सलमान के बरी होने से देश में उठे कई सवाल

संपादकीय
11 दिसंबर 2015

फिल्म अभिनेता सलमान खान को निचली अदालत से पांच बरस की कैद के बाद बाम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें पूरी तरह से बरी कर दिया है। इसके साथ ही देश भर के मीडिया और सोशल मीडिया पर एक बहस ने जोर पकड़ लिया है, कि क्या ताकतवर को इस देश में कभी कोई सजा हो सकती है? सलमान का मामला तेरह बरस पहले मुंबई की सड़क पर नशे में गाड़ी फुटपाथ पर चढ़ाकर लोगों को कुचल मारने का था। इसके गवाह भी थे, और सुबूत भी थे। इनके आधार पर निचली अदालत ने कैद सुनाई थी, और कुछ महीनों के भीतर ही हाईकोर्ट ने फैसले को पलटते हुए सुबूतों और गवाहों को, पुलिस की कार्रवाई को नाकाफी ठहराते हुए सलमान को बरी कर दिया। देश के बड़े-बड़े वकील कल शाम से ही टीवी पर यह बहस करते दिख रहे थे कि जिस बाम्बे हाईकोर्ट में हजारों केस बरसों से लगे हुए हैं, और निचली अदालतों से सजा पाने वाले लोगों को जमानत भी नहीं मिली है, और वे जेलों में ही कैद हैं, फिर भी उनके मामलों की सुनवाई की बारी हाईकोर्ट में नहीं आ रही, और सलमान के मामले में अदालत को आनन-फानन सुनवाई और फैसले का वक्त क्यों और कैसे मिला? लेकिन यह अकेला मामला नहीं है, पिछले कुछ बरस से एक दूसरे फिल्म अभिनेता संजय दत्त का मामला ऐसा ही चले आ रहा है जब उनकी सुनवाई के लिए अदालतें मानो इंतजार करते बैठी थीं, और सजा मिलने के बाद भी बार-बार पैरोल पर संजय दत्त को घर जाकर रहने मिला। 
अभी हम अदालतों की नीयत पर कोई शक नहीं कर रहे, लेकिन लोगों का शक भारत की न्याय व्यवस्था पर इस आधार पर गहराते चल रहा है कि यहां बड़े-बड़े वकील लगाकर इंसाफ को उनसे पिटवाया जा सकता है। पैसों की बड़ी-बड़ी ताकत से जांच पर असर डाला जा सकता है, गवाह खरीदे जा सकते हैं, लोगों की याददाश्त खत्म की जा सकती है, सुबूत मिटाए जा सकते हैं, और बहुत से मामलों में सरकारी वकील या जज भी खरीदे जा सकते हैं। जब लोग ऐसी बातें बार-बार देखते हैं तो लोगों का भरोसा न सिर्फ न्यायपालिका से उठता है बल्कि भारतीय लोकतंत्र से भी उठ जाता है। फिर लोगों को लगता है कि इंसाफ दिलाने के लिए बंदूकें जरूरी हैं। 
कहने के लिए भारत में कुछ ऐसे गिने-चुने मामले लोग गिनाते हैं जिनमें अरबपति भी जेल गए हुए हैं, लेकिन ऐसे नमूने किसी भी मामले में पक्ष और विपक्ष दोनों में गिनाए जा सकते हैं। अधिकतर मामले तो ऐसे हैं जिनमें ताकतवर को कोई सजा नहीं हो सकती। सलमान के मामले में ही एक बात गौर करने लायक है, कि जिस अदालत में उनको सजा होने का खतरा था, वैसी निचली अदालत में उनका मामला बारह बरस चलते रहा। और जब सजा हो गई, तो कुछ महीनों के भीतर हाईकोर्ट से उनका फैसला आ गया जिसमें कि वे बरी हो गए। यह सिलसिला अदालतें तकनीकी आधार पर सही ठहरा सकती हैं कि वे तो उनके सामने पेश किए गए सुबूतों और गवाहों के आधार पर ही फैसला देती हैं, लेकिन जज अकेला ही न्यायपालिका नहीं होता, जांच एजेंसी से लेकर गवाह और सुबूत, दोनों तरफ के वकील, और जज ये सब मिलकर न्याय की प्रक्रिया रहते हैं, और इन सबमें गरीबों के लिए कोई सुनवाई नहीं है। 
इस फैसले से हो सकता है एक बेकसूर सलमान छूट गए हों, या एक कुसूरवार सलमान सजा से बच गए हों, लेकिन एक व्यक्ति यहां पर मुद्दा नहीं है, देश की जनता में न्यायपालिका को लेकर ऐसा भयानक अविश्वास बैठा हुआ है कि वह जांच एजेंसी से लेकर गवाह और जज तक के बीच में कोई फर्क नहीं कर पाती। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। और हमारा यह भी मानना है कि ऐसे तमाम मामलों में जिनमें बहुत पैसे वाले लोग किसी तरह से भी जिम्मेदार होते हैं, और गरीब हादसों या जुर्म के शिकार होते हैं, उनमें एक कानून बनाकर एक लंबी-चौड़ी भरपाई जरूरी करनी चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक देश के गरीबों के मन में लोकतंत्र के लिए कोई भरोसा नहीं रहेगा, और ताकतवर तबके के लिए जनता के मन में हिकारत भरी रहेगी। हमारा यह भी मानना है कि ऐसे तमाम मामलों में जिनमें ताकतवर लोग शामिल हैं, चाहे वे सलमान खान हों, चाहे गुजरात की मंत्री माया कोडवानी हों, या कि कोई और, हर ताकतवर की रिहाई के बाद ऊपर की अदालत में सरकार को अनिवार्य रूप से जाना चाहिए, इसके बिना लोगों के मन में सरकार के लिए भी नफरत पैदा होती है। सलमान के ही मामले में उनके खिलाफ गवाही देने वाले उनके साथ तैनात एक पुलिस सिपाही की जैसी बुरी मौत हुई है, उसे देखकर भी लोगों के मन में एक सामाजिक नफरत भरी हुई है। अदालत के पास हर बुराई का कोई इलाज नहीं होता, लेकिन लोकतंत्र के पास तो हर बुराई का इलाज होना ही चाहिए, वरना वह लोकतंत्र खारिज कर दिए जाने लायक है। 

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