रमन सरकार के बारह बरस जलसा फिर कभी होगा, आत्ममंथन तो आज ही हो

विशेष संपादकीय
12 दिसंबर 2015
सुनील कुमार

छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह सरकार के बारह बरस पूरे होने के मौके पर दो बातों को साथ-साथ करने की जरूरत है। एक तो एक ही पार्टी की सरकार और एक ही मुख्यमंत्री के चलते हुए राज्य के इतने विकास को लेकर, और दर्जन भर दूसरी अच्छी बातों को लेकर एक समारोह की जरूरत, लेकिन इसके  साथ-साथ इतना ही महत्वपूर्ण है इस सरकार का आत्ममंथन, जो कि शायद समारोह जितना मीठा न हो पाए। लेकिन जैसा कि सरकार ने एक सही फैसला लिया है कि सूखे चलते राज्य के किसान बदहाली में हैं, और लगातार आत्महत्याओं जैसी नौबत बनी हुई है, और उसे देखते हुए कोई जश्न-जलसा न किया जाए। लेकिन हम जिस आत्ममंथन की बात सुझाना चाहते हैं, वह तो वैसे भी बंद कमरे में होनी है, और सरकार को चाहिए कि अपने अलग-अलग स्तर पर, अलग-अलग समूहों में बैठकर यह सोचे कि इन बरसों में क्या-क्या गलत हुआ जो कि नहीं होना चाहिए था, और क्या-क्या ऐसा सही होना चाहिए था, जो कि किन्हीं वजहों से नहीं हो पाया। 
रमन सिंह सरकार के बारह बरस अगर बहुत गंभीरता से देखें, तो इसके तीन पहलू एक-दूसरे से जमकर मुकाबला करते दिखते हैं, और यह समझ नहीं पड़ता है कि इनमें से कौन सा पहलू किस पर भारी पड़ रहा है। एक पहलू है इन बरसों में राज्य जहां से जहां तक पहुंच पाया है, उसने राज्य के ढांचे का जितना विकास किया है, आर्थिक मोर्चे पर जो कामयाबी पाई है, और सामाजिक जनकल्याण के जो नए पैमाने खड़े किए हैं, वह पहलू वाहवाही के लायक है। दूसरा पहलू यह है कि इन बारह बरसों में ऐसी कौन-कौन सी गलतियां और गलत काम हुए हैं, जो कि रोके जाने लायक थे, और सरकार जिन पर काबू नहीं कर पाई। तीसरा पहलू यह है कि राज्य के विकास की ऐसी कौन सी संभावनाएं हैं जिन पर बारह बरस का लंबा वक्त मिलने के बाद भी इस सरकार ने काम नहीं किया। यह बात कुछ कड़वी जरूर है, लेकिन अभी तीन बरस का वक्त इस सरकार के पास बचा है, और इसका इस्तेमाल इन अनछुई संभावनाओं  पर काम करने में भी लगाना चाहिए। 
छत्तीसगढ़ को कुछ राज्यों के साथ तुलना करके ही देखा जा सकता है, आदर्श के किसी पैमाने पर भारतीय लोकतंत्र के किसी एक राज्य को अलग से आंकना एक बेमानी बात होगी। पन्द्रह बरस पहले जो तीन नए राज्य बने, उनमें अगर तुलना करें, तो छत्तीसगढ़ के मुकाबले बाकी दोनों राज्य कहीं नहीं टिकते। जिस अविभाजित मध्यप्रदेश से अलग होकर यह राज्य बना है, उससे भी अगर तुलना करें, तो नया राज्य होने के बावजूद छत्तीसगढ़ ने बहुत अच्छा काम किया है, और एक ऐसी कामयाबी पाई है जो कि मध्यप्रदेश का हिस्सा रहते हुए इस इलाके को कभी नहीं मिल सकती थी। फिर देश के इस आकार के, ऐसी भौगोलिक स्थिति वाले राज्यों के साथ तुलना करें, तो भी छत्तीसगढ़ खासा कामयाब रहा है। यह एक अलग बात है कि पिछले कुछ बरसों की आर्थिक मंदी के चलते हुए जिस तरह पूरा देश औद्योगिक हाहाकार देख रहा है, कुछ वैसा ही छत्तीसगढ़ में भी हो रहा है। लेकिन इस राज्य ने न सिर्फ अपने-आपको चौबीसों घंटे रौशन किया, बल्कि बाकी देश का अंधकार मिटाने के लिए भी बिजली भेजी है, और ऐसी बिजली की वजह से लाखों-करोड़ों रोजगार बढ़ते हैं।
अब हम उस दूसरे पहलू पर आएं जो कि गलत कामों और गलतियों का है। तो इन बारह बरसों में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पार्टी के भीतर से, या पार्टी के बाहर से कोई चुनौती न रहने पर भी, सरकार की बड़ी-बड़ी खामियों को बहुत हद तक बर्दाश्त करने का जो काम किया है, उससे उनको बचना चाहिए था। और राज्य सरकार के, और भाजपा के मुखिया के रूप में जब बारह बरस की कामयाबी वाला हिस्सा उनके नाम लिखा जा रहा है, तो सरकार की खामियां भी किसी और के नाम नहीं लिखी जा सकतीं। अपनी सरकार के मंत्रियों, अफसरों और नीचे के कर्मचारियों के भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए उनको जो करना था, वे नहीं कर पाए, या अपने मिजाज के मुताबिक उन्होंने कड़ाई से ऐसा कुछ नहीं किया। नतीजा यह निकला कि सरकार का बड़ा हिस्सा लोगों को भ्रष्टाचार में फंसा दिखता है, और शायद अगले तीन बरस में इसे तेजी से कम करना मुमकिन भी नहीं होगा। हमारा मानना है कि सरकार को अपने आत्ममंथन का सबसे बड़ा हिस्सा इसी पर खर्च करना चाहिए कि सरकार के अपने भीतर का इतना व्यापक और गंभीर भ्रष्टाचार कैसे काबू में किया जाए। लेकिन यहां पर हम फिर देश के दूसरे राज्यों से तुलना किए बिना अकेले छत्तीसगढ़ को बहुत बड़ा मुजरिम साबित करना नहीं चाहते। देश में वामपंथी पार्टियों की सरकारों को छोड़ दें,  तो देश के बाकी तमाम राज्यों में जिस बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े घोटाले सामने आए हैं, उनके मुकाबले छत्तीसगढ़ शायद कम बुरा ही दिखेगा। यहां भी कुछ चर्चित घोटाले हुए हैं, लेकिन यहां का भ्रष्टाचार सरकार की पूरी मशीनरी में व्यापक स्तर पर बिखरा हुआ अधिक है, किसी गठान वाले कैंसर की तरह एक जगह पर इक_ा कम हैं। लेकिन हम इसको इन बारह बरसों की सबसे बड़ी नाकामयाबी मानते हैं। अपनी सरकार के ग्यारहवें बरस में उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का नारा दिया है, और उनको इस पर कुछ हद तक तो खरा उतरने की कोशिश करनी चाहिए। प्रदेश में चिकित्सा और स्कूल शिक्षा, आदिवासियों और दलितों की योजनाओं की जो बदहाली है, और सिर्फ भ्रष्टाचार की वजह से है, वह उनसे अनदेखी तो है नहीं। आत्ममंथन का एक मुद्दा यह भी होना चाहिए कि जिस तरह हजारों करोड़ की लागत से एक नया रायपुर बनाया गया, और जिस तरह सैकड़ों करोड़ साल के खर्च से उसे चलाया जा रहा है, क्या यह विकराल ताजमहलीय आकार भूखे गरीब लोगों के राज्य के काम और फायदे का है?
अब एक पहलू जो रह जाता है, वह है अनछुई संभावनाओं का। आज भी छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था मोटेतौर पर प्रकृति की दी हुई खदानों, और जंगलों पर टिकी हुई है। यहां की खेती की अर्थव्यवस्था भी बड़ी है, लेकिन खेती से राज्य की कमाई शायद कम है, और खेती या उपज पर सरकार की तरह-तरह की सब्सिडी उस कमाई से अधिक है। इसी तरह जंगलों से होने वाली कमाई, और उन इलाकों पर होने वाले खर्च के अनुपात को देखें, तो वहां से भी सरकार को कमाई नहीं पाती। कुल मिलाकर यह राज्य खनिजों पर टिका और जिंदा है। कोयले से बिजली, लाईम स्टोन से सीमेंट, और लौह अयस्क से लोहा, इतना बनाने से ही सरकार की कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा जुटता है। लेकिन इन तीनों ही मामलों में सरकार प्राइमरी प्रोडक्ट बनाने के बाद उसमें कोई वेल्यू एडीशन नहीं कर पाई है। मोटे तौर पर यह राज्य कुदरत की दी हुई रोटी खा रहा है। यह एक ऐसी संभावना थी, जिस पर अधिक काम किया जाना था, और हो सकता है कि सरकार अपने बाकी वक्त में कुछ कर भी सके। लेकिन अगर तीसरे कार्यकाल के खत्म होने पर भी ऐसा कुछ नहीं होता, तो वह संभावनाओं का अंत कहलाएगा। उद्योगों से परे छत्तीसगढ़ के कामगारों के हुनर, उनकी पढ़ाई, उनके प्रशिक्षण में जो वेल्यू एडीशन होना चाहिए था, और उनको जिस तरह प्रदेश के बाहर एक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुकाबले के लिए तैयार करना था, उसमें भी यह राज्य अपने डेढ़ दशक में अधिक कुछ नहीं कर पाया। उच्च शिक्षा के कुछ बड़े केन्द्र छत्तीसगढ़ में शुरू जरूर हुए हैं जिनसे कि देश-विदेश में जाने-पहचाने नाम यहां के नक्शे में जुड़े हैं, लेकिन राज्य के दसियों लाख नौजवान ऐसे हैं जो कि बहुत औसत पढ़ाई पाकर औसत दर्जे के बेरोजगार से अधिक कुछ नहीं बन पा रहे। हमारा यह मानना है कि इन बारह बरसों में राज्य सरकार में कल्पनाशीलता और योजना में एक कमी रही है जिससे कि शिक्षकों और नर्सों जैसे आम काम के लिए भी राज्य के बाहर के लोगों को लाना पड़ रहा है। यह अंदाज लगाना सरकार की एक आम जिम्मेदारी थी कि किस हुनर के कितने लोगों की जरूरत होगी, और यह जाहिर है कि जब राज्य में ही ऐसी काबिलीयत के लोग नहीं मिल रहे, तो यहां से ऐसी काबिलीयत पाकर दूसरे राज्यों में उनके जाने का तो सवाल ही नहीं उठता। राज्य की मानव-संसाधन संभावनाओं पर सरकार को इससे कई गुना अधिक मेहनत करनी थी, लेकिन चूंकि इससे राज्य की कमाई के आंकड़े तुरंत नहीं बदलते, इसलिए शायद इस तरफ ध्यान नहीं दिया गया। आज दुनिया में कोई भी देश अपने लोगों की कामकाज की संभावनाओं को पूरी तरह बढ़ाए बिना किसी मुकाबले में नहीं टिक सकता। छत्तीसगढ़ को अब भी यह बात समझनी चाहिए। 
अब इन तीन पहलुओं के अलावा इस राज्य की चर्चा जिस बात के लिए जरूरी है वह है राज्य का सामाजिक सद्भाव। बारह बरस से भाजपा का बिना गठबंधन वाला मजबूत राज चलने के बाद भी यह राज्य उन तमाम धार्मिक उन्मादों, और साम्प्रदायिक भड़कावे से परे रहने में कामयाब रहा है, जिसे देश भर में भाजपा के कई नेता, और उनके कई सहयोगी संगठन लगातार बढ़ा रहे हैं। हम इस बात को कम महत्वपूर्ण नहीं मानते कि पिछले तीन विधानसभा चुनाव, तीन लोकसभा चुनाव, और तस्थानीय संस्थाओं के तीन चुनाव में जीत पाते हुए भी मुख्यमंत्री रमन सिंह ने एक भी भड़काऊ या उन्मादी मुद्दे को छुआ भी नहीं, और राज्य में मोटे तौर पर साम्प्रदायिक सद्भाव बनाकर रखा है। यही वजह है कि देश भर में भाजपा के जितने भी राष्ट्रीय या प्रादेशिक नेता हैं, उनमें शायद डॉ. रमन सिंह सबसे अधिक सौम्य चेहरा दिखते हैं, और एक समय जिस तरह अटल बिहारी वाजपेयी एक आक्रामक पार्टी के उदार मुखौटे माने जाते थे, आज रमन सिंह को भाजपा के भीतर एक उदार चेहरा पाया जा रहा है। उनकी अगुवाई में प्रदेश में समाज के सबसे कमजोर तबके को जिंदा रहने और जीने में मदद की जो योजनाएं शुरू हुई हैं, वे तमाम भ्रष्टाचार के बाद भी लोगों को भुखमरी से बाहर निकाल पाई हैं, जननी और शिशु मृत्यु घटा पाई हैं। सरकार के एक मुखिया के रूप में वे देश भर के मुख्यमंत्रियों में सबसे निर्विवाद भी हैं। लेकिन हम सालगिरह को जलसे के बजाय, तारीफ के बजाय, आत्ममंथन की तरफ मोडऩा अधिक जरूरी समझते हैं, उसी से राज्य का भला होगा, और राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी, उसके नेताओं के भले के लिए भी यह जरूरी है। 

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