जनसंघ-भाजपा की सारी नीति खारिज, मोदी जम्मू-कश्मीर पर भी पाक से बात करेंगे

संपादकीय
14 दिसंबर 2015
पिछले एक पखवाड़े में भारत और पाकिस्तान के बीच भारतीय पहल से जिस रफ्तार से विदेश मंत्रियों की बातचीत हुई, वह इन दो देशों के बीच रिश्तों को देखते आ रहे लोगों को हक्का-बक्का कर गई है। जिस तरह एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच 120 सेकेंड की बातचीत हुई, और उसके बाद जिस तरह एक तीसरे देश में दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने बंद और गोपनीय बैठक की, वह सब कुछ बहुत चौंकाने वाला रहा। इसके बाद आनन-फानन भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जिस तरह पाकिस्तान पहुंचीं, वहां विदेश मंत्री से बात की, प्रधानमंत्री से मुलाकात की, वह भी एक अस्वाभाविक रफ्तार से हुआ काम था। लेकिन आज भारतीय संसद में सुषमा स्वराज ने जो बयान दिया है, उस बयान को बारीकी से देखने की जरूरत है, और उसके कुछ घंटे बाद तक अभी हमें भारतीय विपक्षी दलों की वह प्रतिक्रिया देखने नहीं मिल रही है, जो कि इस बयान के बाद तुरंत सामने आनी चाहिए थी। 
यहां पर यह खुलासा कर देना जरूरी है कि हम इन दोनों देशों के बीच हर हालत में बातचीत जारी रखने के हिमायती हैं, चाहे सरहद पर तनाव चलता रहे, चाहे आतंकी हमले होते रहें, इनके बीच भी बातचीत जारी रहनी चाहिए, खेल और कला, फिल्म और संगीत जारी रहने चाहिए। लेकिन सुषमा स्वराज के आज के बयान में एक बहुत ही चौंकाने वाली बात है, जिसके खिलाफ न होते हुए भी हम उस तरफ लोगों को ध्यान खींचना चाहते हैं। आज उन्होंने अपने पाकिस्तान प्रवास के बारे में संसद में बयान दिया जिसमें उन्होंने बाकी बातों के साथ-साथ यह भी कहा कि 2016 में मोदी सार्क सम्मलेन में पाकिस्तान जाएंगे। भारत और पाकिस्तान शांति, सुरक्षा, जम्मू-कश्मीर सहित सभी मुद्दों पर समग्र वार्ता करेंगे। 
यहां पर गौर करने की बात यह है कि भाजपा की अगुवाई वाली इस सरकार ने पाकिस्तान के साथ जम्मू-कश्मीर पर भी बात करना मंजूर किया है। जहां तक हमें याद पड़ता है, पिछले दस बरस के यूपीए राज में मनमोहन-सरकार ने जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान से कोई बात नहीं की थी। तमाम द्विपक्षीय बातचीत में कश्मीर के के अक्षर को बड़ा ही अवांछित माना जाता रहा है, और पाकिस्तान अपने हर बयान में कश्मीर का जिक्र करते आया है, और भारत में इसे जिक्र से परे का मानते हुए इस पर बरसों से कोई चर्चा नहीं की है, इस पर इसी बातचीत के लिए भारत बरसों से कभी सहमत भी नहीं हुआ है। अब यह भी याद रखने की जरूरत है कि जनसंघ के दिनों से भाजपा कश्मीर को चर्चा से परे का मुद्दा मानती रही है, और उसके औपचारिक नारों में यह भी रहते आया है कि दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे। अब ेऐसे नारे पर चढ़कर सत्ता, और भारत सरकार की मुखिया बनने वाली भाजपा अचानक कश्मीर पर पाकिस्तान से बातचीत की एक ऐसी बात को मानने की घोषणा कर रही है, जिससे कि भाजपा की अब तक की पाकिस्तान नीति कूड़ेदान में चली जाती है। 
कुछ लोगों का यह मानना है कि मोदी इस किस्म की दरियादिली दिखाकर कुछ बरस बाद एक नोबल शांति पुरस्कार पाने की कोशिश में हैं। कुछ लोगों का यह मानना है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते हुए पाकिस्तान के साथ शांति बहाली में जितनी कोशिशें की थीं, मोदी उनसे भी आगे जाना चाहते हैं, और इतिहास में नाम लिखाना चाहते हैं। हम यह भी नहीं मानते कि जनसंघ और भाजपा की जो नीति चली आ रही थी, उसे कभी बदलना अनैतिक होगा। वक्त और दुनिया की जरूरत के हिसाब से लोगों को लचीला रहना भी चाहिए, और अपनी नीतियों के मुकाबले दुनिया के व्यापक भले को अधिक महत्वपूर्ण मानना चाहिए। इसलिए अगर मोदी या उनकी पार्टी पाकिस्तान के साथ एक अभूतपूर्व लचीलापन दिखा रहे हैं, तो हम उसके खिलाफ नहीं हैं और उसके आलोचक नहीं हैं। मोदी चाहे मजबूरी में, जम्मू-कश्मीर में राज्य सरकार में भागीदारी के लिए जनसंघ के वक्त की मांगों को वैसे भी खारिज कर चुके हैं। धारा 370 खत्म करने की बात ही अब खत्म हो गई है। और जिस मुफ्ती की पीडीपी को अलगाववादी, या आतंकियों की हिमायती कहने के मोदी के वीडियो हवा में तैर रहे हैं, उसी मुफ्ती के साथ मोदी की पार्टी की सरकार आज जम्मू-कश्मीर में हैं। लेकिन आखिर में हम इस बात पर अपनी हैरानी जाहिर करना चाहते हैं कि सुषमा स्वराज ने आज संसद में जब यह कहा कि जम्मू-कश्मीर पर भी पाकिस्तान से बात होगी, तो यह बात भारत सरकार के दायरे से भी बाहर की है। पाकिस्तान के साथ कश्मीर पर तो बात हो सकती है, लेकिन जम्मू पर पाकिस्तान से क्या बात होगी? जम्मू पर तो पाकिस्तान का कोई दावा बनता भी नहीं है, जम्मू का हिस्सा विवाद से परे का भी है, और पाकिस्तान जिस जमीन पर कब्जा चाहता है, वह तो कश्मीर वाले हिस्से की जमीन है। ऐसे में भारत के एक राज्य, जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान से भला कैसे और क्यों चर्चा हो सकती है? 
दुनिया के बड़े-बड़े पर्यटन केन्द्रों पर रोलरकास्टर रहते हैं, जो कि उसमें बैठे लोगों को मशीन की रफ्तार से कभी आसमान तक ले जाते हैं, कभी सीधे जमीन की तरफ गिराकर लाते हैं, और उनको देखकर भी बहुत से लोगों को चक्कर आ जाता है। पाकिस्तान के साथ भारत की मोदी-नीति ऐसे ही एक रोलरकास्टर पर सवार दिखती है। हम मोदी को उनके चुनावी भाषणों में से निकालकर मियां नवाज को बिरयानी जैसे नारे सुनाना नहीं चाहते, क्योंकि सरकार में आने के बाद अगर वे कट्टरता छोड़ रहे हैं, तो इसे लेकर उनकी आलोचना नहीं होनी चाहिए, लेकिन पाकिस्तान के साथ रिश्तों की रफ्तार न सिर्फ अभूतपूर्व है, बल्कि कुछ मायनों में खतरनाक भी लगती है। आने वाले दिन ही बताएंगे कि मोदी सरहद पर तनाव कितना घटा सकते हैं, और अगर पाकिस्तान के साथ फौजी खर्च वाला तनाव, आतंकी खतरा भारत घटा सकता है, तो वह मोदी की छोटी कामयाबी नहीं होगी। फिलहाल मोदी सरकार आने का बाद पहली बार सुषमा स्वराज विदेश मंत्री जैसी दिख रही हैं, और यह एक मजेदार बदलाव भी है।

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