कोलाहल की गुंडागर्दी बंद करवानी चाहिए

संपादकीय
10 दिसंबर 2015

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के भोपाल दफ्तर में जिस तरह से मध्यप्रदेश में शादी-ब्याह और सड़कों पर बजने वाले डीजे पर कड़ाई से रोक लगाई, उसे देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार को जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और न सिर्फ इस ट्रिब्यूनल, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के भी कई आदेशों को मानने की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए। आज छत्तीसगढ़ के गांव-शहरों का हाल यह है कि यहां कोई कानून मानो बच ही नहीं गया है, और जिसकी जितनी ताकत हो, वे उतना शोर कर सकते हैं, कर रहे हैं। राजधानी रायपुर का हाल यह है कि यहां पर कानून शायद डीजे और लाउडस्पीकर चलाने वाले लोग तय कर रहे हैं, और सरकार ने सिर्फ मुख्यमंत्री निवास, राजभवन, ऐसी चुनिंदा कुछ जगहों पर जिला दंडाधिकारी के आदेश से लाउडस्पीकर पर रोक लगा दी है, और बाकी प्रदेश को मरने के लिए छोड़ दिया है। हो सकता है कि बिलासपुर में जिस इलाके में हाईकोर्ट के जज रहते हैं, या हाईकोर्ट के आसपास भी ऐसा आदेश लागू किया गया हो, और चुनिंदा लोगों को सुख से जीने की सहूलियत देकर सरकार मस्त है। 
लोगों को सुख-चैन से अपने घर पर जीने, बीमार को अस्पताल में इलाज करवाने, दुकान-दफ्तर के लोगों को काम करने, और सड़क से गुजरते लोगों को तकलीफ पाए बिना रास्ता पार करने का जो बुनियादी हक है, उसकी फिक्र छत्तीसगढ़ में किसी अफसर को नहीं है। यहां पर लोग घंटों तक सड़कों पर ट्रैफिक जाम करते हुए नाचते-गाते हैं, और साथ में बड़ी-बड़ी गाडिय़ों पर दर्जनों लाउडस्पीकर चलते हैं, जो कि पूरे इलाके का जीना हराम कर देते हैं। ऐसे शोर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के बड़े कड़े कई आदेश बरसों से लागू हैं, लेकिन जहां भीड़ की गुंडागर्दी शादियों से लेकर धार्मिक और सामाजिक जुलूसों तक हावी रहती है, वहां पर आम लोगों का यह हौसला नहीं रह जाता कि बेपरवाह अफसरों तक जाकर कानून की याद दिलाएं। हमारा ख्याल है कि कुछ सक्रिय और जागरूक लोगों को ऐसे शोरगुल की वीडियो रिकॉर्डिंग करके सुप्रीम कोर्ट को भेजना भी चाहिए कि उसके हुक्म की कैसी धज्जी उड़ रही है, आम जनता के कानों की धज्जी तो उड़ ही रही है। 
यह एक बड़ी भयानक नौबत है कि भोपाल में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को यह कहने को मजबूर होना पड़ रहा है कि लोग चाहें तो जाकर इतना शोरगुल राज्य के मुख्य सचिव के बंगले पर पूरी रात करें, और ट्रिब्यूनल इसकी इजाजत देगा। यह बात जाहिर करती है कि देश की संवैधानिक संस्थाएं सरकारों के कामकाज से, उनकी लापरवाही से किस कदर निराश हैं, और छत्तीसगढ़ का हाल इस मामले में मध्यप्रदेश से जरा भी बेहतर नहीं है। हमारा ख्याल है कि इस तरह के मामले में जितने कानूनी आदेश न्यायिक संस्थाओं से जारी होते हैं, वे बाकी प्रदेशों पर भी मोटे तौर पर लागू होते हैं, और छत्तीसगढ़ को तुरंत इससे सबक लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश दोनों नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की भोपाल शाखा के तहत आते हैं, और इस मामले में दोनों प्रदेशों पर यह आदेश बराबरी से लागू होता है।
यह बात हैरान करने वाली है कि बड़े-बड़े अफसर जो अपने लिए बड़ी-बड़ी सहूलियतें जुटा लेते हैं, वे सड़कों पर रात-दिन चलने वाली ऐसी गुंडागर्दी पर हाथ भी धरने से कतराते हैं। जो काम करना सरकार की खुद की जिम्मेदारी है, उसके बारे में यह सफाई दी जाती है कि कोई शिकायत आती है तो सरकार कार्रवाई करती है। हमारा अनुभव यह है कि कोई शिकायत आती है, तो अफसर सबसे पहले गुंडों को यह बताते हैं कि शिकायत किसने की है, और किसकी शिकायत पर उनको मजबूर होकर आना पड़ रहा है। इसी राजधानी रायपुर में एक वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर ने एक मंदिर के रात-दिन के शोरगुल के चलते अदालत तक जाकर उसके खिलाफ आदेश हासिल किया, और वहां के लाउडस्पीकर बंद करवाए। लेकिन इससे कोई सबक लेने के बजाय अफसरों ने बाकी जगहों पर कोई कार्रवाई नहीं की, अब ऐसे कितने लोग हो सकते हैं जो संगठित समुदायों के खिलाफ, भीड़ के खिलाफ, धार्मिक उन्माद के खिलाफ, अराजक बारात के खिलाफ अदालत तक जाएं? 
राज्य सरकार को हमारी सलाह है कि इसके पहले कि कोई कानूनी कार्रवाई उसके खिलाफ हो, अपने नागरिकों के प्रति उसे अपनी न्यूनतम जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और कोलाहल की गुंडागर्दी बंद करवानी चाहिए। 

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