महिलाओं का शोषण रोकने और बराबरी का हक दिलाने एक मजबूत आंदोलन जरूरी

संपादकीय
21 दिसंबर 2015

ब्रिटेन की एक महिला सांसद ने मांग की है कि वे गर्भावस्था की छुट्टी पर हैं, और इस दौरान संसद मतदान होने पर उनको घर या अस्पताल से वोट डालने का हक मिलना चाहिए। ब्रिटेन की तरह ही भारत में वही संसदीय प्रणाली चल रही है जिसमें जेल में बंद सांसद-विधायक या अस्पताल में भर्ती सांसद-विधायक को स्ट्रेचर पर सदन में लाकर उनसे वोट डलवाया जाता है, और अगर वे आने की हालत में नहीं है, तो उनको वोट डालने का हक नहीं मिलता। दुनिया में रोजाना महिलाओं से जुड़े हुए मुद्दों पर नए-नए सवाल उठ रहे हैं, और सदियों से चली आ रही महिला-विरोधी, और पुरूष प्रधान व्यवस्था में फेरबदल के लिए मांग उठती हैं। दुनिया की भाषा में बदलाव लाना पड़ रहा है, और महिलाओं के खिलाफ जो देश सबसे अधिक कट्टर और भेदभाव वाला है, उस सऊदी अरब में भी महिलाओं को पहली बार चुनाव लडऩे का मौका मिला, वोट डालने का मौका मिला, और महिलाएं जीतकर आईं भी। भारत में भी म्युनिसिपलों और पंचायतों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होने के बाद स्थानीय संस्थाओं में उनकी लीडरशिप लगातार बढ़ रही है, और वे तजुर्बा भी हासिल कर रही हैं। 
दुनिया की कुछ बड़ी कंपनियां अपने पुरूष कर्मचारियों को भी पिता बनने के मौके पर गर्भावस्था से जुड़े कामकाज के लिए छुट्टी देनी की व्यवस्था बढ़ाते चल रहे हैं, और कुछ विकसित, सभ्य देशों में महिलाओं के बराबरी की ही छुट्टी पुरूष को भी मिलने लगी है। लेकिन भारत महिलाओं की हालत कानूनी रूप से बराबर होने के बावजूद उन्हें बराबरी का हक मिलने में अभी पता नहीं कितनी सदियां और लगेंगी। इसकी एक वजह यह है कि संसद में दशकों से चले आ रहे महिला आरक्षण विधेयक को पास करवाने में किसी पार्टी की दिलचस्पी नहीं दिख रही है, और अगर कांग्रेस-भाजपा जैसी दो पार्टियां मिलकर इस आरक्षण के लिए कोशिश करतीं तो यह कबका कानून बन चुका होता। लेकिन अलग-अलग तो ये दोनों पार्टियां महिला आरक्षण की बात करती हैं, इसे कानून बनवाने के लिए एक साथ बैठने को जब ये तैयार नहीं होतीं, तो अब तो धीरे-धीरे करके महिला आरक्षण विधेयक नाम के शब्द भी हवा से खो गए हैं। 
देश में अगर महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना है, तो यह एक बहुत जरूरी कानून था, और जिस तरह अभी के बरसों में निर्भया के मुद्दे को लेकर सरकार को आनन-फानन एक कानून बनाना पड़ा, उसी तरह का एक आंदोलन महिला आरक्षण के लिए भी चलाया जाना जरूरी है। जब देश की आधी आबादी अपने हक के लिए एक साथ उठ-खड़ी होगी तो कोई भी पार्टी एक सीमा से अधिक उसे टाल नहीं सकेगी। इसके साथ-साथ कुछ और मुद्दे ऐसे हैं जिन पर केन्द्र और राज्य सरकारों को, सरकारों से परे निजी क्षेत्र को काम करने की जरूरत है। कामकाज की जगहों पर महिलाओं के शोषण की घटनाएं आमतौर पर दबी रह जाती हैं, क्योंकि इन तमाम जगहों पर ताकत की कुर्सियों पर आदमी बैठे रहते हैं, और सदियों की उनकी मर्दाना सोच यह समझ भी नहीं पाती कि कौन-कौन सी बातें महिला के शोषण के दायरे में आती हैं। यह सिलसिला थमना चाहिए। एक तरफ तो मौजूदा कानूनों का इस्तेमाल न करने पर सरकारी और गैरसरकारी संस्थानों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। आज हालत यह है कि किसी महिला कर्मचारी-अधिकारी को एक रिपोर्ट लिखाने के लिए भी थाने के बाद अदालत के चक्कर लगाने पड़ते हैं, और सारी व्यवस्था महिला को कुचलने में जुटी हुई दिखती है। 
भारत को एक मजबूत महिला आंदोलन की जरूरत है, और ऐसे आंदोलनकारियों को चाहिए कि वे राजनीतिक दलों में, सरकार और न्यायपालिका में बैठी हुई महिलाओं को घेरकर उनसे उनकी जिम्मेदारी पर सवाल करें, और अगर महिला मुद्दों पर उनका साथ नहीं मिले, तो उनका भांडाफोड़ भी करें। यह सिलसिला एक आक्रामक तरीके से चलना जरूरी है, और यह नामुमकिन भी नहीं दिखता है। इसके लिए बस महिलाओं को उठ-खड़ा होना होगा। 

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