देश की सबसे बड़ी पंचायत सजावट की अलमारी नहीं

संपादकीय
20 दिसंबर 2015

राज्यसभा में केन्द्र सरकार या राष्ट्रपति की तरफ से दस ऐसे लोगों को मनोनीत किया जाता है जो कि राजनीति से परे जिंदगी के अलग-अलग दायरों में कामयाबी हासिल कर चुके खास लोग होते हैं, और जिस तरह पुराने जमाने के किसी राजा के दरबार में नवरत्न हुआ करते थे, उसी तरह आज भी ऐसे रत्नों को वहां रखकर सदन की शोभा बढ़ाने का काम होता है। हालांकि इसका एक कागजी मतलब यह भी होता है कि अलग-अलग दायरे से आए हुए लोगों के अनुभव, और उनके ज्ञान का फायदा संसद को मिल सके। 
लेकिन पिछली आधी सदी का इसका अनुभव बहुत ही खराब रहा है। इन लोगों में से गिने-चुने ही ऐसे रहे जिन्होंने अपने पेशे या अपने दायरे के तजुर्बे का फायदा सदन को दिया हो। आमतौर पर ये गुपचुप बैठे रहते हैं, या कि कभी-कभी जया बच्चन की तरह अपनी पार्टी की नीतियों को लेकर बात करते हैं। लेकिन संसद में मनोनयन से लाए जाने वाले लोगों की खूबियों का फायदा भारतीय लोकतंत्र को मिला हो ऐसा देखने में नहीं आता। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने देश की इस सबसे बड़ी पंचायत में सजावट के लिए ऐसे लोगों को बिठाने के खिलाफ पहले भी लिखा है। और अब अगर देखें तो संसद से निकली हुई जानकारी हमारे विरोध को जायज करार देती है। अभी जो दस लोग राज्यसभा में हैं उनमें से एक मणिशंकर अय्यर कांग्रेस के पुराने नेता हैं और पेशेवर राजनेता हैं। उनको भी एक लेखक बताकर इस दर्जे में राज्यसभा में लाना परले दर्जे का नाजायज काम था, लेकिन यूपीए सरकार ने अपने रहते वह किया था। दूसरी तरफ भारत रत्न सचिन तेंदुलकर से लेकर, फिल्मी अभिनेत्री रेखा तक, और एक बहुत ही जागरूक फिल्मकार, लेखक और शायर जावेद अख्तर भी राज्यसभा में मनोनीत किए गए थे, जिनका कार्यकाल अभी जारी है। अब राज्यसभा में इनकी हाजिरी देखें, तो सचिन और रेखा कुल पांच फीसदी हाजिरी वाले लोग हैं। लेकिन जो लोग हाजिर हुए भी हैं उनको अगर देखें, तो जावेद अख्तर ने अब तक संसद में एक भी सवाल नहीं पूछा, यही हाल एक उद्योगपति अनु आगा का है, यही हाल रेखा का है, और यही हाल के. पाराशरण का है जो कि यूपीए सरकार के समय भारत के अटार्नी जनरल थे, सुप्रीम कोर्ट में हर दिन बहस करने का उनका पेशा ही था, लेकिन संसद में उन्होंने एक भी सवाल नहीं पूछे। इसके बाद के आंकड़े देखें कि कौन लोगों ने कितनी बहसों में हिस्सा लिया तो रेखा और सचिन के नाम के साथ फिर एक बड़ा सा शून्य लिखा दिखता है।
देश की संसद अभी तो पिछली कुछ बरसों से काम न करते दिख रही है, और सांसदों को देश की जनता मुफ्तखोर मानती है। बोलचाल की जुबान में लोग मुफ्तखोर की जगह उर्दू का एक अधिक अपमानजनक शब्द, हरामखोर, इस्तेमाल करते हैं, जिसका मतलब है काम पूरा न करके भी खाने वाले लोग। अब हमारी इस भाषा को संसद खारिज कर सकती है, और इसके खिलाफ विशेषाधिकार हनन भी ला सकती है, लेकिन उससे देश की जनता की सोच नहीं बदली जा सकती। जिस सचिन तेंदुलकर को देश ने सबसे बड़ा सम्मान दे दिया है, उसके बाद न तो सचिन का कोई सम्मान बढ़ाया जा सकता था, और न ही संसद का सम्मान ऐसे लोगों से बढ़ सकता जो कि संसद की कार्रवाई में कुछ जोड़ सकें। लोगों को याद होगा कि कुछ लोगों के मनोनयन के पीछे सरकार की बदनीयत की चर्चा भी होती है। अब जिस तरह से समाजवादी पार्टी की तरफ से जया बच्चन को राज्यसभा में मनोनीत करने के तुरंत बाद कांग्रेस पार्टी ने एक दूसरी अभिनेत्री रेखा को वहीं ले जाकर बिठा दिया, और यह बात जगजाहिर थी कि इन दोनों अभिनेत्रियों के संबंध अपने निजी जीवन को लेकर बहुत ही खराब हैं, और दोनों में अनबोला है। ऐसे में बिना किसी राष्ट्रीय योगदान के किसी अभिनेत्री को संसद में ला बिठाना, उससे बेहतर यह होता कि नसीरुद्दीन शाह जैसे किसी अभिनेता को वहां लाया जाता जो कि संसद के बाहर भी जागरूक होकर देश के मुद्दों पर हौसले के साथ खुलकर बोलते हैं। लेकिन राजनीतिक दल बहुत ही तंगदिली से ऐसी कुर्सियों पर लोगों को लाकर बिठाते हैं, और इसलिए भी राष्ट्रपति के नाम पर होने वाला यह मनोनयन खत्म होना चाहिए। वैसे भी राजनीतिक दल अपने सांसद-विधायकों की संख्या के अनुपात में अपने पसंदीदा लोगों को राज्यसभा में लाते हैं, और उसमें भी ऐसी सीटों की बिक्री और नीलामी की खुली चर्चा हमेशा से होती आई है। पूरी की पूरी राज्यसभा के इस ढांचे को बदलना तो एक मुश्किल बात होगी, लेकिन खिलाड़ी-कलाकार जैसे कोटे से लोगों को लाकर संसद की सीट को बर्बाद करने के बजाय राष्ट्रपति ऐसे नवरत्नों की एक कमेटी अलग से बना ले, और समय-समय पर उनकी बैठक करके, उनकी राय लेकर, सरकार को सुझाव भेज दे। आज संसद में जितनी घटिया बातें होती हैं, और जितनी खराब नीयत से वहां काम होता है, हो सकता है कि उस स्तर पर जाकर ये भले लोग मुंह न खोल पाते हों। जो भी हो, देश की सबसे बड़ी पंचायत को हम सजावट की अलमारी नहीं मानते। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। 

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