संसद जनता की संतुष्टि के बजाय समझदार कानून बनाने का हौसला दिखाए

संपादकीय
22 दिसंबर 2015

दिल्ली में हुए देश के सबसे चर्चित बलात्कार केस में एक नाबालिग किशोर की कू्ररता के बाद से लगातार देश में यह बहस चल रही है कि हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर मामलों में अगर किशोर उम्र के लोग शामिल रहते हैं, तो उनको नाबालिग होने की रियायत दी जाए, या फिर उनकी सजा भी बालिग मुजरिमों की तरह रहे। इसके साथ-साथ यह पिछला पूरा हफ्ता इसलिए निर्भया को लेकर खबरों में रहा कि उसके मां-बाप दिल्ली में लगातार यह सार्वजनिक अभियान चलाते रहे कि छोटी सजा पूरी करने के बाद सुधारगृह से निकल रहा अब नौजवान हो चुका निर्भया का किशोर-बलात्कारी न छोड़ा जाए। इसके लिए दिल्ली महिला आयोग ने भी आखिरी रात, आधी रात के बाद तक सुप्रीम कोर्ट को जगाया, लेकिन अदालत ने ऐसे किसी कानून के न होने की बात कहते हुए इस रिहाई को रोकने से मना कर दिया। देश में चारों तरफ सोशल मीडिया सहित मीडिया में भी लगातार यह अभियान चल रहा है कि इस नौजवान को सजा के बाद भी न छोड़ा जाए। संसद अभी ऐसे एक कानून को बनाने पर विचार कर ही रहा है जिसके तहत ऐसे गंभीर अपराधों में किशोरावस्था के अपराधियों को भी आज के मुकाबले अधिक कड़ी सजा दी जा सके।
दिक्कत यह है कि भारत में किसी एक मामले को लेकर जब जनभावनाएं बहुत भड़कती हैं, तो उनको शांत करने के लिए एक नए कानून को दमकल की तरह इस्तेमाल किया जाता है। यह सोचने की तकलीफ अधिक मुश्किल होती है कि मौजूदा कानूनों का बेहतर इस्तेमाल क्यों नहीं हो पाया, किसी किशोर अपराधी की सोच को समय रहते सुधारने का जिम्मा सरकार और समाज क्यों नहीं कर पाए, और सजा के दौरान अपराधियों की सोच को सुधारना किसी कैद के मुकाबले अधिक जरूरी क्यों है? इन तमाम बातों को सोचने और करने के लिए बहुत से तथ्यों और तर्कों की जरूरत पड़ती है। उसके बजाय सजा को अधिक बड़ा या कड़ा कर देना एक आसान और लुभावना नारा रहता है, और जब जनदबाव अधिक पड़ता है तो सरकारें और राजनीतिक दल इसी शॉटकट का इस्तेमाल करते हैं। नतीजा यह होता है कि अक्सर कोई अधकचरा कानून बन जाता है, जिससे नफे के बजाय नुकसान अधिक होने लगता है, या फिर उसमें छूट के रास्ते निकालना आसान होता है। यह भी होता है कि जब किसी दिक्कत की जड़ कहीं और होती है, तब पत्तों को पानी से धोकर पेड़ को चकाचक दिखा दिया जाता है।
जनदबाव के सामने ऐसा दबने और झुकने की नौबत तब आती है जब सरकारें समय रहते अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती हैं। और जब भड़की हुई भावनाएं मीडिया में लपटों के साथ दिखती हैं, और मीडिया उनको हवा देने का काम और करता है, तब संसद के पास भी समझदारी से बहस करने की गुंजाइश नहीं बचती, और वक्त भी नहीं बचता। ऐसे में बनने वाले कानून फिर कुछ बरसों में संशोधन की जरूरत के साथ खड़े हो जाते हैं, और तब तक उन कानूनों का इस्तेमाल कई बेकसूरों पर मार की तरह पड़ता है।
हम किसी बदले की भावना से बनाए गए कानूनों के खिलाफ हैं। किसी एक मुजरिम को देखते हुए बनाया गया कानून भी बड़ा नुकसानदेह हो सकता है, और उसमें सुधार की भावना के बजाय बदले की भावना हावी रहती है। निर्भया नाम के इस दिल दहलाने वाले केस को लेकर विचलित भावनाओं के साथ जनदबाव में जो कानून बन रहा है, उसमें हो सकता है कि समाजशास्त्रियों, और मनोवैज्ञानिकों, परामर्शदाताओं की राय को जगह न मिल पाई हो। इस मुद्दे पर देश इतना विचलित है कि इस पर सार्वजनिक बहस आसान भी नहीं है। ऐसे में संसद को जनता की संतुष्टि के बजाय एक समझदार कानून बनाने का हौसला भी दिखाना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें