गरीब आबादी की पढ़ाई और इलाज बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता

27 नवंबर 2015
संपादकीय
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन अभी-अभी एक इंटरव्यू में भारत के मौजूदा हाल को लेकर कहा है कि दुनिया का कोई भी देश अपने लोगों को बुनियादी रूप से आगे बढ़ाए बिना, उनकी प्राथमिक जरूरतों को पूरा किए बिना, उनकी पढ़ाई और इलाज का इंतजाम किए बिना आगे नहीं बढ़ सकता। उन्होंने दुनिया के कई देशों की मिसाल देते हुए भारत को इस बारे में आगाह किया कि अगर वह एक आर्थिक ताकत बनना चाहता है तो अशिक्षित और बीमार, कमजोर आबादी के साथ वह कभी इस मंजिल पर नहीं पहुंच सकता। अमर्त्य सेन को गरीबों का हिमायती, और जनकल्याणकारी योजनाओं की वकालत करने वाला अर्थशास्त्री माना जाता है, और भारत के पूंजीवादी लोग उनकी सामाजिक सोच से गहरी असहमति रखते हैं। भारत में पिछली सरकार से लेकर इस सरकार तक ऐसे लोग कम नहीं हैं जो कि यह मानते हैं कि सामाजिक क्षेत्र में सरकार द्वारा दी गई सबसिडी से देश की आर्थिक हालत तबाह हो रही है। लेकिन अमर्त्य सेन का सोचना अलग है। सबसे गरीबों के आर्थिक और सामाजिक विकास को जरूरी बताने के साथ-साथ अमत्र्य सेन ने यह भी कहा कि जैसा कि अभी आरबीआई गवर्नर ने कहा है, देश में सहिष्णुता भी विकास के लिए जरूरी है।
हम अमर्त्य सेन की बातों से सहमत हैं, और पूंजीवाद को उनकी सोच में यह खोट दिख सकती है कि समाज कल्याण में और गरीबों को रियायत में सरकारी पैसे की बर्बादी बहुत होती है। ऐसा मानने वाले लोग भी कम नहीं हैं कि सबसिडी का अधिकांश हिस्सा चोरी में चले जाता है। लेकिन हमारा सवाल यह है कि ऐसी चोरी करने वालों में उन लोगों का तो कोई योगदान नहीं रहता जो कि इन रियायतों के असली हकदार हैं। जो गैरगरीब लोग सरकार में हैं, वे ही चोरी करते हैं, और चूंकि सरकारी चोरी को रोकने में लोग नाकाम रहते हैं, इसलिए इसे सबसिडी के खिलाफ एक तर्क बनाकर इस्तेमाल कर लिया जाता है।
हम अभी-अभी संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट का जिक्र करना चाहेेंगे जो बताती है कि कुछ दशकों के भीतर ही, 2050 तक दुनिया में कामकाजी लोगों की कमी पडऩे लगेगी। और इस रिपोर्ट के आकड़े अगर देखें, तो यह साफ है कि भारत की आबादी उसका बोझ नहीं है, वह उसकी दौलत है। अगर वह सेहतमंद रहे, और अगर वह पढ़ी-लिखी रहे, प्रशिक्षित रहे, हुनर सीखी हुई रहे, तो वह पूरी दुनिया में कमाकर देश का घर भर सकती है। 
इस रिपोर्ट के मुताबिक- एक तरफ भारत जैसे देश में सरकारी मेहनत से आबादी को काबू में रखने की भरसक कोशिश चल रही है और इसे एक आबादी-बम करार दिया जा रहा है कि भारत में लोगों के रहने-खाने को जगह नहीं बचेगी। दूसरी तरफ आने वाले बरसों को लेकर संयुक्त राष्ट्र का एक अंदाज यह है कि दुनिया एक दूसरे किस्म के आबादी-बम पर बैठी हुई है, और वह है घटती हुई आबादी का। विशेषज्ञों का एक अनुमान यह है कि 2050 में काम करने वाले लोग बहुत कम रह जाएंगे और वह दुनिया के लिए एक बहुत बड़ी समस्या होगी। 
अमरीका के कारोबारी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल में छपी एक रिपोर्ट में आबादी के भविष्य के आंकड़े पेश किए गए हैं। उनके मुताबिक अगला बरस ही दुनिया के विकसित देशों के लिए ऐसा पहला बरस होने जा रहा है जब वहां की कामकाजी आबादी 1950 के मुकाबले कम रह जाएगी। और एक अंदाज है कि 2050 तक यह कामकाजी आबादी 5 फीसदी घट जाएगी। चीन और रूस जैसे बढ़ते हुए बाजारों मेें भी कामगारों की कमी होने लगेगी, और उसी दौर में इन देशों में 65 से अधिक उम्र वाली आबादी आसमान छूने लगेगी। मतलब यह कि दुनिया की सबसे संपन्न अर्थव्यवस्थाएं कामगारों को तरस जाएंगी। 
हम अमर्त्य सेन की सोच, और संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों को मिलाकर देखें तो यह साफ-साफ तस्वीर उभरती है कि भारत के लोगों को काबिल बनाकर, सेहतमंद बनाकर यह देश आगे बढ़ सकता है, और ऐसा होने पर ही आगे बढ़ सकता है। इसके बिना दुनिया की कोई भी बड़ी अर्थव्यवस्था कभी आगे नहीं बढ़ी है। इसलिए इस देश के गरीब तबके की बुनियादी जरूरतों को पूरा करके उनका जीवनस्तर एक न्यूनतम सीमा के ऊपर लाना जरूरी है, और पांच-पांच बरसों में बंटे हुए जिन वित्तमंत्रियों को यह बोझ लगता है, वे लोग देश के भविष्य को अनदेखा करने के कुसूरवार के रूप में इतिहास में दर्ज होंगे।

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