सूदखोरी और देह शोषण का एक नया तरीका आन्ध्र में

संपादकीय
18 दिसंबर 2015

आंध्र की विधानसभा में इस वक्त बड़ा हंगामा हो रहा है। वहां पर एक से अधिक राजनीतिक दलों के विधायकों से जुड़ी साहूकारी कंपनियों ने महिलाओं को छोटे-छोटे कर्ज दिए, और जब वे चुका नहीं पाईं, तो उन्हें सेक्स-रैकेट में धकेल दिया। पिछले कुछ दिनों से इसे लेकर प्रदेश में बड़ी गिरफ्तारियां हो रही थीं, और आज विधानसभा में आरोपों और हंगामे का दिन रहा। विधानसभा या संसद में हंगामे में लिखने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि इन जगहों पर यह आम बात है। लेकिन सूदखोरी और देह शोषण के जो नए-नए अंदाज दुनिया में सामने आते हैं वे देखते ही बनते हैं। लोगों को याद होगा कि हिन्दी की पुरानी फिल्मों में जिस तरह जीवन नाम का एक अभिनेता सूदखोर के किरदार करता था, और कभी बच्चों को बंधुआ मजदूर बनाता था, कभी महिलाओं का शोषण करता था, और कभी घर-जमीन पर कब्जा करता था। यह सिलसिला अलग-अलग कई तरह की शक्लों में आज भी जारी है। 
एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश भर में जन-धन योजना लागू करके हर गरीब का खाता खुलवाने का काम कर रहे हैं, और लोगों को छोटे-छोटे कर्ज कम कागजी खानापूरी पर भी देने की योजना शुरू कर चुके हैं, और दूसरी तरफ इस अंदाज की सूदखोरी देश के विकसित राज्यों में से एक, आन्ध्र में चल रही है। लेकिन एक तरफ तो सूदखोरी का यह अंदाज चल रहा है, और दूसरी तरफ देश भर में बहुत से प्रदेशों में चिटफंड कंपनियां लोगों को धोखा देकर लाखों करोड़ रूपए जमा करवा चुकी हैं, और लूटकर भाग चुकी हैं। इनमें छत्तीसगढ़ जैसे गरीब प्रदेश भी हैं, जहां लोगों ने अपनी जमीन बेचकर भी ऐसी कंपनियों में पैसा लगा दिया था, और ये कंपनियां रातों-रात दफ्तर बंद करके भाग गईं। 
पैसा देने के नाम पर, और पैसा लेने के नाम पर जब कभी धोखाधड़ी होती है, वह स्थानीय अफसरों और पुलिस की जानकारी के बिना नहीं होती। और जब ऐसे सिलसिले के कई महीने गुजर जाते हैं, तब जाकर बहुत सी शिकायतों के बाद सरकार की आंख खुलने का नाटक करती है, और जब तक लोगों की तलाश शुरू होती है, तब तक वे सब खा-पीकर भाग चुके रहते हैं, और उनके स्थानीय एजेंट ही पकड़ में आते हैं। यह सिलसिला सत्ता की मेहरबानी के बिना नहीं चलता, और पश्चिम बंगाल जैसा जागरूक राज्य यह देख चुका है कि किस तरह मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की पार्टी के मंत्री ऐसी जालसाज कंपनी में शामिल थे, और आज जेल में हैं। 
हम पहले भी इसी जगह यह लिख चुके हैं कि देश और अलग-अलग प्रदेशों में केन्द्र और राज्य सरकारों को आर्थिक अपराधों को लेकर खुफिया एजेंसी बनाने की जरूरत है जो कि अपराध शुरू होते ही उस पर नजर रखे, और लूट अधिक बढ़ सके, उसके पहले ही अपराधियों को दबोच सके। जब पूरा खेत खाली हो जाता है, तब कीड़ों को मारने के लिए जहर लेकर पहुंचने का कोई फायदा नहीं होता। हर राज्य को दूसरे राज्य के जालसाजी के उजागर हो चुके मामलों से सबक लेना चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि मुजरिमों के लिए राज्यों की सरहद कोई मायने नहीं रखती, और वे एक जगह कामयाब होने के बाद बाकी जगहों पर जाकर भी वही तरीका इस्तेमाल करते हैं। 
आन्ध्र में सूदखोरी की आड़ में गरीब कर्जदार महिलाओं के देह शोषण का सिलसिला बहुत भयानक है। और जैसी कि खबर आ रही है इसमें सत्ता और विपक्ष से जुड़े हुए लोग शामिल हैं। तो ऐसे मामले में मुख्यमंत्री को बिना देर किए हुए इस मामले को सीबीआई के हवाले करना चाहिए क्योंकि जहां राजनीति के बाहुबली मुजरिमों के सरदार हों, वहां पर स्थानीय जांच मुमकिन नहीं हो सकती। 

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