घटते-सिमटते मैदान, और बढ़ते स्टेडियमों वाला प्रदेश

संपादकीय
24 नवंबर 2015

छत्तीसगढ़ में देश-विदेश की टीमें आकर बड़े-बड़े मैच खेल रही हैं, और इनसे बड़ी-बड़ी खबरें निकलती हैं, यहां के लोगों को पहली बार ऐसे कैमरे देखने मिल रहे हैं, और राज्य एक-एक कर बड़े-बड़े स्टेडियमों से सजते चल रहा है। लेकिन इसके साथ जुड़ी हुई खेल की कुछ ऐसी बातें हैं जिनको अनदेखा करना इस राज्य को हमेशा के लिए दर्शक बनाकर रखेगा। राज्य में सैकड़ों करोड़ की लागत से बड़े स्टेडियम और उससे जुड़े हुए दूसरे ढांचे तो तैयार हो रहे हैं, लेकिन गांव-कस्बे और शहर के छोटे-छोटे स्कूली मैदान, कॉलोनियों के मैदान धीरे-धीरे कर सिमटते जा रहे हैं। उन पर या तो अवैध कब्जे हो रहे हैं, या सड़कों को चौड़ा करने के लिए राजधानी रायपुर में ही सारे बड़े मैदानों को घटाकर छोटा कर दिया गया है, और उसमें से कई तो अब किसी बड़े खेल के लायक बचे नहीं हैं। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती है। अगर इस प्रदेश की राजधानी कोई संकेत है, तो फिर मैदानों का बाजारू और कारोबारी इस्तेमाल इतना बढ़ गया है कि खिलाडिय़ों को खेलने के लिए वे नसीब ही नहीं हैं। एक के बाद एक प्रदर्शनी और बिक्री इन मैदानों पर लदी रहती हैं, और खिलाडिय़ों की कोई आवाज नहीं बची है। महंगे खेल और संपन्न खिलाड़ी तो क्लबों में चले जाते हैं, लेकिन असंगठित छोटे-छोटे खिलाड़ी, बिना टूर्नामेंट वाले बच्चे मैदानों को खोते जा रहे हैं। 
दूसरी तरफ इसी राज्य का यह अनुभव है कि जिन शहरों में साफ-सुथरे बाग-बगाचे बने हैं, वहां पर हजारों लोग रोज जाने लगे हैं, और अपने तन-मन का भला करने लगे हैं। अगर अच्छी सहूलियतें हों, तो लोग उनमें दिलचस्पी लेते हैं। लेकिन जिस प्रदेश में सौ-पचास साल पुराने चले आ रहे मैदानों के काट-काटकर छोटा कर दिया गया है, उस प्रदेश में खिलाड़ी बनने के बजाय दर्शक ही अधिक बनने की संभावना दिखती है। राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह खेल संगठनों से सीधे जुड़े हुए हैं, और करीब-करीब हर बड़े खेल-आयोजन में वे नजर आते हैं। लेकिन राज्य सरकार की ऐसी कोई नीति अभी तक सामने नहीं आई है जो कि मैदानों को छोटा होने से बचाए। शहरी ढांचे के विकास के लिए भी अगर किसी मैदान को किसी कोने से कम करना है, तो किसी दूसरी तरफ पहले मैदान को उतना बढ़ाया जाए, ऐसी कोई योजना न राज्य में है, और न ही म्युनिसिपल जैसी किसी संस्था के पास। शहर के बीच जो गिनी-चुनी खाली जगहें बची भी हैं, उन पर नगर निगम या विकास प्राधिकरण जैसी संस्थाएं व्यावसायिक प्रोजेक्ट बनाने में लगी हैं, बजाय ऐसी खुली जगहों को मैदान या उद्यान के काम में लाया जाए। 
दुनिया के कोई देश घटते हुए खेल मैदानों के साथ, या खेल मैदानों पर बाजारू प्रदर्शनियां लगाकर आगे नहीं बढ़ सकते। राज्य सरकार की तरफ से कई बार यह बात सामने आती है कि खेल मैदानों को गैर खेल उपयोगों के लिए नहीं दिया जाएगा, लेकिन राजधानी में सरकार के ही मंत्री-मुख्यमंत्री इन्हीं मैदानों पर प्रदर्शनियों के उद्घाटन के लिए आए दिन जाते रहते हैं। बड़े स्टेडियम और अंतरराष्ट्रीय मैच तो ठीक हैं, लेकिन क्या छत्तीसगढ़ी नौजवान पीढ़ी को महज दर्शक बनाकर रखना काफी है, या फिर स्कूल-कॉलेज के बच्चों के खेल के मैदान बचाना जरूरी है? मुख्यमंत्री को पूरे प्रदेश से सिर्फ यही रिपोर्ट बुलवाना चाहिए कि पिछले दस-बीस बरसों में खेल के मैदानों का आकार कितना रह गया है, और उनका कितना बाजारू या धार्मिक-सामाजिक-राजनीतिक इस्तेमाल होता है, और कितने दिन मैदान पर हो चुके गड्ढों के बीच बच्चे खेल पाते हैं? जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक छत्तीसगढ़ एक जिंदा टीवी स्क्रीन के सामने बैठकर बड़े-बड़े मैच देखने वाला दर्शक बना रहेगा। 

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