीं लगती, हिंसा नहीं लगती, और चुनाव प्रभावित हो जाते हैं। अब यह हमको ठीक से समझ नहीं पड़ता कि बंदूक की हिंसा जाने, और बटुए की हिंसा आने को लोकतंत्र का विकास माना जाए, या न माना जाए? यह कुछ उसी किस्म का है कि दुनिया की फौजें ऐसे हथियार तैयार कर रही हैं कि लोगों का खून न बहे, और उनकी मौत हो जाए। 

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