किसानों की जान बचाना मुमकिन तो है, लेकिन...

संपादकीय
17 दिसंबर 2015

छत्तीसगढ़ मेंं किसानों की आत्महत्या पर एक तरफ तो सरकार की कमजोरी जाहिर होती है कि वह धान का बोनस नहीं दे पाई, धान खरीदी में कई तरह की गड़बडिय़ां हुईं, सरकार की तैयारी सूखे के हिसाब से बांध के पानी की नहीं थी, और दूसरी तरफ कल विधानसभा में इस पर चर्चा के दौरान पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर ने जिस लहजे में आत्महत्या करने वाले किसानों को श्रद्धांजलि दी, उससे एक नई कड़वाहट पैदा हो गई। मंत्री का यह कहना कि उनको नहीं मालूम कि खुदकुशी करने वाले किसान थे या नहीं, मरने वाले, खुद जान देने वाले किसानों के परिवारों के जख्मों पर नमक सरीखा है। खुद सत्तारूढ़ भाजपा के लोग इस बात पर हैरान थे कि एक वरिष्ठ और अनुभवी मंत्री किस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। खैर, यह भाजपा की अपनी सोच है कि वह अपनी मंत्रियों के बारे में क्या सोचती है, हम तो किसानी से जुड़े हुए मुद्दों पर बात करना चाहते हैं जिस पर आज छत्तीसगढ़ की विधानसभा भी इसी वक्त बात कर रही है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अभी विधानसभा में कई तरह की राहतों की घोषणा की है, लेकिन उनका फायदा लोगों को मिलने तक पता नहीं और कितने किसान जान दे चुके होंगे। इसलिए इन फायदों से परे यह समझने की जरूरत है कि किसानी की ऐसी बदहाली भविष्य में न रहे इसलिए जो किया जा सकता है, उस पर सरकार को विचार करना चाहिए। 
छत्तीसगढ़ धान पर टिका राज्य होने की वजह से गरीबी और फटेहाली से गुजरती ही रहता है। ऐसे में राज्य सरकार को किसानों की अर्थव्यवस्था को धान से परे भी ले जाने की कोशिश करनी चाहिए। कई ऐसी फसलें हैं, जो धान के मुकाबले अधिक कमाई देती हैं, लेकिन किसान उतना हौसला नहीं जुटा पाते क्योंकि नए बीज, नई तकनीक, और नए खतरे झेलने की उसकी ताकत नहीं है। दूसरी तरफ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि के साथ-साथ कुछ दूसरी बातों को भी जोडऩा बहुत जरूरी है। ग्रामोद्योग के तहत एक लंबी लिस्ट आती है कि किस तरह ग्रामीण रोजगार बढ़ सकते हैं। इसमें लोग हस्तशिल्प से लेकर हाथकरघा तक का काम कर सकते हैं, वनोपज पर आधारित काम हो सकता है, बागवानी के काम हो सकते हैं, मधुमक्खी पालन और मशरूम उगाने जैसे काम हो सकते हैं, सिल्क और लाख से जुड़े काम हो सकते हैं, डेयरी का काम हो सकता है, और इनसे न सिर्फ लाखों रोजगार पैदा होंगे, बल्कि किसान किसी सूखे या अकाल की नौबत आने पर भूखों नहीं मरेगा, खुदकुशी नहीं करेगा। 
लेकिन सरकार की आम सोच के चलते ऐसी व्यापक ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर काम नामुमकिन दिखता है। यह काम धान खरीदी के मुकाबले बहुत अधिक मुश्किल और बिखरा हुआ होगा, और इसके लिए सरकार को अपने आम भ्रष्टाचार से बाहर निकलकर, कल्पनाशीलता और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक ऐसे काम बढ़ाने पड़ेंगे, तब जाकर किसानों की मौत थम सकेगी, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुधर सकेगी। गांवों के पास किसानी के बाद भी खासा वक्त बचे रहता है, और इसके इस्तेमाल के लिए न तो कोई बड़ी तकनीक लगती है, और न ही बिजली लगती है। ऐसे कामों के बारे में भारत का अनुभव भी बहुत लंबा है। लेकिन सरकार को शहरी सोच से आजाद होकर ग्रामीण स्वरोजगार के इस देश के अनुभव का उपयोग करना पड़ेगा, तब जाकर लोगों की जिंदगी बच पाएगी। 

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