डॉक्टर-इंजीनियर बनाने के दबाव में बनते मुर्दे और शिक्षा से जुड़ी कुछ और बातें

संपादकीय
26 दिसंबर 2015

राजस्थान के कोटा में देश भर से पहुंचे छात्र-छात्राओं को आईआईटी, आईआईएम, और मेडिकल कॉलेजों जैसी जगहों पर दाखिले के लिए तैयार करने के कई कारखाने चल रहे हैं। एक-एक बच्चे पर लाखों रूपये साल खर्च होते हैं, और उनको स्कूली पढ़ाई के घंटों से बचाने के लिए इस उद्योग के शहर में यही कोचिंग सेंटर फर्जी स्कूलें भी चलाते हैं ताकि वहां गए बिना, पढ़े बिना बच्चों को हाजिरी मिलती रहे, और वे पूरी ताकत बड़े कॉलेजों के दाखिला-इम्तिहान की तैयारी में लगा सकें। यह एक सैकड़ों या हजारों करोड़ साल का कारोबार हो गया है, और इसने भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी की है। आज इस पर लिखने की जरूरत इसलिए आ पड़ी है कि कोटा के ऐसे बच्चों में कल एक लड़के ने खुदकुशी कर ली, और वह इस बरस का 29वां ऐसा बच्चा है। मां-बाप के लिए वह लिख छोड़ गया है कि उन्होंने उस पर बहुत खर्च किया है, और अब वह उनसे अगले जन्म में मिलेगा। 
क्या भारत की सबसे बड़ी शैक्षणिक संस्थाएं दाखिले के एक ऐसे तरीके पर निर्भर हैं जिसे मोटी रकम खर्च करके, जिम में बहाए हुए पसीने की तरह दिमागी पसीना बहाकर जीता जा सकता है? अगर आंकड़े सही हैं, तो इससे पता लगता है कि आईआईटी और आईआईएम की बहुत सी सीटें कोटा जैसे कारखाने से निकले बच्चों से भर जाती हैं, या ऐसे ही कुछ कम मशहूर दूसरे शहरों के ऐसे ही प्रशिक्षण संस्थानों के रास्ते भर जाती हैं। तो ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि जिनके पास ऐसे महंगे कारखानों में दाखिले के लिए लाखों रूपये नहीं हैं, क्या वे लोग ऐसी प्रतिष्ठित और ऊंची पढ़ाई का हक खो बैठते हैं, और यह किस तरह की सामाजिक बराबरी है जो अमीरों और गरीबों के बीच मौकों का इतना बड़ा फासला पैदा कर देती है? यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें पढऩे का हक कोटा जैसी महंगी दुकानों के कोटे बंट जाता है? 
अब इस मुद्दे का एक दूसरा पहलू यह है कि पढ़ाई में जिसे जहां चाहे दाखिला मिले, या न मिले, क्या ऐसी अस्वाभाविक तैयारी में बच्चों को इस तरह झोंक देना मां-बाप की समझदारी है जिसमें बच्चे जान दे देने को बेबस होते हैं? और यह तो हम इस बरस की उन 29 आत्महत्याओं की बात कर रहे हैं जो कि पुलिस रिकॉर्ड में आ चुकी है। उन हजारों बच्चों की बात तो सामने आ भी नहीं पाती जो मरने से एक कदम पीछे टंगे हुए हैं, और भारी मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। मां-बाप अपने बच्चों को अपनी खुद की हसरतों को पूरा करने के लिए इस कदर झोंक देते हैं कि वे बच्चे न तो अपनी पसंद की पढ़ाई कर पाते, और न ही अपनी क्षमता की। मां-बाप की उम्मीदों को पूरा करने, उन पर खरा उतरने का दबाव इतना बड़ा रहता है कि भारत में मां-बाप की इज्जत करने वाले लाखों-करोड़ों स्कूली बच्चे अपनी हसरतों को कुचलते हुए मां-बाप द्वारा छांटी गई पढ़ाई को करने को बेबस रहते हैं। ऐसे तरीकों से कोई बच्चे बड़े कॉलेजों में चाहे पहुंच जाएं, यह उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने का तरीका नहीं है। और भारत में सामाजिक स्तर पर मां-बाप के लिए ऐसे व्यापक परामर्श की जरूरत है जो कि अपने बच्चों को उनकी हसरतों के मुताबिक आगे बढऩे का मौका देने की समझ दे। 
दुनिया के विकसित और सभ्य देश इस बात की मिसाल हैं कि बच्चे अपनी जिंदगी में सबसे आगे उन्हीं दायरों में बढ़ते हैं जो उनकी पसंद के होते हैं। उनकी प्रतिभा और उनका हुनर उन्हीं क्षेत्रों में उन्हें सबसे आगे ले जाता है जो उन्हें पसंद होते हैं। भारत में एक किस्म से ऐसी बेअक्ल दौड़ चलती रहती है जिसके सामने गिनी-चुनी चार-पांच मंजिलें रहती हैं। यह पूरा सिलसिला एक ऐसी बाजार व्यवस्था को माकूल बैठता है जो कि ऐसे गिने-चुने कॉलेज चलाती है, और कॉलेजों के भी पहले तैयारी की ऐसे कारखाने चलाती है। यह तो हम सिर्फ दो पहलुओं पर बात कर रहे हैं। इनसे थोड़ा सा परे हटें, तो देश में बाकी किस्म के लाखों ऐसे निजी कॉलेज हैं जो कि नाम के लिए तो किसी शिक्षा समिति के चलाए हुए हैं, लेकिन वहां पर कैपिटेशन फीस की ऐसी बड़ी दुकानें चलती हैं, जिनकी पहुंच देश के सबसे बड़े नेताओं तक होती हैं। ऐसे में देश अपनी तमाम संभावनाओं को एक पैसे वाले तबके के हाथों बेच रहा है, पढऩे की संभावनाओं को भी, और नौकरी की संभावनाओं को भी। और यह सिलसिला न थमते दिखता है, न बंद होते दिखता है, और न ही वापिस लौटते दिखता है। ऐसे में गरीब के पास क्या बगावत के अलावा और कोई रास्ता बचता है? 
भारत की शिक्षा से जुड़े हुए ऐसे मुद्दों पर देश भर में सामाजिक चर्चा की जरूरत है, लेकिन शिक्षा के कारखानेदार शायद ही समाज के लोगों को ऐसी चर्चा के लिए एकजुट होने दें। बाजार का कारोबार मीडिया को भी फायदा पहुंचाता है, और ताकत की कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को भी, ऐसी दुधारू गाय को कोई क्यों छेड़ेंगे?






















































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