सत्ता के असर में भाजपा का चाल-चलन भी कांग्रेस जैसा

संपादकीय
24 दिसंबर 2015

भाजपा के भीतर वित्त मंत्री अरूण जेटली के क्रिकेट मामलों को लेकर जो बखेड़ा खड़ा हुआ है, वह पार्टी के लिए एक बड़ी बेचैनी की वजह बन गया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की चेतावनी के बावजूद सांसद कीर्ति आजाद ने जेटली के खिलाफ मोर्चा जारी रखा है, और भाजपा के भीतर-बाहर रहते आए दो और बड़बोले जेटली-विरोधी नेता, राम जेठमलानी, और सुब्रमण्यम स्वामी भी कीर्ति आजाद के साथ, या जेटली के खिलाफ जुट गए हैं। हालांकि किसी भी इतनी बड़ी पार्टी में ऐसी बगावत न कोई बड़ी बात है, और न ही नई, लेकिन फिर भी भाजपा के सामने आज अपनी छवि का सवाल है कि उसके एक सबसे दिग्गज माने जाने वाले नेता, वित्त मंत्री अरूण जेटली क्रिकेट संघ के अपने कार्यकाल के बड़े भ्रष्टाचार का आरोप झेल रहे हैं, और पार्टी के ही सांसद याद दिला रहे हैं कि मोदी ने कहा था कि न खाऊंगा, न खाने दूंगा। 
चूंकि यह मामला दिल्ली से जुड़ा हुआ है इसलिए इसे मीडिया का अनुपातहीन अधिक कवरेज मिलता है, और भाजपा के भीतर जो लोग मोदी, शाह, या जेटली के आलोचक हैं, या उनसे असहमत हैं, उनको भी इस मोर्चे से एक मौका मिल रहा है। फिर एक बात यह भी है कि जेटली पंजाब भाजपा से आए हैं, वहां राज्य विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, जेटली लोकसभा का चुनाव वहां से बुरी तरह हारे हुए हैं, और आज वहां भाजपा की भागीदार, सत्तारूढ़ अकाली दल से भी जनता की भारी नाराजगी दिख रही है। ऐसे में पंजाब में जेटली की वजह से छोटे या बड़े कैसे भी एक और नुकसान की वजह बन सकती है। 
कीर्ति आजाद को निलंबित करना भाजपा के लिए जरूरी था क्योंकि पार्टी के निर्देश के खिलाफ लगातार अभियान चलाना, पार्टी में और लोगों को भी उकसाने वाला हो सकता था। फिर हर पार्टी की यह जिम्मेदारी भी होती है कि वह सही या गलत कुछ भी होने पर भी अपने बड़े लोगों को बचाने का काम करे। जेटली चाहे इस मामले में गलत भी हों, पार्टी उन्हें बचाते दिख रही है, यह एक अलग बात है कि भाजपा संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिन शब्दों में जेटली का बचाव किया है, वह बचाव अधिक है या उन पर हमला अधिक है, यह लोगों को समझ नहीं आ रहा है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से हवाला मामले से लालकृष्ण अडवानी पाक-साफ निकलकर आए थे, उसी तरह इस मामले से जेटली बाहर निकलकर आएंगे। अब उस वक्त तो हवाला आरोपों के आते ही अडवानी को इस्तीफा देना पड़ा था, तो क्या आज यह जेटली के लिए भी एक इशारा है? 
अभी जब हम यह लिख ही रहे हैं, उसी वक्त खबर आ रही है कि भाजपा के वृद्धाश्रम, मार्गदर्शक-मंडल की एक बैठक हो रही है जिसमें कीर्ति आजाद के मामले पर विचार किया जाएगा। यह मार्गदर्शक मंडल पहले भी बिहार-चुनाव जैसे मामले पर विचार कर चुका है, और अपनी बेचैनी जाहिर कर चुका है, लेकिन उसका नतीजा कुछ नहीं निकला। जिस तरह एक वक्त कांग्रेस पार्टी पर अकेली इंदिरा गांधी का राज चलता था, उसी तरह आज भाजपा के भीतर नरेन्द्र मोदी का राज चल रहा है, और उनसे असहमति पूरी तरह से महत्वहीन दिख रही है। इक्का-दुक्का आजाद, स्वामी, जेठमलानी एक बड़े से पेट के भीतर जमालघोटा के बीज की तरह असहमति वाले लोग हैं, और यह असहमति कोई असर डालने लायक ताकत नहीं रखती है। आज मोदी-अमित शाह का जो एकाधिकार केन्द्र सरकार और भाजपा पर है, वह अभूतपूर्व है, और उसकी कोई काट किसी के पास नहीं है। 
दूसरी बात यह भी कि ईमानदारी जैसे मुद्दे पर पिछले महीनों में मोदी सरकार ने जिस किस्म की बर्दाश्त दिखाई है, उससे अब यह भी मुद्दा नहीं रह गया कि भ्रष्टाचार सामने आने पर सरकार की सेहत पर कोई फर्क पड़ेगा। भाजपा का कुल रूख केन्द्र से लेकर उसकी सरकारों वाले राज्यों तक अब वैसा ही रह गया है जैसा कि कांग्रेस के भ्रष्टाचार के दिनों में रहता था। यह सब देखकर लगता है कि सत्ता का अपना एक ऐसा असर होता है जो लोगों की धार को खत्म कर देता है, नैतिकता के सारे दावों को फीका कर देता है, और पक्ष-विपक्ष के चाल-चलन में फर्क मिटा देता है।

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