कमजोर और कुचले तबकों के मुद्दों पर चर्चा की जरूरत

संपादकीय
4 नवंबर 2015

छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ दिनों में अलग-अलग इलाकों में किसानों ने आत्महत्या की है। सरकारी अफसर यह साबित करने की कोशिश करते ही हैं कि खुदकुशी कर्ज की वजह से नहीं थी, लेकिन इस कोशिश के बजाय कोशिश यह की जानी चाहिए कि जहां-जहां फसल खराब हुई है, वहां-वहां सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र के सकारात्मक असर रखने वाले लोग बर्बाद हो रहे किसानों के सामने नौबत से उबरने का हौसला रखने की कोशिश करें। हम यह जिम्मा सीधे-सीधे सरकार पर इसलिए नहीं डाल रहे कि सरकार में बैठे लोग किसानों का मनोबल बढ़ाने के नाम पर फिर कुछ हजार एनजीओ बनाकर फिर सौ-पचास करोड़ रूपए इधर-उधर करने का रास्ता निकाल लेंगे। इससे परे जरूरत यह है कि केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं को लेकर खेतिहर-अर्थव्यवस्था के परामर्शदाताओं की एक सोच विकसित की जाए। ऐसे लोग सरकार से परे के होना जरूरी हैं, क्योंकि सरकार में बैठे लोग तो बीज से लेकर खाद तक, और खेती के कर्ज से लेकर बीमा तक किस तरह किसान को लूटने में लगे रहते हैं, इस पर हम इसी जगह कुछ समय पहले लिख चुके हैं। 
अब बात केवल किसानों की नहीं है, बस्तर जैसे इलाके में जहां पर नक्सल हिंसा से घिरे हुए लोगों को पुलिस और सुरक्षा बलों की हिंसा भी झेलनी पड़ रही है, और नक्सलियों की भी। ऐसे पूरे इलाकों में पूरी की पूरी पीढ़ी ही जान का खतरा देखते हुए, और दहशत में जीने को मजबूर है। ऐसे हर गांव में कई लोगों का कत्ल हुआ है, बलात्कार हुए हैं, और आदिवासियों का वह पूरा शोषण जारी है जिसकी वजह से नक्सल हिंसा को बस्तर में जगह मिली थी। अब हिंसा के शिकार ऐसे पूरे-पूरे इलाके की दिमागी हालत के बारे में सोचना कहीं भी सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि वहां के बच्चे ऐसी दहशत के बीच, ऐसी नफरत के बीच किस तरह की दिमागी हालत में बड़े होंगे, और बड़े होने पर वे नक्सलियों या सरकारी वर्दियों से किस तरह का बदला लेने की सोचेंगे? ऐसी सामाजिक स्थिति में व्यापक स्तर के सामाजिक परामर्श की जरूरत है, जो कि निजी स्तर के मनोवैज्ञानिक परामर्श से अलग बात है। अभी छत्तीसगढ़ में ऐसी कोई बात, ऐसी कोई सोच किसी ने सुनी नहीं है, या कम से कम यहां के संदर्भ में ऐसी कोई बात कही नहीं है, लेकिन समाजशास्त्रियों से मदद लेकर, मनोवैज्ञानिकों को साथ रखकर सरकार को सामाजिक-मनोविज्ञान का ख्याल रखने का जिम्मा निभाना चाहिए। 
समाज का जो हिस्सा दूसरों की मदद करने की ताकत रखता है, जिसके पास साधन और सुविधा हैं, जिसके पास अपनी जरूरत से अधिक पैसा है, जिसकी तकलीफें कम हैं, ऐसे लोग अपने निजी ऐशोआराम से परे और किसी बात के बारे में शायद ही सोच पाते हैं। अब जब देश की राजनीतिक ताकतें गैरमुद्दों पर लोगों को भड़काने में लगी हुई हैं, तब संपन्न लेकिन आम लोगों से किसी कुर्बानी या किसी बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी की उम्मीद करना कुछ मुश्किल होता है। लेकिन आज छत्तीसगढ़ की सामाजिक जरूरत यही है कि लोग अपने सरोकार समझें, और दबे-कुचले तबकों का तरह-तरह से साथ देने की कोशिश करें। हमारी बात कुछ अमूर्त जरूर है, यह सरकार के आंकड़ों वाली योजनाओं में ठीक से फिट बैठते नहीं दिखेगी, लेकिन समाज के बीच सकारात्मक मानसिकता को बढ़ाए बिना, मुसीबत और खतरे झेलते तबकों का हौसला बढ़ाए बिना, हम एक असंतुलित सामाजिक विकास ही कर सकते हैं, और इससे देश-प्रदेश बहुत आगे नहीं बढ़ सकते। इस मुद्दे की शुरुआत समाज के कुछ जागरूक लोग कमजोर और कुचले हुए तबकों के मुद्दों पर चर्चा से शुरू कर सकते हैं, फिर यह चर्चा चाय पर हो, या बिना चाय के।

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