दौलतमंद मुजरिम से वसूलना चाहिए जांच-मुकदमे का खर्च और मोटा मुआवजा भी

संपादकीय
23 दिसंबर 2015

देश में इन दिनों ऐसे चर्चित जुर्म छाए हुए हैं जिनके पीछे करोड़पति-अरबपति लोग पकड़ाए हैं। बड़े लोगों के शामिल होने से खबरें भी बड़ी बन जाती हैं, और पुलिस थाने से लेकर अस्पताल या अदालत तक ऐसे लोगों की हिफाजत के लिए, भीड़ को दूर रखने के लिए पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ती है। जो बड़े लोग छूट जाते हैं, उनके बारे में हमको कुछ नहीं कहना है, लेकिन जो बड़े लोग मुजरिम साबित होते हैं, उनसे सरकार को जांच और मुकदमे का खर्च वसूलना चाहिए। ऐसे लोग अपने पीछे जमीन-जायदाद छोड़ जाते हैं, और देश के कानून में यह फर्क करने की जरूरत है कि संपन्न अपराधी को सजा दिलवाने में सरकार गरीबों के हक का पैसा खर्च न करे। कुछ लोगों को यह सलाह अटपटी लग सकती है क्योंकि न्याय की नजर में गरीब और अमीर का फर्क नहीं रखा गया है, लेकिन हमारी यह सलाह बहुत ही न्यायसंगत इसलिए है क्योंकि देश की जांच और मुकदमे की क्षमता बड़ी सीमित है, और लाखों बेकसूर बिना सुनवाई, अधूरी जांच, और अदालतों की बाकी किस्म की लेटलतीफी के चलते जेलों में बंद हैं, और अदालतें आधी सदी से अपनी क्षमता बढ़ाने की मांग करती चल रही है। यह आए दिन होता है कि पुलिस अदालत में किसी अभियुक्त को पेशी पर न लाने के लिए अर्जी दाखिल करती है कि पुलिस-बल न होने की वजह से पेश नहीं किया जा रहा, और अगली तारीख दी जाए। 
अब हम कुछ मामलों को देखें, जैसे संजय दत्त का मामला, मनु शर्मा का मामला, इंद्राणी मुखर्जी का मामला, या सुब्रत राय सहारा से लेकर विजय माल्या जैसे लोगों के अभी चल रहे मामले, इनमें से जो भी और जब भी मुजरिम साबित हों, उनसे जांच और मुकदमे की पूरी लागत सरकार को वसूल करना चाहिए। किसी गरीब से तो यह लागत नहीं ली जा सकती, और संपन्न अपराधी पर सरकार ऐसा खर्च नहीं कर सकती। हम ऐसे ताकतवर लोगों के पैसों से उनकी जांच या उनके मुकदमे तेज करने, या उनके पक्ष में कोई फैसला करने, या सजा में रियायत की बात नहीं कर रहे। हम महज सजा हो जाने के बाद इस जुर्म पर हुए सरकारी खर्च को इन लोगों की दौलत से वसूलने की बात कर रहे हैं। जिस तरह दुपहिए पर थोड़ा जुर्माना लगता है, और बड़ी गाड़ी पर अधिक जुर्माना लगता है, वैसा ही बड़े लोगों के जुर्म पर भी होना चाहिए। एक अपराधी की छोड़ी हुई दौलत का इस्तेमाल उसका परिवार करे, और जांच का बोझ देश उठाए, ये ठीक नहीं है। 
भारत के कानून में अमरीकी अंदाज में एक और फेरबदल करने की बात बहस में बनी हुई है जिसे अमरीकी कानूनी-जुबान में प्ली-बार्गेन कहते हैं। इसमें मुजरिम और शिकार परिवार के बीच कुछ तरह के मामलों में कुछ तरह का समझौता अदालत से परे भी हो सकता है जिसे अदालत मंजूर करती है, और जांच एजेंसी के साथ भी मुजरिम का ऐसा समझौता हो सकता है जिसे अदालत मानती है। भारत में जो लोग संपन्न लोगों के जुर्म के शिकार होते हैं, उन्हें मुजरिम को सजा से कुछ भी हासिल नहीं होता। ऐसे मामलों में भी हमने यह लिखा है कि जब यह साबित हो जाए कि मुजरिम संपन्न हैं, और उसके जुर्म के शिकार कमजोर तबके के हैं, तब मुजरिम की संपत्ति से जुर्म के शिकार लोगों को एक बड़ा मुआवजा देने का प्रावधान कानून में करना चाहिए। अब यह प्ली-बार्गेन जैसे किसी रास्ते हो सकता है, या उसके बिना भी कानून बनाकर हो सकता है, यह जानकार लोगों के बीच विचार-विमर्श का मुद्दा है। हमारी राय यहीं तक सीमित है कि मुजरिम की संपत्ति का इस्तेमाल उसके जुर्म की जांच पर भी खर्च होना चाहिए, और उसके जुर्म के शिकार को मुआवजा देने में भी।

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