नेताओं को ईमानदार अफसर विपक्ष में रहने तक सुहाते हैं

संपादकीय
29 नवंबर 2015
हरियाणा में एक बड़बोले मंत्री ने जिले की एक बैठक में शराब की अवैध बिक्री को लेकर सवाल-जवाब के दौरान वहां की महिला पुलिस अधीक्षक को बैठक से निकल जाने के लिए कहा। इस बदतमीजी के जवाब में अफसर ने बैठक से जाने से इंकार कर दिया तो मंत्री खुद ही अपने समर्थकों सहित वहां से निकल गए। चौबीस घंटे के भीतर इस दलित महिला आईपीएस का तबादला कर दिया गया। चूंकि यह पूरा मामला वीडियो रिकॉर्डिंग की शक्ल में इंटरनेट और टीवी पर मौजूद है, इसलिए देश भर में इसे लेकर हरियाणा की खट्टर सरकार की धिक्कार हो रही है। लेकिन हमको इसमें हैरानी की कोई बात नहीं लगती। ये मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ही हैं जिनका एक बयान महिलाओं को लेकर कुछ समय पहले आया था कि अगर महिलाओं को आजादी चाहिए, तो वे बिना कपड़ों के क्यों नहीं घूमतीं? 
हरियाणा में एक तरफ तो खाप पंचायतों की दकियानूसी सोच हमेशा ही खबरें खड़ी करती रहती है, दूसरी तरफ वहां महिलाओं की समाज में जगह इससे भी पता लगती है कि देश में लड़के-लड़कियों का अनुपात सबसे खराब हरियाणा में ही है, वहां के लोग बेटियों को जन्म के पहले ही मार डालने के आरोप झेलते हैं, और बाद में अपने बेटों के लिए दूसरे प्रदेशों से लड़कियां तरह-तरह से जुटाने की तोहमत भी उन पर लगती है। यह ऐसा प्रदेश भी है जहां की लड़कियां, जब उनको मौका मिलता है, वे दुनिया भर के खेल मुकाबलों से मैडल लेकर आती हैं। लेकिन यह प्रदेश लड़कियों को बराबरी का हक देना तो दूर रहा, उनको इंसान मानने से भी इंकार करने वाले प्रदेशों में माना जाता है, और हरियाणा की खाप पंचायतों की हत्यारी सोच के खिलाफ लगातार लिखा भी जाता है। दूसरी तरफ राजनीतिक ताकतें हैं जो कि अपने वोटों के लिए इन खाप पंचायतों के खिलाफ मुंह खोलने से भी डरती हैं, और कांग्रेस हो या भाजपा वे खाप पंचायतों को जिंदा रखना चाहती हैं, साथ रखना चाहती हैं। और तो और इंदिरा और सोनिया की पार्टी के पिछले कांग्रेसी मुख्यमंत्री खाप पंचायतों का गुणगान करते थकते नहीं थे, जब इन पंचायतों पर हत्या के फतवे जारी करने, हत्याएं करवाने जैसे आरोप लगे थे। 
अब यहां पर दो सवाल और है, एक तो दलित लड़की अपने दम पर आईपीएस बन रही है, और उसके अच्छे काम की चारों तरफ चर्चा भी है। ऐसे में एक बदतमीज मंत्री भीड़भरी बैठक में उससे बदसलूकी करता है, और लोकतंत्र में मिले अधिकारों के तहत सरकार उस अफसर को हटा भी देती है। लोगों को याद होगा कि इसी हरियाणा में जब एक दूसरे ईमानदार कहे जाने वाले खेमका नाम के आईएएस ने रॉबर्ट वाड्रा की जमीनों के मामलों में सरकारी मेहरबानी का भांडाफोड़ किया था, तो भाजपा ने देश भर में उसे चुनावी मुद्दा बनाया था। इसके बाद हरियाणा में भाजपा की सरकार बनी, और खेमका को उठाकर ऐसे हाशिए पर फेंका गया, कि आज उनका ओहदा भी किसी को याद नहीं है। अच्छे अफसरों को लेकर राजनीतिक दल तब तक ही खुश रहते हैं, जब तक कि वे अफसर उनके मातहत न हों। जब कड़क या ईमानदार अफसरों से काम लेना हो, तो राजनीतिक ताकतें उनकी जगह भ्रष्ट अफसर चाहती हैं, ताकि गलत काम कर चुके अफसरों से और गलत काम आसानी से कराए जा सकें। 
देश भर में राजनीतिक और सामाजिक ताकतों को एक काबिल और ईमानदार दलित महिला अफसर के साथ ऐसे सुलूक को लेकर एक सामाजिक जनजागरण अभियान छेडऩा चाहिए, और चाहे जो भी पार्टी ऐसा करे, उसे जगह-जगह धिक्कारना चाहिए। 

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