केजरीवाल का भ्रष्टाचार-विरोध कहां हवा हो गया?

संपादकीय 
15 दिसंबर 2015
दिल्ली सरकार में मुख्यमंत्री सचिवालय में तैनात एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के खिलाफ कुछ दिन पहले से शिकायत चल रही थी, और भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई ने आज उस अफसर के दफ्तर पर छापा मारा। यह दफ्तर मुख्यालय सचिवालय में है, और अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि इस छापे के बहाने सीबीआई उनके दफ्तर की फाइलों को भी देख रही है। उन्होंने इस कार्रवाई के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कायर और मनोरोगी करार दिया है, और सोशल मीडिया पर केन्द्र सरकार के खिलाफ हमला बोल दिया है। सोशल मीडिया अपने आम मिजाज के तहत मोदी के पक्ष या विपक्ष में, केजरीवाल के पक्ष या विपक्ष में अपने पूर्वाग्रह के साथ सक्रिय हो गया है। लेकिन इस कार्रवाई और उस पर केजरीवाल की प्रतिक्रिया से कुछ सवाल खड़े होते हैं। 
केन्द्र और राज्य सरकार के अधिकारों के दायरों का एक बड़ा टकराव दिल्ली में केजरीवाल सरकार के पहले दिन से चले आ रहा है। बात-बात पर आए दिन दोनों ने कानूनी नोटिस चलते रहे, और आज की कार्रवाई को उस सिलसिले की एक कड़ी भी देखा जा रहा है। केजरीवाल दिल्ली में ही मौजूद सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी कार्रवाई करने में सक्षम हैं, इसलिए इस मामले की वैधानिकता को लेकर हम अभी तकनीकी बारीकियों में जाना नहीं चाहते, लेकिन यह बात जाहिर है कि केजरीवाल के साथ काम कर रहे अफसर पर छापा मारने के पहले केजरीवाल से इजाजत लेने का मतलब तो सीबीआई की कार्रवाई को नाकामयाब कर देना होता। इसलिए इसमें हमको कोई बुराई नहीं लग रही है कि सीबीआई ने केजरीवाल को खबर नहीं की, और अफसर पर सीधे कार्रवाई की। वैधानिकता से परे हम नैतिकता की बात करें, तो खुद केजरीवाल की पूरी राजनीतिक जिंदगी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करते हुए बनी है, और वे जब मुंह खोलते थे, किसी न किसी को भ्रष्ट साबित करते थे। अब ऐसे में अगर देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी किसी अफसर की जांच कर रही है, तो उसमें ऐसा क्या है कि केजरीवाल उसके लिए प्रधानमंत्री को गालियां देने लगें? भ्रष्टाचार के आरोप पर अगर कार्रवाई हो रही है, तो वह तो केजरीवाल की सोच के मुताबिक ही हो रही है, और उनको तो चाहिए कि कुछ दिन जंतर-मंतर पर बैठकर सरकार चला लें और सीबीआई को जांच करने दें। हम इस बात पर जरा भी भरोसा नहीं करते कि हर जांच के वक्त यह तर्क दिया जाए कि एजेंसी चलाने वाली सरकार राजनीतिक विरोध से, बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है। भारत जैसी बहुदलीय व्यवस्था में, यहां के संघीय ढांचे में राजनीतिक विरोध तो कभी खत्म हो भी नहीं सकेगा, तो क्या ऐसे में कोई भी पार्टी अपनी विपक्षी पार्टियों के नेताओं या उनकी सरकारों के खिलाफ कोई कार्रवाई ही न करे? यह सिलसिला ठीक नहीं है। और केजरीवाल को यह बात याद रखना चाहिए कि सीबीआई दर्जनों मामलों में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के सामने जांच और छानबीन के घेरे में रहती है। कोई भी गलत काम करने के पहले सीबीआई को याद रखना पड़ेगा कि केजरीवाल हर अदालत तक जाने में सक्षम हैं। ऐसे में नैतिकता की राजनीति करने का दावा करने वाले केजरीवाल को जांच एजेंसी के खिलाफ, या उसकी आड़ में प्रधानमंत्री के खिलाफ हमला नहीं बोलना चाहिए।

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