चेन्नई या मुंबई की बाढ़ से तबाही, सीखने की जरूरत

संपादकीय
2 दिसंबर 2015

तमिलनाडू से राजधानी चेन्नई के बारिश और बाढ़ में बुरी तरह डूब जाने की खबरें आ रही हैं, और अभी वहां अगले दो-तीन दिन बारिश और जारी रहने की चेतावनी भी मौसम विभाग ने दी है। पिछले कई दिनों से तमिलनाडू में बारिश और बाढ़ से बड़ी संख्या में लोग मारे गए, और चेन्नई शहर खासकर बुरी तरह प्रभावित हुआ। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले मुंबई शहर इसी तरह डूबा था, और इमारतों के तलघर तो पूरी तरह डूब ही गए थे, ग्राउंड फ्लोर पर भी कई फीट पानी भर गया था, आज चेन्नई का हाल उससे भी बुरा दिख रहा है। अब यहां पर दो-चार बातों को मिलाकर सोचने की जरूरत है, और इन महानगरों से परे भी बाकी देश में भी इस बारे में सोचना चाहिए। 
जहां-जहां शहरीकरण हो रहा है, वहां-वहां पानी को सोखने लायक खुली जमीन तेजी से खत्म हो रही है, और कांक्रीट के ढांचे बारिश के पानी को सिर्फ इक_ा कर पाते हैं, निकाल नहीं पाते। फिर जैसा कि मुंबई के मामले में सामने आया था, वहां पर सारी भूमिगत नालियां प्लास्टिक के कचरे से पूरी तरह बंद थीं, और पानी के निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा था। देश भर में जगह-जगह शहरीकरण से जो कचरा इक_ा हो रहा है, उसकी रफ्तार बढ़ती चल रही है, दूसरी तरफ पानी के निकलने के जो पुराने नाले-नालियां हैं, वे कचरे से बंद होते चल रहे हैं। शहरीकरण में जो नए इलाके विकसित हो रहे हैं, ताकतवर और संपन्न तबका वहीं बस रहा है, और वहां पर तो पानी आने-जाने के रास्ते ठीक है, लेकिन पुराने इलाके हर शहरों में डूब रहे हैं, बारिश के पानी भी डूब रहे हैं, और ताजा कचरे में भी डूब रहे हैं। 
अब यहां पर यह भी सोचने की जरूरत है कि लोग कितना कचरा इक_ा करते हैं, उसे कैसे फेंकते हैं, और उसके निपटारे का स्थानीय म्युनिसिपल के पास क्या तरीका है? यहां पर तस्वीर बड़ी निराशाजनक है, क्योंकि बढ़ती आबादी, बढ़ती संपन्नता, और बढ़ते कचरे की रफ्तार से निपटारे की पुरानी रफ्तार का कोई मेल नहीं बैठता। दूसरी बात यह कि मौसम अब अधिक दगाबाज हो गया है। बारिश के ही नहीं, गर्मी और सर्दी के मौसम भी अपनी तेज मार के नए रिकॉर्ड कायम कर रहे हैं। मौसम का जो सर्वाधिक रिकॉर्ड रहते आया था, वह अब बदल भी रहा है, और अब जरा सी देर में बहुत तेज बारिश होकर किसी भी शहर को डुबा देती है। इस मौसम में कोई बदलाव लाना पूरी दुनिया के सामूहिक सहयोग से हो सकता है, लेकिन वह किसी शहर के बस की बात नहीं है। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि शहरीकरण की योजनाएं मौसम की अभूतपूर्व बुरी मार का अंदाज लगाकर ही बनाई जाएं, न कि पुराने रिकॉर्ड देखकर। मौसम ने इंसानों से कोई रिश्वत नहीं खाई हुई है कि वह उस पर हमेशा मेहरबान रहे, और खासकर जब इंसान कुदरत पर कूद-कूदकर लात मारते हों, तो कुदरत की क्या बेबसी है कि वह इंसान पर मेहरबान रहे? 
शहरीकरण की तेज रफ्तार और उसका विकराल आकार स्थानीय म्युनिसिपल की सोच और उसकी कूबत दोनों से परे की बात हो चुके हैं। अब शहरी कचरे के तेज रफ्तार निपटारे के साथ-साथ, शहरों से पानी की तेज रफ्तार निकासी का इंतजाम जब तक नहीं किया जाएगा, देश के शहर कभी भी डूब जाएंगे, और अगली बारिश आने तक भी लोगों के निजी नुकसान की भरपाई नहीं हो पाएगी। मुंबई या चेन्नई में जिन लोगों के घर कई-कई फीट पानी में डूबे हुए हैं, उनके सामानों का जो नुकसान सूखने तक हो चुका रहेगा, उससे लोग उबर नहीं पाएंगे। देश की सरकार, राज्यों की सरकारें, और शहरों की म्युनिसिपालिटी टुकड़े-टुकड़े में सोच रही हैं, और टुकड़े-टुकड़े में योजनाएं बना रही हैं। कुदरत की मार से निपटने के लिए इस तरह के काम से काम नहीं चलेगा। लोगों को यह भी याद रखना पड़ेगा कि अब महज हर बरस की बाढ़ वाले इलाकों में ही बाढ़ नहीं आती, अब तो नए-नए किसी भी इलाके में कितनी भी बाढ़ आ जाती है, और हर किसी को ऐसी नौबत के लिए तैयार रहना पड़ेगा, और इसकी बुनियादी जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर है।

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