इस देश में तमीजदार का सारा वक्त भड़ास में...

16 नवंबर 2015
हिन्दुस्तान के बहुत बड़े इलाके में लोगों की सोच देखनी हो तो किसी भी सार्वजनिक जगह पर थोड़ा सा वक्त गुजारना काफी होता है। किसी भी साफ-सुथरी जगह को देखते ही लोगों का मन वहां पर थूकने और हो सके तो मूतने को करने लगता है। किसी स्मारक या पर्यटन केन्द्र की कोई इमारत हो, या चट्टान हो, या किसी तरह की दीवार हो, तो लोगों के हाथ अपनी किसी मोहब्बत को वहां दर्ज करवाने को बेताब होने लगते हैं, और ऐसा न हो सके तो फिर कुदरत के दिए हुए बदन के कुछ चुनिंदा हिस्सों के नाम वहां लिखकर लोग ऐसी सुखद कल्पना में डूबे रहते हैं कि उन्हें पढऩे वाले लोगों के चेहरों पर कैसे भाव दिख रहे होंगे। 
सुबह-सुबह बगीचे में घूमने जाएं, तो लोग आसपास के दूसरे लोगों की मौजूदगी को जाने या अनजाने, अपने बदन को इस तरह खुजाते दिखते हैं, कि यह हैरानी होती है कि वे घर से रवानगी के पहले इस काम को निपटाकर कुछ मिनट लेट क्यों नहीं निकलते। जिस जगह दूसरे लोग चल रहे हों, और तेज चल रहे हों, वहां पर लोग इस अंदाज में झुंड बनाकर खड़े हो जाते हैं कि मानो बारिश के दिनों में डामर की सूखी सड़क पर खड़े होने या बैठने को बेबस जानवर हों। 
फिर आम हिन्दुस्तानियों के साथ एक दिक्कत यह भी रहती है कि वे जब तक अकेले रहते हैं, तब तक तो उनमें किसी कोने में थोड़ी सी इंसानियत बची रहती है, लेकिन जैसे-जैसे उनकी टोली के लोग बढ़ते चलते हैं, दोस्त इक_ा होने लगते हैं, वैसे-वैसे उनकी हिंसा बढऩे लगती है। और अगर यह भीड़ किसी एक जाति या धर्म की हुई, किसी एक पेशे की हुई, या किसी एक संगठन की हुई, तो लोग तुरंत हजारों बरस पहले के उस दौर में जीने लगते हैं जिसमें सबसे ताकतवर के ही अस्तित्व की गुंजाइश रहा करती थी। ऐसी भीड़ तुरंत ही आसपास के लोगों के लिए भारी हिकारत के साथ आपसी मजाक, आपसी गाली-गलौज, आपसी अश्लील बातें करने में जुट जाती है, यह मानते हुए कि भीड़ की इस ताकत के मुकाबले और तो कोई कुछ कर नहीं सकते। 
अभी मेरे शहर में एक बगीचे में महापौर ने निजी दिलचस्पी लेकर कसरत की बहुत सी मशीनें लगवाई हैं। इन पर बच्चे-बड़े, आदमी-औरत, हर उम्र और किस्म के लोग बड़े उत्साह से सेहत बनाने के लिए जुटे हुए दिखते हैं। लेकिन यहीं पर एक ही जाति के लोगों की, एक ही उम्र के नौजवानों की एक ऐसी टोली भी जुटी हुई थी, जो रोज उस बगीचे में आती है, और जहां बहुत से लोग उनको पहचानते भी हैं, लेकिन कसरत की मशीनों को लेकर दूसरों के बच्चों की मौजूदगी में, दूसरी महिलाओं की मौजूदगी में यह टोली अश्लील मजाक जोर-जोर से चिल्लाकर कर रही थी, और यह तो मानकर चल रही थी कि और लोग इसे समझते होंगे, लेकिन यह मानकर भी चल रही थी कि इतनी बड़ी टोली के मुकाबले कोई और विरोध करने खड़े नहीं होंगे। 
और भीड़ बनने के बाद हिंदुस्तानियों का बर्ताव कैसे बदलता है यह देखना हो तो ट्रेन में सफर करने वाले पुलिस वालों से लेकर फौजियों तक की वारदातें हर बरस खबरों में आती हैं कि किस तरह वे लोगों को उनकी सीटों से उठाकर बाहर फेंक देते हैं, और पूरे डिब्बों पर कब्जा कर लेते हैं। अभी कुछ महीने पहले मध्यप्रदेश के इंदौर के पास महू नाम की जगह पर शहर में फौजियों ने झगड़ा किया, और बाद में फौज के कॉलेज से और लोगों को लेकर आए और थाने में भारी तोडफ़ोड़ करके चले गए। इस देश में लोग जब एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं, तो अमूमन अच्छे काम के लिए तो नहीं होते, बुरे काम के लिए तुरंत ही एक बलात्कार पल भर में सामूहिक बलात्कार में बदलने के लिए लोग जुट जाते हैं।
हिन्दुस्तानियों के रंग देखने हों, तो उन जगहों पर देखें जहां सिगरेट पीने की मनाही हो, जहां पीने के लिए साफ पानी का इंतजाम हो। आम हिन्दुस्तानी ऐसी जगहों को जब तक धुएं से, या कुल्ला करके, पानी थूककर, नाक साफ करके जब तक गंदा न कर दें, उनके राष्ट्रवाद का पेट नहीं भरता। उनको लगता है कि वे अपनी हिन्दुस्तानी पहचान बता ही नहीं पाए। यह देश जिसे अपनी संस्कृति के एक काल्पनिक इतिहास पर एक आक्रामक घमंड है, उसे सभ्य लोगों के बीच बैठने का शऊर  भी नहीं है। यहां आने वाले विदेशी पर्यटक यहां के लोगों की वजह से नहीं आते हैं, बल्कि सैकड़ों बरस पहले कुछ दूसरे हिंदुस्तानियों की बनाई हुई इमारतों को देखने आते हैं, और आज के हिंदुस्तानियों के बावजूद आते हैं। आज के यहां के लोगों की वजह से नहीं आते, बल्कि उनके बावजूद आते हैं। इस फर्क को बारीकी से समझने की जरूरत है। 
जब आम हिंदुस्तानी अपनी बदतमीजी इस तरह दिखाते चलते हैं, तो वे अगली पीढ़ी को यही सिखाते भी चलते हैं। यहां के लोगों ने पता नहीं यह पढ़ा है या नहीं, कि चीन में वहां की सरकार ने अपने लोगों सेे बाकी दुनिया में खटकने वाली आदतें छुड़वाने के लिए औपचारिक सिखाना शुरू किया है, ताकि वे जहां जाएं वहां चीन के लिए हिकारत पैदा न करें। 
जिंदगी के बहुत छोटे-छोटे से नियम-कायदों को मानने के लिए भारत के भीतर भी उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच एक बड़ा फासला दिखता है। उत्तर को तो मानो किसी को अपनी किसी हरकत पर कोई उत्तर ही नहीं देना है। देश की यह हालत बदलनी जरूरी है, महज तस्वीर बदलने से काम नहीं चलेगा, क्योंकि न सिर्फ विदेशी सैलानी, बल्कि देशी सैलानी भी देश में जिस अंदाज में लूटे जाते हैं, जिस हद तक बदतमीजी झेलते हैं, उससे लोगों का देश के भीतर भी घूमने का उत्साह जाते रहता है। 
ऐसा नहीं कि आम हिंदुस्तानियों में भले लोग नहीं हैं, लेकिन लापरवाह, नासमझ, और बुरे लोग इतने हैं, उनका खटकने वाला बर्ताव इतना है कि किसी तमीजदार का सारा वक्त एक भड़ास में गुजरता है।

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