दीवाली का मौका कबाड़ खाली करने का भी होना चाहिए

संपादकीय
10 नवंबर 2015

उत्तर भारत का साल का एक सबसे बड़ा त्यौहार दीवाली कई किस्म के सामाजिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों को लेकर आता है, और शायद साल भर की सबसे अधिक आर्थिक हलचल भी इसी वक्त होती है। गरीबों के लिए और मध्यम वर्ग के लिए किसी भी बड़े त्यौहार की तरह यह त्यौहार भी एक बड़ा बोझ लेकर आता है, और लोग इसके आने और चले जाने की राह अधिक देखते हैं, खुशियां कम मना पाते हैं। लेकिन भारत में अधिकतर लोगों में अपने पुराने सामानों को सम्हालकर रखने की चाहत इतनी मजबूत रहती है कि साल के इस सबसे बड़े एक त्यौहार पर घर की सफाई करते हुए, कबाड़ साफ करते हुए भी बहुत सा ऐसा कबाड़ निकालकर झाड़-पोंछकर वापिस रख लेते हैं जिसे कि दस-बीस बरस में कभी इस्तेमाल नहीं किया गया है। इससे कई किस्म के नुकसान होते हैं, एक तो यह कि यह कबाड़ जिन लोगों के काम आ सकता था, वे इनमें से कुछ सामान नए खरीदते हैं, और धरती पर सामानों का बोझ बढ़ता है, सामान बनाने में पर्यावरण का एक नुकसान होता है। दूसरी बात यह कि हर किस्म का कबाड़ जगह घेरता है, गंदगी इक_ा करता है, और छाती पर बोझ बने रहता है। 
हिन्दुस्तान में रीसाइकिलिंग का एक अभियान चलाने की जरूरत है जिसमें कुछ भरोसेमंद सामाजिक संगठन आगे आएं, और लोगों के सामानों के मोह को घटाने की कोशिश करें, उनसे सामान लेकर उन्हें जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने का काम करें। यह काम एक तरफ तो गरीबों की मदद का होता है, दूसरी तरफ धरती पर से बोझ घटाने का भी होता है। दुनिया के कई देशों में बड़े-बड़े भरोसेमंद संगठन इस काम में लगे रहते हैं, और संपन्न-विकसित योरप के देशों में लोग अपना गैरजरूरी सामान या तो गैराज सेल लगाकर बेच देते हैं, या फिर घरों के बाहर उन सामानों को रख देने के दिन तय रहते हैं, लोग सामान बाहर रखते हैं, और जरूरतमंद लोग उठाकर ले जाते हैं। अगले दिन तक जो सामान कोई नहीं ले जाते, उनको म्युनिसिपल उठाकर कूड़े में ले जाती है। भारत जैसे देश में किसी भी सामान का कूड़ा बनना बड़ा मुश्किल है। लोगों की जरूरतें इतनी हैं कि औने-पौने सामान को भी लोग ले जाते हैं और उससे बरसों तक काम चलाते हैं। दुनिया में जिन सामानों को खराब होने पर लोग सीधे बेच देते हैं, हिन्दुस्तान में उन सामानों को बनाने वाले लोग गांव-गांव तक फैले रहते हैं। 
इसलिए पुराने सामानों के दुबारा और तिबारा इस्तेमाल की संभावना भारत जैसे देश में बहुत अधिक है, और उससे ही धरती पर बोझ बढऩा धीमा हो सकता है। यह काम खासकर शहरों में अधिक आसानी से हो सकता है जहां पर संपन्न लोग अधिक हैं, उनके पास कबाड़ अधिक है, इर्द-गिर्द गरीब अधिक हैं, और बड़े पैमाने पर सामानों की रीसाइकिलिंग अधिक आसान भी हो सकती है। दीवाली का मौका कबाड़ खाली करने का रहता है और लोगों के बीच इस सोच को बढ़ाने का काम जागरूक लोगों को करना चाहिए। 

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