मंदिर से लेकर दरगाह तक दुत्कारी जा रही हैं महिलाएं

संपादकीय
30 नवंबर 2015

अभी दक्षिण भारत का एक मंदिर खबरों में बना ही हुआ था कि वहां पर महिलाओं को माहवारी के दौरान घुसने से किस तरह रोका जा रहा है, कि इसी दौरान कल महाराष्ट्र के एक प्रमुख मंदिर शनि शिंगणापुर की खबर आई कि वहां परंपरा के खिलाफ जाकर एक महिला ने शनि प्रतिमा पर तेल चढ़ा दिया, और वहां से निकल गई। इसके बाद मंदिर के सेवादारों को निलंबित कर दिया गया है, और मूर्ति के शुद्धिकरण में भक्तजन और पुजारी जुट गए हैं। यह बात सिर्फ इन्हीं गिने-चुने मंदिरों की नहीं है, देश में जगह-जगह कई मंदिरों में ऐसा हाल है, और नए बने हुए ताजा मंदिरों में स्वामिनारायण सम्प्रदाय के मंदिर या आश्रम का हाल है जहां स्वामी के सामने महिलाओं को जाने की इजाजत भी नहीं है, और उन्हें इस तरह दूर रखा जाता है कि वहां के स्वामी की नजर भी महिलाओं पर न पड़े। लेकिन यह मामला सिर्फ हिन्दू धर्मस्थलों का हो ऐसा भी नहीं है। अभी मुंबई हाईकोर्ट में यह केस चल ही रहा है कि वहां की प्रमुख और एक विख्यात हाजी अली दरगाह पर महिलाओं को जाने नहीं मिलता। दरगाह ट्रस्ट ने हाईकोर्ट में यह तर्क दिया है कि इस्लाम में महिलाओं का कब्र के करीब जाना गुनाह माना गया है, और उन्हें दूर से ही कब्र देखने की इजाजत है। 
हम हिन्दू या मुस्लिम धर्म की बात किए बिना मोटे तौर पर धर्मों के नजरिए की बात करते हैं जो कि महिलाओं को, नीची करार दी गई जातियों, गरीबों, या कमजोर लोगों के खिलाफ रहता है। धर्म ताकतवर को सलाम करता है, और कमजोरों को दुत्कारता है। धर्म को इसी हिसाब से, और इसीलिए ही बनाया गया था, और वह आज हजारों बरस बाद भी इस मकसद को एक वफादार औजार या हथियार की तरह पूरा कर रहा है। लेकिन दिक्कत यह है कि हिन्दू समाज में जिन दलितों को दुत्कारा जाता है, जिनके मंदिर घुसने पर उन्हें मार दिया जाता है, जिन्हें गैरदलित-ऊंची कही जाने वाली जातियों के लोग छूते भी नहीं हैं, उन्हीं के हिन्दू धर्म में शामिल बने रहने के लिए बहुत से दलित मरे पड़े रहते हैं। होना तो यह चाहिए कि दलित ऐसे धर्म का धिक्कार करें, जो कि उनको लात मारता है। लेकिन सैकड़ों पीढिय़ों से धर्म की जो दहशत चली आ रही है, उससे न दलित आजाद हो पाते, न ही महिलाएं आजाद हो पातीं। हिन्दू धर्म में तो अधिकांश धार्मिक कर्मकांड का बोझ महिलाओं पर ही रहता है, और बहुत से त्यौहारों पर वे कई गुना अधिक काम करती हैं, और पति के लिए भूखे रहकर उपवास भी करती हैं। हिन्दू धर्म का कोई रीति-रिवाज यह समानता नहीं बताता कि कभी आदमी भी अपनी औरत के लिए उपवास करे।
आज समाज में उन तमाम तबकों में एक जागरूकता की जरूरत है जो कि धर्म के मारे हुए जख्मी हैं। मुस्लिम समाज में धर्म का नाम लेकर महिलाओं के साथ जो गैरबराबरी होती है, उससे भी मुस्लिम महिलाओं को बाहर निकलने की जरूरत है। इस देश में सुप्रीम कोर्ट ने एक समय शाहबानो को उसका हक दिलाने का फैसला दिया था, और राजीव गांधी की ताकतवर सरकार ने अपने संसदीय बाहुबल का बेजा इस्तेमाल करके कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। आज एक बार फिर अदालत से लेकर मुस्लिम समाज तक यह चर्चा उठ रही है कि मुस्लिम आदमी को एक से अधिक शादी की छूट, और अपनी बीवी को तीन शब्दों के तलाक से छोड़ देने की छूट का क्या किया जाए? अभी देश की कुछ अदालतों ने ये सवाल उठाए हैं कि केन्द्र सरकार को इस बारे में इसलिए सोचना चाहिए कि मुस्लिम महिला भी इस देश की नागरिक है और उसके बुनियादी अधिकारों को मुस्लिम विवाह कानून कुचलता है। 
भारत में आज माहौल गर्म है। ऐसे में हर तबके के भीतर के लोगों को ही अपने सामाजिक सुधार के लिए आगे आना पड़ेगा, और आवाज उठानी पड़ेगी। आज समाज के किसी दूसरे तबके के लोग अगर समाज सुधार सिखाना चाहेंगे, तो उसका भारी विरोध होने लगेगा, और विपरीत प्रतिक्रिया होगी। राजा राममोहन राय ही सतीप्रथा के खिलाफ सामाजिक आंदोलन चला पाए थे, कोई मुस्लिम वह काम नहीं कर सकता था। इसी तरह मुस्लिम समाज में जो सुधार जरूरी हैं, जो लोकतांत्रिक बराबरी जरूरी है, उसके लिए मुस्लिमों के बीच से ही आवाज उठनी जरूरी है। मंदिर हो या दरगाह, वहां पर बराबरी के लिए बात होनी चाहिए, और जो धर्म के ठेकेदार हैं, उनको भी बदलते हुए वक्त की हवा देखकर एक उदारता सीखनी चाहिए। हमारा तो यह मानना है कि महिलाएं हों या दलित, जिसको भी दुत्कारा जाता है, उनको धर्म से परे देखना और सोचना चाहिए, जब धर्म अपनी आबादी खोने लगेंगे, तो ही अपने आपको सुधारेंगे। 

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