झूठ को फैलाना भी आसान और झूठ को परख लेना भी

संपादकीय
1 दिसंबर 2015

लोकसभा में कल वामपंथी सांसद मोहम्मद सलीम ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर कहा था कि 8 सौ बरस बाद भारत को एक हिन्दू राजा मिला है। राजनाथ सिंह ने इसे अपने संसदीय जीवन का सबसे तकलीफदेह दिन बतलाया, और कहा कि अगर उन्होंने ऐसा बयान दिया होता, तो वे एक पल भी भारत के गृहमंत्री रहने के लायक नहीं रहते। दरअसल मोहम्मद सलीम ने आउटलुक पत्रिका के ताजा अंक में छपी एक रिपोर्ट में राजनाथ सिंह के नाम से लिखे गए इस बयान को देखकर संसद में मुद्दा उठाया था, और यह बयान दरअसल विश्व हिन्दू परिषद के गुजर चुके अध्यक्ष अशोक सिंघल ने दिया था, राजनाथ सिंह ने नहीं। पत्रिका ने इस बात के लिए गृहमंत्री से माफी मांगी है, लेकिन वामपंथी सांसद ने इस पर माफी मांगने से इंकार कर दिया है, उनका कहना है कि उनकी बात सदन की कार्रवाई में शामिल ही नहीं की गई थी, इसलिए उनके लिए माफी मांगना जरूरी नहीं है। 
वैसे तो पत्रिका के माफीनामे के बाद यह बात आई-गई हो जाती है, लेकिन हम इस मुद्दे पर चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि आज लोगों के नाम से सौ तरह की बातें प्रचार पाती हैं, जिनमें से कुछ बातें उनकी कही हुई होती हैं, और कई बातें उनकी कही हुई नहीं होतीं। आज के डिजिटल युग में यह आसान है कि किसी भी बात के सच या झूठ होने के लिए इंटरनेट पर उसे तलाश लिया जाए, और अधिकतर बातों की परख भी हो जाती है, लेकिन संसद में किसी मुद्दे को उठाने के पहले लोगों को इतनी मामूली छानबीन इसलिए कर लेनी चाहिए कि झूठ होने पर न सिर्फ किसी और की साख चौपट होती है, बल्कि अपनी खुद की साख भी खराब होती है। और संसद का महंगा वक्त भी जाया होता है। यह एक अलग बात है कि जब राजनाथ सिंह के समविचारक अशोक सिंघल ने ऐसी बात कही थी, तो राजनाथ सिंह ने शायद उसका कोई विरोध भी नहीं किया था, लेकिन उतने भर से उनकी न कही बात उनके नाम से जोडऩा पूरी तरह नाजायज है। 
आज लोग धड़ल्ले से झूठी तस्वीरें, झूठी जानकारी, झूठे बयान गढ़कर, डिजाइन करके, इंटरनेट और फोन पर चारों तरफ फैलाने में लगे रहते हैं। लोगों को कोई भी जानकारी आगे बढ़ाने के पहले उसकी सच्चाई को खुद भी परख लेना चाहिए, क्योंकि झूठ जब पकड़ाता है, तो उसे फैलाने वाले तमाम लोगों की साख भी चौपट होती है। यह बात हम संसद से परे भी इसी जगह कई बार लिख चुके हैं कि टेक्नालॉजी जितनी सहज और आसान हो गई है, बातों को फैलाना जितना सरल हो गया है, उनको परखने की जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी हो गई है। आज जो लोग किसी विचारधारा के बड़े समर्थक हैं, या बड़े विरोधी हैं, वे सच और झूठ की परवाह किए बिना अपनी पसंद की जानकारी को फैलाते चलते हैं। इन लोगों को यह भी समझना चाहिए कि झूठ के सहारे कोई लंबी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती, और जब कतरा-कतरा झूठ भी पकड़ में आ जाता है, तो उससे अच्छे-भले मुद्दे भी चौपट हो जाते हैं। बहुत पहले कुछ महान लोगों ने यह बात कही थी कि मकसद ही नहीं, राह भी सही होनी चाहिए। इस बात को आज के सोशल मीडिया के जमाने में खास याद रखने की जरूरत है कि जो लोग किसी मकसद से झूठ पोस्ट करते हैं, वे सबसे पहले तो अपने मकसद को ही हरा देते हैं। जिस किसी मकसद के साथ झूठे लोग जुड़ जाते हैं, लापरवाह जुड़ जाते हैं, उस मकसद को विरोधियों या दुश्मनों की जरूरत ही नहीं रहती, ऐसे झूठे साथी ही काफी रहते हैं। 
आज इंटरनेट पर मामूली तलाश से ही किसी बात की सच्चाई की परख हो सकती है। लोगों को, खासकर जिम्मेदार लोगों को ऐसी जिम्मेदार सोच को बढ़ावा देना चाहिए, और अपने इर्द-गिर्द के लोगों को यह समझाना भी चाहिए कि वे किस लापरवाही से किस झूठ को फैला रहे हैं, और एक दिन ऐसा भी हो सकता है कि वे खुद, उनका परिवार ऐसे किसी झूठे प्रचार का शिकार हो जाएं। 

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