फायरब्रिगेड निगमों से लेकर होमगार्ड को, सही फैसला

संपादकीय
6 नवंबर 2015

छत्तीसगढ़ में दमकल विभाग पुलिस विभाग के तहत आने वाले होमगार्ड को दे दिया गया है। अब तक नगर निगम, नगर पालिकाएं अपने इलाकों में आग बुझाने का काम करती थीं, और उनकी बदहाली इतनी थी कि राजधानी रायपुर में किसी भी बड़ी अग्नि दुर्घटना से निपटने के लिए भिलाई इस्पात संयंत्र की फायर ब्रिगेड को 25 किलोमीटर दूर से बुलाना पड़ता था, या कभी एयरपोर्ट की फायर ब्रिगेड की तरफ देखना पड़ता था। छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े शहर और राजधानी बनने के बाद भी रायपुर में म्युनिसिपल की फायर ब्रिगेड का हाल यह था कि उसकी गाडिय़ां कंडम थीं, उनकी टंकी में डीजल नहीं रहता था, ड्राइवरों की कमी थी, और जो ड्राइवर थे भी, उनकी नजरें कमजोर थीं, आग बुझाने वाले कर्मचारियों के पास अपने खुद के बचाव के लिए कोई तरीके नहीं थे, और शहर में बन गई ऊंची इमारतों की ऊपरी मंजिलों तक पहुंचने की फायर ब्रिगेड की क्षमता नहीं थी। कुल मिलाकर नगर निगम के कामकाज के मिजाज में ऐसे हादसों से जूझना था भी नहीं। यह एक अच्छी बात है कि बहुत देर से सही, लेकिन राज्य सरकार ने समझदारी का फैसला लिया, और म्युनिसिपल से उसकी समझ, क्षमता, प्राथमिकता, और मिजाज से बिल्कुल परे का यह काम अलग कर दिया। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय वहां पर भोपाल और शायद कुछ दूसरे शहरों में भी फायर ब्रिगेड कुछ समय पुलिस विभाग के जिम्मे थी, और फिर बाद में पुलिस से हटाकर म्युनिसिपल को दे दी गई थी। अब पता लगा है कि मध्यप्रदेश भी छत्तीसगढ़ की इस नई नीति से कुछ सीखने जा रहा है। छत्तीसगढ़ में इस नए फैसले के तहत आग बुझाने, आपदा प्रबंधन, और आपातकालीन सेवाओं के लिए प्रदेश स्तर की यह नई फोर्स तैयार की जा रही है। जिसमें करीब 12 सौ लोग रहेंगे। 
राज्य सरकार को आपदा प्रबंधन की सोच को फाइलों से निकालना चाहिए। हम पहले भी कई बार इस जगह यह लिखते आए हैं कि पूरे प्रदेश में सरकार और सरकार से परे निजी क्षेत्र की जो क्षमता है, उसका एक ऐसा व्यापक नक्शा बनाने की जरूरत है कि किसी भी तरह की प्राकृतिक, औद्योगिक या किसी और तरह की मानव निर्मित आपदा आने पर तेजरफ्तार बचाव के लिए सारे साधनों और क्षमताओं का तुरंत इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है। इसमें मशीनों से लेकर इलाज की सुविधा तक, और तैराकों से लेकर रक्तदाताओं तक का ऐसा नक्शा संपर्क सहित बनना चाहिए कि प्रदेश में कहीं भी पल भर में यह देखा जा सके कि घायलों को किस तरफ भेजा जाए, वहां पर हर तरह के इंतजाम किस तरह जुटाकर रखे जाएं। इस काम को भी राज्य सरकार के दूसरे विभागों से परे सीधे पुलिस के हवाले इसलिए करना चाहिए कि हर तरह के हादसे में सबसे पहले पुलिस को ही झोकना पड़ता है। आज राज्य के सचिवालय में दूसरे विभागों के अधिकारी आपदा प्रबंधन की योजना बनाते हैं, और उनके विभाग के लोगों का जमीनी आपदा प्रबंधन से कोई लेना-देना नहीं रहता। यह पूरा काम जिला प्रशासन और पुलिस को देखना पड़ता है, और इसकी योजना पुलिस बेहतर तरीके से बना सकती है। 
राज्य सरकार ने म्युनिसिपलों से यह एक अनचाहा काम ले लिया है, और इसे लेकर म्युनिसिपल शायद खुश ही होंगी। सरकार के कुछ और विभागों में कामकाज को दुबारा बांटने की जरूरत है, और राज्य सरकारी ढांचे को एक कल्पनाशील तरीके से दुबारा ढालने की जरूरत है। एक तरफ तो राज्य में डॉक्टरों का भारी अकाल है, दूसरी तरफ सरकार में स्वास्थ्य विभाग में हर स्तर पर प्रशासनिक काम के लिए डॉक्टरों को जिलों से लेकर राजधानी तक झोंका गया है। कॉलेजों में पढ़ाने वाले कम हैं, और बिना किसी प्रशासनिक अनुभव के प्राध्यापकों को वरिष्ठता के आधार पर प्राचार्य बना दिया जाता है। ऐसा ही स्कूलों में भी होता है। सरकार को स्वास्थ्य प्रशासन, शिक्षा प्रशासन जैसे काडर अलग से विकसित करने चाहिए, जिनमें आज के कर्मचारी-अधिकारी ही अपनी जानकारी और अपने अनुभव के आधार पर छांटे जाएं, और उनकी क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल हो। एक नए राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ को मध्यप्रदेश की परंपराओं से अलग होकर एक नई ताजगी के साथ योजनाएं बनाने की सहूलियत थी, लेकिन डेढ़ दशक पूरा होने के बावजूद अधिकतर बातों के लिए यह राज्य अविभाजित मध्यप्रदेश के तौर-तरीकों पर ही टिका रहता है। यह सोच बदलने की जरूरत है। 

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